इन्द्रद्युम्नोपाख्यानम्
Indradyumna Upākhyāna: On Kīrti, Smṛti, and Restoration
परंतु भरतश्रेष्ठ, कलियुग आनेपर अधर्म अपने तीन अंशोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंको आक्रान्त करके स्थित होता है और धर्म केवल एक पादसे मनुष्योंमें प्रतिष्ठित होता है। पाण्डुनन्दन! प्रत्येक युगमें मनुष्योंकी आयु, वीर्य, बुद्धि, बल तथा तेज क्रमश: घटते जाते हैं। युधिष्ठिर अब कलियुगके समयका वर्णन सुनो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी जातियोंके लोग कपट॒पूर्वक धर्मका आचरण करेंगे और धर्मका जाल बिछाकर दूसरे लोगोंको ठगते रहेंगे। अपनेको पण्डित माननेवाले लोग सत्यका त्याग कर देंगे ।। ११-- १४ || सत्यहान्या ततस्तेषामायुरल्पं भविष्यति । आयुष: प्रक्षयाद् विद्यां न शक्ष्यन्त्युपजीवितुम्,सत्यकी हानि होनेसे उनकी आयु थोड़ी हो जायगी और आयुकी कमी होनेके कारण वे अपने जीवन-निर्वाहके योग्य विद्या प्राप्त नहीं कर सकेंगे
satyahānyā tatasteṣām āyur alpaṁ bhaviṣyati | āyuṣaḥ prakṣayād vidyāṁ na śakṣyanty upajīvitum ||
சத்தியம் குன்றினால் அவர்களின் ஆயுள் குறுகும்; ஆயுள் குறைவதால் வாழ்வாதாரத்திற்குத் தகுந்த கல்வியையும் அவர்கள் பெற இயலாது. இவ்வாறு கலியுகத்தில் சத்தியத்தின் இழப்பு மனிதச் சிதைவையும் சமூகக் குழப்பத்தையும் உண்டாக்குகிறது.
मार्कण्डेय उवाच