Previous Verse
Next Verse

Shloka 23

Adhyāya 125: Raṅga-pradarśana — Arjuna’s Entry and Astric Demonstration (रङ्गप्रदर्शनम्)

वैशम्पायन उवाच (तस्यास्तद्‌ वचन श्रुत्वा कुन्ती शोकाग्नितापिता । पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुम: ।। निश्चेष्ठा पतिता भूमौ मोहान्नेव चचाल सा ।। कुन्तीमुत्थाप्य माद्री च मोहेनाविष्टचेतनाम्‌ । एह्टोहीति तां कुन्तीं दर्शयामास कौरवम्‌ ।। पादयो: पतिता कुन्ती पुनरुत्थाय भूमिपम्‌ | सस्मितेन तु वक्त्रेण गदन्‍्तमिव भारत । परिरभ्य तदा मोहाद्‌ विललापाकुलेन्द्रिया ।। माद्री चापि समालिड्रय राजानं विललाप सा ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! माद्रीका यह वचन सुनकर कुन्ती शोकाग्निसे संतप्त हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी और गिरते ही मूर्च्छा आ जानेके कारण निनश्वेष्ट पड़ी रही, हिल-डुल भी न सकी। वह मूर्च्छावश अचेत हो गयी थी। माद्रीने उसे उठाया और कहा--'बहिन! आइये, आइये!” यों कहकर उसने कुन्तीको कुरुराज पाण्डुका दर्शन कराया। कुन्ती उठकर पुनः महाराज पाण्डुके चरणोंमें गिर पड़ी। महाराजके मुखपर मुसकराहट थी और ऐसा जान पड़ता था मानो वे अभी-अभी कोई बात कहने जा रहे हैं। उस समय मोहवश उन्हें हृदयसे लगाकर कुन्ती विलाप करने लगी। उसकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयी थीं। इसी प्रकार माद्री भी राजाका आलिंगन करके करुण विलाप करने लगी। त॑ तथाधिगतं पाण्डुमृषय: सह चारणै: । अभ्येत्य सहिता: सर्वे शोकादश्रूण्यवर्तयन्‌ ।। अस्तं गतमिवादित्यं सुशुष्कमिव सागरम्‌ | दृष्टवा पाणए्डुं नरव्याप्रं शोचन्ति सम महर्षय: ।। समानशोका ऋषय: पाण्डवाश्व बभूविरे । ते समाश्वासिते विप्रै: विलेपतुरनिन्दिते ।। इस प्रकार मृत्यु-शय्यापर पड़े हुए पाण्डुके पास चारणोंसहित सभी ऋषि-मुनि जुट आये और शोकवश आँसू बहाने लगे। अस्ताचलको पहुँचे हुए सूर्य तथा एकदम सूखे हुए समुद्रकी भाँति नरश्रेष्ठ पाण्डुको देखकर सभी महर्षि शोकमग्न हो गये। उस समय ऋषियोंको तथा पाण्डुपुत्रोंकी समानरूपसे शोकका अनुभव हो रहा था। ब्राह्मणोंने पाण्डुकी दोनों सती-साध्वी रानियोंकोी समझा-बुझाकर बहुत आश्वासन दिया, तो भी उनका विलाप बंद नहीं हुआ। कुन्त्युवाच हा राजन्‌ कस्य नौ हित्वा गच्छसि त्रिदशालयम्‌ ।। हा राजन्‌ मम मन्दाया: कथं माद्रीं समेत्य वै । निधन प्राप्तवान्‌ राजन्‌ मद्धाग्यपरिसंक्षयात्‌ ।। युधिष्ठिरें भीमसेनमर्जुनं च यमावुभौ । कस्य हित्वा प्रियान्‌ पुत्रान्‌ प्रयातो$सि विशाम्पते ।। नून॑ त्वां त्रिदशा देवा: प्रतिनन्दन्ति भारत | यथा हि तप उग्र ते चरितं विप्रसंसदि ।। आवाभ्यां सहितो राजन्‌ गमिष्यसि दिवं शुभम्‌ | आजमीढाजमीढानां कर्मणा चरितां गतिम्‌ ।। कुन्ती बोली--हा! महाराज! आप हम दोनोंको किसे सौंपकर स्वर्गलोकमें जा रहे हैं। हाय! मैं कितनी भाग्यहीना हूँ। मेरे राजा! आप किसलिये अकेली माद्रीसे मिलकर सहसा कालके गालमें चले गये। मेरा भाग्य नष्ट हो जानेके कारण ही आज यह दिन देखना पड़ा है। प्रजानाथ! युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल-सहदेव--इन प्यारे पुत्रोंको किसके जिम्मे छोड़कर आप चले गये? भारत! निश्चय ही देवता आपका अभिनन्दन करते होंगे; क्योंकि आपने ब्राह्मणोंकी मण्डलीमें रहकर कठोर तपस्या की है। अजमीढकुलनन्दन! आपके पूर्वजोंने पुण्य-कर्मोद्वारा जिस गतिको प्राप्त किया है, उसी शुभ स्वर्गीय गतिको आप हम दोनों पत्नियोंके साथ प्राप्त करेंगे। वैशम्पायन उवाच (विलपित्वा भृशं त्वेवं नि:संज्ञे पतिते भुवि । युधिष्ठिरमुखा: सर्वे पाण्डवा वेदपारगा: । तेडप्यागत्य पितुर्मूले नि:संज्ञा: पतिता भुवि ।। पाण्डो: पादौ परिष्वज्य विलपन्ति सम पाण्डवा: ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार अत्यन्त विलाप करके कुन्ती और माद्री दोनों अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं। युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डव वेदविद्यामें पारंगत हो चुके थे, वे भी पिताके समीप आकर संज्ञाशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े। सभी पाण्डव पाण्डुके चरणोंको हृदयसे लगाकर विलाप करने लगे। कुन्त्युवाच अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठ॑ धर्मफलं मम । अवश्यम्भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय,अवाप्य पुत्रॉल्लब्धात्मा वीरपत्नीत्वमर्थये । कुन्तीने कहा--माद्री! मैं इनकी ज्येष्ठ धर्मपत्नी हूँ, अतः धर्मके ज्येष्ठ फलपर भी मेरा ही अधिकार है। जो अवश्यम्भावी बात है, उससे मुझे मत रोको। मैं मृत्युके वशमें पड़े हुए अपने स्वामीका अनुगमन करूँगी। अब तुम इन्हें छोड़कर उठो और इन बच्चोंका पालन करो। पुत्रोंकोी पाकर मेरा लौकिक मनोरथ पूर्ण हो चुका है; अब मैं पतिके साथ दग्ध होकर वीरपत्नीका पद पाना चाहती हूँ

vaiśampāyana uvāca | tasyās tad vacanaṃ śrutvā kuntī śokāgnitāpitā | papāta sahasā bhūmau chinnamūla iva drumaḥ || niśceṣṭhā patitā bhūmau mohān naiva cacāla sā || kuntīm utthāpya mādrī ca mohenāviṣṭacetanām | ehi ehi iti tāṃ kuntīṃ darśayām āsa kauravam || pādayoḥ patitā kuntī punar utthāya bhūmipam | sasmītena tu vaktreṇa gadantam iva bhārata | parirabhya tadā mohād vilalāpākulendriyā || mādrī cāpi samāliṅgya rājānaṃ vilalāpa sā ||

వైశంపాయనుడు అన్నాడు—మాద్రీ మాటలు విని శోకాగ్నితో దగ్ధమైన కుంతీ వేర్లు తెగిన వృక్షంలా అకస్మాత్తుగా నేలపై పడిపోయింది. మూర్ఛతో ఆమె నిశ్చేష్టగా పడి, కదలలేకపోయింది. మాద్రీ ఆమెను లేపి, “రా, రా” అని చెప్పి కౌరవ రాజు పాండువును చూపించింది. కుంతీ లేచి మళ్లీ రాజు పాదాల వద్ద పడింది. ఆయన ముఖంలో మృదువైన చిరునవ్వు ఉండి, ఇప్పుడే ఏదో పలకబోతున్నట్టుగా కనిపించాడు. అప్పుడు మోహవశంగా కుంతీ ఆయనను ఆలింగనం చేసి, వ్యాకులమైన ఇంద్రియాలతో కరుణగా విలపించింది. మాద్రీ కూడా రాజును కౌగిలించుకొని విలపించింది.

वैशम्पायनःVaiśampāyana
वैशम्पायनः:
Karta
TypeNoun
Rootवैशम्पायन
FormMasculine, Nominative, Singular
उवाचsaid
उवाच:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect, 3, Singular
तस्याःof her
तस्याः:
TypePronoun
Rootतद्
FormFeminine, Genitive, Singular
तत्that
तत्:
Karma
TypePronoun
Rootतद्
FormNeuter, Accusative, Singular
वचनम्speech/words
वचनम्:
Karma
TypeNoun
Rootवचन
FormNeuter, Accusative, Singular
श्रुत्वाhaving heard
श्रुत्वा:
TypeVerb
Rootश्रु
Formक्त्वा (absolutive), Active
कुन्तीKuntī
कुन्ती:
Karta
TypeNoun
Rootकुन्ती
FormFeminine, Nominative, Singular
शोकाग्नि-तापिताburnt by the fire of grief
शोकाग्नि-तापिता:
TypeAdjective
Rootतापित (√तप्/तप् caus.)
FormFeminine, Nominative, Singular
पपातfell
पपात:
TypeVerb
Rootपत्
FormPerfect, 3, Singular
सहसाsuddenly
सहसा:
TypeIndeclinable
Rootसहसा
भूमौon the ground
भूमौ:
Adhikarana
TypeNoun
Rootभूमि
FormFeminine, Locative, Singular
छिन्न-मूलःwith roots cut off
छिन्न-मूलः:
TypeAdjective
Rootछिन्न (√छिद्) + मूल
FormMasculine, Nominative, Singular
इवlike/as if
इव:
TypeIndeclinable
Rootइव
द्रुमःa tree
द्रुमः:
TypeNoun
Rootद्रुम
FormMasculine, Nominative, Singular

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśampāyana
K
Kuntī
M
Mādrī
P
Pāṇḍu
K
Kuru king (Kaurava in the sense of Kuru ruler)

Educational Q&A

The passage highlights how even the disciplined life of a dharmic royal household cannot prevent grief from overwhelming the body and mind. It implicitly teaches compassion toward human frailty and points to the Mahābhārata’s ethical realism: dharma is pursued amid powerful emotions, not in their absence.

After hearing Mādrī, Kuntī collapses in shock and grief. Mādrī revives her and brings her to see Pāṇḍu. Kuntī falls at his feet, embraces him, and laments; Mādrī also embraces Pāṇḍu and mourns—marking the immediate aftermath of the king’s death.