Śukra’s Ultimatum and Devayānī’s Demand (शुक्र-प्रतिज्ञा तथा देवयानी-वर-याचना)
त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा । मारीच: कश्यपस्त्वस्यामादित्यानू समजीजनत्,धन्यं यशस्यमायुष्यं कीर्तयिष्यामि तेडनघ । वैशम्पायनजी कहते हैं--निष्पाप जनमेजय! अब मैं दक्ष प्रजापति, वैवस्वत मनु, भरत, कुरु, पूर, अजमीढ, यादव, कौरव तथा भरतवंशियोंकी कुल-परम्पराका तुमसे वर्णन करूँगा। उनका कुल परम पवित्र, महान् मंगलकारी तथा धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है मरीचिनन्दन कश्यपने अपनी तेरह पत्नियोंमेंसे जो सबसे बड़ी दक्ष-कन्या अदिति थीं, उनके गर्भसे इन्द्र आदि बारह आदित्योंको जन्म दिया, जो बड़े पराक्रमी थे। तदनन्तर उन्होंने अदितिसे ही विवस्वान्को उत्पन्न किया। विवस्वानके पुत्र यम हुए, जो वैवस्वत कहलाते हैं। वे समस्त प्राणियोंके नियन्ता हैं
vaiśampāyana uvāca |
trayodaśānāṃ patnīnāṃ yā tu dākṣāyaṇī varā |
marīcaḥ kaśyapas tv asyām ādityān samajījanat ||
వైశంపాయనుడు పలికెను— కశ్యపుని పదమూడు భార్యలలో శ్రేష్ఠమైన దాక్షాయణి అదితి గర్భమున, మారీచినందన కశ్యపుడు ఆదిత్యులను జన్మింపజేసెను. ఈ వంశకథను వినుట, స్మరించుట కూడ ధన్యము, యశోదాయకము, ఆయుష్షును వృద్ధి చేయునది.
वैशम्पायन उवाच
The verse underscores the Mahābhārata’s ethical framing of genealogy: remembering sacred lineages is presented as spiritually beneficial and as a way to situate later human dharma within a larger cosmic and ancestral order.
Vaiśampāyana begins a genealogical account and states that Kaśyapa, son of Marīci, begot the Ādityas through his foremost wife Aditi, the daughter of Dakṣa.