धृतराष्ट्र–दुर्योधन संवादः
Vāraṇāvata-vivāsana-nīti: Dhṛtarāṣṭra and Duryodhana’s Policy Dialogue
वैशम्पायन उवाच गड़ाद्वारं प्रति महान् बभूव भगवानृषि: । भरद्वाज इति ख्यात: सततं संशितव्रत:,वैशम्पायनजीने कहा--जनमेजय! गंगाद्वारमें भगवान् भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि रहते थे। वे सदा अत्यन्त कठोर व्रतोंका पालन करते थे। एक दिन उन्हें एक विशेष प्रकारके यज्ञका अनुष्ठान करना था। इसलिये वे भरद्वाज मुनि महर्षियोंको साथ लेकर गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ पहुँचकर महर्षिने प्रत्यक्ष देखा, घृताची अप्सरा पहलेसे ही स्नान करके नदीके तटपर खड़ी हो वस्त्र बदल रही है। वह रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। जवानीके नशेमें मदसे उन्मत्त हुई जान पड़ती थी। उसका वस्त्र खिसक गया और उसे उस अवस्थामें देखकर ऋषिके मनमें कामवासना जाग उठी
vaiśampāyana uvāca | gaṅgādvāraṃ prati mahān babhūva bhagavān ṛṣiḥ | bharadvāja iti khyātaḥ satataṃ saṃśitavrataḥ |
வைசம்பாயனன் கூறினான்—ஜனமேஜயா! கங்காத்வாரத்தின் அருகே ‘பரத்வாஜர்’ எனப் புகழ்பெற்ற மகத்தான பகவான் முனிவர் ஒருவர் வாழ்ந்தார்; அவர் எப்போதும் கடுமையான விரதங்களில் உறுதியாக இருந்தார்।
वैशम्पायन उवाच