वंशानुकीर्तनम् — Genealogical Recitation from Dakṣa to Yayāti and the Establishment of the Paurava Line
यज्ञवेदीकी रचनाके ज्ञाता, क्रम और शिक्षामें कुशल, न्यायके तत्त्व और आत्मानुभवसे सम्पन्न, वेदोंके पारंगत, परस्पर विरुद्ध प्रतीत होनेवाले अनेक वाक्योंकी एकवाक्यता करनेमें कुशल तथा विभिन्न शाखाओंकी गुणविधियोंका एक शाखामें उपसंहार करनेकी कलामें निपुण, उपासना आदि विशेषकार्योंके ज्ञाता, मोक्षधर्ममें तत्पर, अपने सिद्धान्तकी स्थापना करके उसमें शंका उठाकर उसके परिहारपूर्वक उस सिद्धान्तके समर्थनमें परम प्रवीण, व्याकरण, छन््द, निरुक्त, ज्योतिष तथा शिक्षा और कल्प--वेदके इन छहों अंगोंके विद्वान, पदार्थ, शुभाशुभ कर्म, सत्त्व, रज, तम आदि गुणोंको जाननेवाले तथा कार्य (दृश्यवर्ग) और कारण (मूल प्रकृति)-के ज्ञाता, पशु-पक्षियोंकी बोली समझनेवाले, व्यासग्रन्थका आश्रय लेकर मन्त्रोंकी व्याख्या करनेवाले तथा विभिन्न शास्त्रोंके प्रमुख विद्वान् वहाँ रहकर जो शब्दोच्चारण कर रहे थे, उन सबको राजा दुष्यन्तने सुना। कुछ लोकरंजन करनेवाले लोगोंकी बातें भी उस आश्रममें चारों ओर सुनायी पड़ती थीं || ४२-- ४६ || तत्र तत्र च विप्रेन्द्रानु नियतान् संशितव्रतान् | जपहोमपरान् विप्रान् ददर्श परवीरहा,शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुष्यन्तने स्थान-स्थानपर नियमपूर्वक उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करनेवाले श्रेष्ठ एवं बुद्धिमान् ब्राह्मगोंको जप और होममें लगे हुए देखा
tatra tatra ca viprendrān niyatān saṁśitavratān | japahomapārān viprān dadarśa paravīrahā ||
అక్కడక్కడ శత్రువీర సంహారకుడైన నృపశ్రేష్ఠుడు దుష్యంతుడు ఆశ్రమంలోని వివిధ స్థలాలలో శ్రేష్ఠ బ్రాహ్మణులను చూచెను—నియమపరులు, ఇంద్రియనిగ్రహసంపన్నులు, కఠిన వ్రతధారులు, జపమూ హోమమూ నిత్యం ఆచరించువారు।
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights dharma upheld through discipline and sacred practice: the Brahmins’ restraint, vows, and ritual devotion represent a moral authority that complements (and can temper) royal power.
King Duṣyanta arrives in/near an āśrama and observes, in different places, eminent Brahmins who are strictly observant and absorbed in japa and homa—establishing the hermitage’s atmosphere of learning and ritual.