भीष्मविक्रमदर्शनं तथा क्रौञ्चारुणव्यूहविधानम् | Bhīṣma’s Ascendancy and the Organization of the Krauñcāruṇa Formation
अहंकार बल दर्प काम॑ क्रोध॑ परिग्रहम् विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्म भूयाय कल्पते,विशुद्ध बुद्धिसे युक्त+ तथा हलका, सातक््विक और नियमित भोजन करनेवाला, शब्दादि विषयोंका त्याग करके एकान्त और शुद्ध देशका सेवन करने-वाला,* सात््विक धारणशक्तिके द्वारा अन्तः:करण और इन्द्रियोंका संयम करके“ मन, वाणी और शरीरको वशमें कर लेनेवाला,” राग-द्वेषको सर्वथा नष्ट करके*ः भलीभाँति दृढ़ वैराग्यका आश्रय लेनेवाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके निरन्तर ध्यानयोगके परायण रहनेवाला: ममता-रहितः और शान्तियुक्त पुरुष: सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित होनेका पात्र होता है
ahaṅkāra-bala-darpa-kāma-krodha-parigraham vimucya nirmamaḥ śānto brahma-bhūyāya kalpate |
அகங்காரம், வலிமையின் பெருமிதம், ஆணவம், காமம், கோபம், பற்றுகை ஆகியவற்றைத் துறந்து, ‘எனது’ என்ற மமதை அற்ற அமைதியுடையவன் பிரம்மநிலைக்கு தகுதியானவன் ஆகிறான்।
अजुन उवाच