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Shloka 1

अध्याय ७४: अक्रोध–क्षमा–निवासनीति

Chapter 74: Non-anger, Forbearance, and the Ethics of Residence

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १९६ श्लोक मिलाकर कुल ५३३ श्लोक हैं) - कन्याको वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत करके सजातीय योग्य वरके हाथमें देना 'ब्राह्म विवाह कहलाता है। अपने घरपर देवयज्ञ करके यज्ञान्तमें ऋत्विजुको अपनी कन्याका दान करना “दैव” विवाह कहा गया है। वरसे एक गाय और एक बैल शुल्कके रूपमें लेकर कन्यादान करना 'आर्ष” विवाह बताया गया है। वर और कन्या दोनों साथ रहकर धर्माचरण करें, इस बुद्धिसे कन्यादान करना “प्राजापत्य” विवाह माना गया है। वरसे मूल्यके रूपमें बहुत-सा धन लेकर कन्या देना “आसुर' विवाह माना गया है। वर और वधू दोनों एक-दूसरेको स्वेच्छासे स्वीकार कर लें, यह “गान्धर्व” विवाह है। युद्ध करके मार-काट मचाकर रोती हुई कनन्‍्याको उसके रोते हुए भाई-बन्धुओंसे छीन लाना 'राक्षस” विवाह माना गया है। जब घरके लोग सोये हों अथवा असावधान हों, उस दशामें कन्याको चुरा लेना “पैशाच” विवाह है। चतु:सप्ततितमो< ध्याय: शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके 3282 जाना, -शकुन्तला- संवाद, आकाशवाणीद्धारा १ शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक वैशग्पायन उवाच प्रतिज्ञाय तु दुष्यन्ते प्रतियाते शकुन्तलाम्‌ । (गर्भश्न ववृधे तस्यां राजपुत्र्यां महात्मन: । शकुन्तला चिन्तयन्ती राजानं कार्यगौरवात्‌ ।। दिवारात्रमनिद्रैव स्नानभोजनवर्जिता ।। राजप्रेषणिका विप्राश्नतुरज़्बलै: सह | अद्य श्वो वा परश्वो वा समायान्तीति निश्चिता ।। दिवसान्‌ पक्षानृतून्‌ मासानयनानि च सर्वश: । गण्यमानेषु सर्वेषु व्यतीयुस्त्रीणि भारत ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! जब शकुन्तलासे पूर्वोक्त प्रतिज्ञा करके राजा दुष्यन्त चले गये, तब क्षत्रियकन्या शकुन्तलाके उदरमें उन महात्मा दुष्यन्तके द्वारा स्थापित किया हुआ गर्भ धीरे-धीरे बढ़ने और पुष्ट होने लगा। शकुन्तला कार्यकी गुरुतापर दृष्टि रखकर निरन्तर राजा दुष्यन्तका ही चिन्तन करती रहती थी। उसे न तो दिनमें नींद आती थी और न रातमें ही। उसका स्नान और भोजन छूट गया था। उसे यह दृढ़ विश्वास था कि राजाके भेजे हुए ब्राह्मण चतुरंगिणी सेनाके साथ आज, कल या परसोंतक मुझे लेनेके लिये अवश्य आ जायँगे। भरतनन्दन! शकुन्तलाको दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन तथा वर्ष--इन सबकी गणना करते-करते तीन वर्ष बीत गये। गर्भ सुषाव वामोरू: कुमारममितौजसम्‌,जनमेजय! तदनन्तर पूरे तीन वर्ष व्यतीत होनेके बाद सुन्दर जाँघोंवाली शकुन्तलाने अपने गर्भसे प्रजजलित अग्निके समान तेजस्वी, रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न, अमित पराक्रमी कुमारको जन्म दिया, जो दुष्यन्तके वीर्यसे उत्पन्न हुआ था

vaiśaṃpāyana uvāca | pratijñāya tu duṣyante pratīyāte śakuntalām | garbhaś ca vavṛdhe tasyāṃ rājaputryāṃ mahātmanaḥ | śakuntalā cintayantī rājānaṃ kāryagauravāt | divārātram anidraiva snānabhojanavarjitā | rājapreṣaṇikā viprāś caturaṅgabalaiḥ saha | adya śvo vā paraśvo vā samāyāntīti niścitā | divasān pakṣān ṛtūn māsān ayanāni ca sarvaśaḥ | gaṇyamāneṣu sarveṣu vyatīyus trīṇi bhārata ||

వైశంపాయనుడు పలికెను—జనమేజయా! రాజు దుష్యంతుడు ప్రతిజ్ఞ చేసి శకుంతల నుండి బయలుదేరిన తరువాత, ఆ రాజకుమార్తె గర్భంలో మహాత్ముడైన దుష్యంతుని ద్వారా స్థాపితమైన గర్భం క్రమంగా వృద్ధి చెందసాగింది. కార్యగౌరవాన్ని తలచి శకుంతల నిరంతరం రాజునే ధ్యానించేది. ఆమెకు పగలు గానీ రాత్రి గానీ నిద్ర లేదు; స్నానం, భోజనం కూడా విస్మరించింది. “రాజు పంపిన బ్రాహ్మణులు చతురంగ సేనతో ఈరోజో, రేపో, ఎల్లుండో నన్ను తీసుకెళ్లడానికి తప్పక వస్తారు” అని ఆమెకు దృఢ విశ్వాసం. ఓ భారతా! రోజులు, పక్షాలు, ఋతువులు, నెలలు, అయనాలు, సంవత్సరాలు—ఇవన్నీ లెక్కపెడుతూ మూడు సంవత్సరాలు గడిచిపోయాయి. ఆపై సుందర తొడల శకుంతల అగ్నివలె తేజస్సుతో, అపార పరాక్రమంతో కూడిన కుమారుని ప్రసవించింది.

प्रतिज्ञायhaving promised
प्रतिज्ञाय:
Adhikarana
TypeVerb
Rootप्रतिज्ञा (धातु: √ज्ञा उपसर्ग: प्रति; क्त्वान्त)
Formक्त्वा (अव्ययभाव), कर्तरि
तुbut/indeed
तु:
TypeIndeclinable
Rootतु
दुष्यन्तेin/with regard to Duṣyanta
दुष्यन्ते:
Adhikarana
TypeNoun
Rootदुष्यन्त (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Locative, Singular
प्रतियातेwhen (he) had departed/returned
प्रतियाते:
Adhikarana
TypeVerb
Rootप्रति-या (धातु: √या; क्त)
FormMasculine, Locative, Singular, past active participle (क्त), used locatively absolute
शकुन्तलाम्Śakuntalā
शकुन्तलाम्:
Karma
TypeNoun
Rootशकुन्तला (प्रातिपदिक)
FormFeminine, Accusative, Singular

वैशग्पायन उवाच

V
Vaiśaṃpāyana
J
Janamejaya
D
Duṣyanta
Ś
Śakuntalā
B
Brahmins (viprāḥ)
F
Fourfold army (caturaṅga-bala)

Educational Q&A

A ruler’s pledge carries ethical weight: dharma requires not only making promises but fulfilling them promptly and responsibly. The verse highlights how delay and neglect can place the vulnerable—here, Śakuntalā—under prolonged hardship, making accountability a central moral concern.

After Duṣyanta departs having promised to send for Śakuntalā, her pregnancy advances. She anxiously expects royal emissaries and even an escorting army to arrive within days, but as she counts the passing units of time, three years elapse without that expected retrieval.