Śatarudrīya-prabhāva and Rudra’s Supremacy (शतरुद्रीयप्रभावः)
दिव्यचन्दनसंयुक्तं दिव्यधूपेन धूपितम् तत् सदो वृषभाड्कस्य दिव्यवादित्रनादितम्,इनके सिवा बहुत-से किन्नरों, यक्षों, गन्धर्वों, राक्षमों तथा भूतगणोंने भी महादेवजीको घेर रखा था। भगवान् शंकरकी वह सभा दिव्य पुष्पोंसे आच्छादित, दिव्य तेजसे व्याप्त, दिव्य चन्दनसे चर्चित और दिव्य धूपकी सुगन्धसे सुवासित थी। वहाँ दिव्य वाद्योंकी ध्वनि गूँजती रहती थी। मृदंग और पणवका घोष छाया रहता था। शंख और भेरियोंके नाद सब ओर व्याप्त हो रहे थे। चारों ओर नाचते हुए भूतसमुदाय और मयूर उसकी शोभा बढ़ाते थे
Nārada uvāca: divya-candana-saṁyuktaṁ divya-dhūpena dhūpitam; tat sado vṛṣabhāṅkasya divya-vāditra-nāditam.
నారదుడు పలికెను—వృషభధ్వజుడైన శివుని ఆ సభ దివ్య చందనముతో లేపింపబడి, దివ్య ధూపసువాసనతో పరిమళించుచుండెను; దివ్య వాద్యముల నాదము నిరంతరం ప్రతిధ్వనించుచుండెను.
नारद उवाच