Ādi-parva Adhyāya 97: Satyavatī’s appeal and Bhīṣma’s reaffirmation of satya
प्रतीपं रोचयामास पितरं भूरितेजसम् । महाभिषं तु त॑ दृष्टवा नदी धैर्याच्च्युतं नृपम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब राजा महाभिषने अन्य बहुत-से तपस्वी राजाओंका चिन्तन करके महातेजस्वी राजा प्रतीपको ही अपना पिता बनानेके योग्य चुना --उन््हींको पसंद किया। महानदी गंगा राजा महाभिषको धैर्य खोते देख मन-ही-मन उन्हींका चिन्तन करती हुई लौटी। मार्गसे जाती हुई गंगाने वसुदेवताओंको देखा। उनका शरीर स्वर्गसे नीचे गिर रहा था। वे मोहाच्छन्न एवं मलिन दिखायी दे रहे थे। उन्हें इस रूपमें देखकर नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाने पूछा--
pratīpaṃ rocayāmāsa pitaraṃ bhūritejasam | mahābhiṣaṃ tu taṃ dṛṣṭvā nadī dhairyāccyutaṃ nṛpam |
వైశంపాయనుడు పలికెను—మహాభిషుడు అనేక తపస్వి రాజర్షులను మనసులో తలచి, మహాతేజస్సుగల ప్రతీపునే తన తండ్రిగా యోగ్యుడని ఎంచెను. కాని గంగ మహాభిషుని ధైర్య-సంయమం చ్యుతుడై ఉన్నట్లు చూచి, అంతరంగంలో అతనినే ధ్యానిస్తూ వెనుదిరిగెను.
वैशम्पायन उवाच