Adhyaya 223
Vana ParvaAdhyaya 22336 Verses

Adhyaya 223

Draupadī’s Instruction on Marital Conduct and Household Discipline (चित्तग्रहण-उपदेश)

Upa-parva: Strī-dharma and Gṛha-nīti Discourse (Draupadī’s Counsel Episode)

This adhyāya records Draupadī’s structured counsel describing an “apeta-doṣa” (fault-avoiding) path for sustaining the husband’s goodwill and reducing conflict with co-wives. She frames the husband as a decisive locus of prosperity and harm, asserting that favor yields desired outcomes while anger brings severe consequences. The instruction emphasizes that comfort is not obtained through comfort alone; disciplined effort and forbearance are presented as means to secure well-being. Practical directives follow: affectionate service, pleasing food and adornment, prompt and respectful reception at the doorway, and personal initiative even when attendants are tasked. Draupadī advises guarding private speech shared by the husband to prevent alienation through misreporting. She recommends cultivating the husband’s allies and benefactors while distancing from his adversaries, avoiding arrogance and heedlessness, and maintaining restraint and silence when appropriate. The chapter ends with guidance on suitable female companionship—associating with reputable, virtuous women and avoiding disruptive or criminal company—presented as conducive to reputation, religious merit, and social stability.

Chapter Arc: राजन्! वंश-परम्परा के ज्ञाता द्विजाति बताते हैं कि जो अग्नि सबको परिचित है, वही अनेक नाम-रूपों में प्रकट होकर असंख्य ‘धिष्ण्य’ और अग्नि-वंशों का मूल बनता है। → कथन विस्तार पाता है—पूर्वोक्त चालीस पुत्रों के अतिरिक्त भी पाँच पुत्रों का उल्लेख, फिर ‘पावक’ को भूतों का पति, भुवन-भर्ता और महातेजस्वी कहकर उसकी सर्वव्यापकता स्थापित की जाती है। अग्नि विविध देशों में विचरता है; समुद्र के भीतर नाना स्थानों में भ्रमण करता हुआ अनेक धिष्ण्यों/देव-आश्रयों की उत्पत्ति का कारण बनता है। → नदियों को धिष्ण्यों की ‘माताएँ’ घोषित कर (सिन्धु, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही आदि) अग्नि-तत्त्व का भूगोल और वंश एक साथ बाँध दिया जाता है—और फिर निर्णायक वाक्य आता है: सब अग्नियों में एक ही हुताशन है; जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ एक होकर भी अनेक विधियों में प्रकट होता है, वैसे ही ‘एक’ अग्नि बहुधा निःसृत है। → वक्ता क्रमबद्ध रूप से इन ‘अप्रमेय, तिमिरापह, श्रीमन्त’ अग्नियों की उत्पत्ति-परम्परा समेटता है और श्रोता को निष्कर्ष देता है—अद्भुत-अग्नि का माहात्म्य जैसा वेदों में है, वैसा ही सब अग्नियों का समझो; भेद नाम-रूप का है, तत्त्व एक है।

Shlokas

Verse 1

हि ० आय न | हि 7 आम ३. तप अर्थात्‌ पांचजन्यके जो पूर्वोक्त चालीस पुत्र बताये गये हैं, उनके सिवा, पाँच पुत्र और भी उन्होंने उत्पन्न किये थे। उनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं--पुरंदर, ऊष्मा, मनु, शम्भु और आवसथ्य। उनका तीसरेसे छठे श्लोकतक वर्णन है। २. श्रुति भी कहती है--“आदित्यो वा अस्तं यन्नग्निमनुप्रविशति ।” ३. बलद, मन्युमान्‌ तथा विष्णु नामक अग्नि भानुकी भार्या सुप्रजासे उत्पन्न हैं। इसी प्रकार “आग्रयण' “अग्रह” और 'स्तुभ'--ये तीन अग्नि बृहद्भधासाकी संतान हैं। - मिट्टीके प्याले या पुरवेका नाम कपाल है। द्वाविशर्त्याधिकॉद्विशततमो< ध्याय: सह नामक अग्निका जलनमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्धारा पुन:उनका प्राकट्य मार्कण्डेय उवाच आपस्य मुदिता भार्या सहस्य परमा प्रिया । भूपतिर्भुवभर्ता च जनयत्‌ पावकं परम्‌,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन्‌! जलमें निवासके कारण प्रसिद्ध हुए 'सह” नामक अग्निके एक परम प्रिय पत्नी थी जिसका नाम था मुदिता। उसके गर्भसे भूलोक और भुवर्लोकके स्वामी सहने “अद्भुत'- नामक उत्कृष्ट अग्निको उत्पन्न किया

मार्कण्डेय उवाच—राजन्, आप्सु निवाससम्बन्धात् ‘सह’ इति प्रसिद्धोऽग्निः मुदिता नाम परमप्रियां भार्यां लेभे। स भूपतिः भुवनभर्ता च तस्यां परमं पावकं ‘अद्भुत’ इति विख्यातं तेजसा श्रेष्ठमजनयत्।

Verse 2

भूतानां चापि सर्वेषां य॑ प्राहु: पावकं पतिम्‌ | आत्मा भुवनभर्तेति सान्वयेषु द्विजातिषु,ब्राह्मणलोगोंमें वंशपरम्पराके क्रमसे सभी यह मानते और कहते हैं कि “अद्भुत” नामक अग्नि सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं। वे ही सबके आत्मा और भुवनभर्ता हैं

भूतानां चापि सर्वेषां यं प्राहुः पावकं पतिम्। आत्मा भुवनभर्तेति सान्वयेषु द्विजातिषु॥

Verse 3

महतां चैव भूतानां सर्वेषामिह यः पति: । भगवान्‌ स महातेजा नित्यं चरति पावक:,“वे ही इस जगतके सम्पूर्ण महाभूतोंके पति हैं। उनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य सुशोभित हैं। वे महातेजस्वी अग्निदेव सदा सर्वत्र विचरण करते हैं

महतां चैव भूतानां सर्वेषामिह यः पतिः। भगवान् स महातेजा नित्यं चरति पावकः॥

Verse 4

अन्निर्गुहपतिर्नाम नित्य यज्ञेषु पूज्यते । हुतं वहति यो हव्यमस्य लोकस्य पावक:,“जो अग्नि गृहपति नामसे सदा यज्ञमें पूजित होते हैं तथा हवन किये गये हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं, वे अद्भुत अग्नि ही इस जगत्‌को पवित्र करनेवाले हैं

मार्कण्डेय उवाच—योऽग्निर्गृहपतिरिति नाम्ना नित्यं यज्ञेषु पूज्यते। यो हुतं हव्यमादाय देवेभ्यः प्रापयति, स एवाश्चर्यः पावक इदं जगत् पावयति॥

Verse 5

अपां गर्भो महाभागः सच्त्वभुग्‌ यो महाद्धुत: । भूपतिर्भुवभर्ता च महत: पतिरुच्यते,“जो “आप' नामवाले सहके पुत्र हैं, जो महाभाग, सत्त्वभोक्ता, भूलोकके पालक और भुवर्लोकके स्वामी हैं, वे अद्भुत नामक महान्‌ अग्नि बुद्धितत््वके अधिपति बताये जाते हैं!

मार्कण्डेय उवाच—अपां गर्भो महाभागः सत्त्वभुग् यो महाद्भुतः। भूपतिर्भुवभर्ता च स महतः पतिरुच्यते॥

Verse 6

दहन्‌ मृतानि भूतानि तस्याग्निर्भरतो5भवत्‌ | अग्निष्टोमे च नियत: क्रतुश्रेष्ठो भरस्य तु,“उन्हीं “अद्भुत” या गृहपतिके एक अग्निस्वरूप पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम “भरत' है। ये मरे हुए प्राणियोंके शवका दाह करते हैं। भरतका अग्निष्टोम यज्ञमें नित्य निवास है, इसलिये उन्हें “नियत” भी कहते हैं। नियतका संकल्प उत्तम है

मार्कण्डेय उवाच—तस्य गृहपतेरग्नेः पुत्रोऽग्निरूपो भरत इति विश्रुतः। स मृतान् भूतगणान् दहति; अग्निष्टोमे च नित्यं नियतः, तस्मान्नियत इति स्मृतः, यस्य संकल्पः प्रशस्यते॥

Verse 7

स वद्िः प्रथमो नित्य देवैरन्विष्यते प्रभु: । आयान्तं नियतं दृष्टवा प्रविवेशार्णवं भयात्‌,“प्रथम अग्नि 'सह' बड़े प्रभावशाली हैं। एक समय देवतालोग उनको हढूँढ़ रहे थे। उनके साथ अपने पौत्र नियतको भी आता देख (उससे छू जानेके) भयसे वे समुद्रके भीतर घुस गये

मार्कण्डेय उवाच—सह नाम वडवः प्रथमो नित्यः प्रभुर्देवैरन्विष्यते। आयान्तं नियतं दृष्ट्वा तेन संस्पर्शभयात् स भयादर्णवं प्रविवेश॥

Verse 8

देवास्तत्रापि गच्छन्ति मार्गमाणा यथादिशम्‌ | दृष्टवा त्वग्निरथर्वाणं ततो वचनमत्रवीत्‌,तब देवतालोग सब दिशाओंमें उनकी खोज करते हुए वहाँ भी पहुँचने लगे। एक दिन अथर्वा (अंगिरा)-को देखकर अग्निने उनसे कहा--

मार्कण्डेय उवाच—देवास्तत्रापि गच्छन्ति मार्गमाणा यथादिशम्। दृष्ट्वा त्वग्निरथर्वाणं ततो वचनमब्रवीत्॥

Verse 9

देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्बल: । अथ त्वं गच्छ मध्वक्ष॑ प्रियमेतत्‌ कुरुष्व मे,वीर! तुम देवताओंके पास उनका हविष्य पहुँचाओ। मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ। अब केवल तुम्हीं अग्निपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करो”

मार्कण्डेय उवाच—देवानां हव्यं वह त्वम्, अहं वीर सुदुर्बलः। अथ त्वं गच्छ मध्वक्ष, प्रियमेतत् कुरुष्व मे, वीर॥

Verse 10

प्रेष्य चाग्निरथर्वाणमन्यं देशं ततो5गमत्‌ । मत्स्यास्तस्य समाचख्यु: क्रुद्धस्तानग्निरब्रवीत्‌ भक्ष्या वै विविधैभविर्भविष्यथ शरीरिणाम्‌

प्रेष्य चाग्निरथर्वाणमन्यं देशं ततोऽगमत्। मत्स्यास्तस्य समाचख्यु: क्रुद्धस्तानग्निरब्रवीत्—भक्ष्या वै विविधैर्भावैर्भविष्यथ शरीरिणाम्॥

Verse 11

इस प्रकार अथर्वाको भेजकर अग्निदेव दूसरे स्थानमें चले गये। किंतु मत्स्योंने अथर्वासे उनकी स्थिति कहाँ है, यह बता दिया। इससे कुपित होकर अग्निने उन्हें शाप देते हुए कहा --“तुम लोग नाना प्रकारसे जीवोंके भक्ष्य बनोगे” ।। अथर्वाणं तथा चापि हव्यवाहो<ब्रवीद्‌ वच:,तदनन्तर अग्निने अथर्वासे फिर वही बात कही। उस समय देवताओंके कहनेसे अथर्वा मुनिने सह नामक अग्निदेवसे अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य ढोनेका भार लेनेकी इच्छा की और न वे अपने उस जीर्ण शरीरका ही भार सह सके। अन्ततोगत्वा उन्होंने शरीर त्याग दिया

एवं प्रेष्याथर्वाणं हव्यवाहोऽन्यदेशं जगाम ह। मत्स्यैस्तु कथितं तस्मै यत्रासौ स मुनिस्तदा। ततोऽग्निः क्रुद्धमानस्तानिदं वचनमब्रवीत्—“भक्ष्या भवत विविधैर्भावैः शरीरिणाम्।” अथर्वाणं च पुनरेव हव्यवाहोऽब्रवीद्वचः। देवानां वचनादथर्वा सहाख्यं तमग्निमत्यर्थमनुनयामास; स न हव्यवहनभारं जग्राह, न च जीर्णशरीरभारं सोढुं शशाक; अन्ते देहं त्यक्तवान्॥

Verse 12

अनुनीयमानो हि भृशं देववाक्याद्धि तेन सः । नैच्छद्‌ वोढुं हवि: सोढुं शरीरं चापि सो5त्यजत्‌,तदनन्तर अग्निने अथर्वासे फिर वही बात कही। उस समय देवताओंके कहनेसे अथर्वा मुनिने सह नामक अग्निदेवसे अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य ढोनेका भार लेनेकी इच्छा की और न वे अपने उस जीर्ण शरीरका ही भार सह सके। अन्ततोगत्वा उन्होंने शरीर त्याग दिया

अनुनीयमानो हि भृशं देववाक्याद्धि तेन सः। नैच्छद्वोढुं हविः सोढुं शरीरं चापि सोऽत्यजत्॥

Verse 13

स तच्छरीरं संत्यज्य प्रविवेश धरां तदा । भूमिं स्पृष्टासजद्‌ धातून्‌ पृथक्‌ पृथगतीव हि,उस समय अपने उस शरीरको त्यागकर वे धरतीमें समा गये। भूमिका स्पर्श करके उन्होंने पृथक्‌ू-पृथक्‌ बहुत-से धातुओंकी सृष्टि की

स तच्छरीरं संत्यज्य प्रविवेश धरां तदा। भूमिं स्पृष्टासृजद् धातून् पृथक् पृथगतीव हि॥

Verse 14

पूयात्‌ स गन्ध॑ तेजश्न अस्थिभ्यो देवदारु च । श्लेष्मण: स्फाटिकं तस्य पित्तान्मारकतं तथा,“सह” नामक अग्निने अपने पीब तथा रक्तसे गन्धक एवं तैजस धातुओंको उत्पन्न किया। उनकी हडियोंसे देवदारुके वृक्ष प्रकट हुए। कफसे स्फटिक तथा पित्तसे मरकतमणिका प्रादुर्भाव हुआ

मार्कण्डेय उवाच— तस्य पूयात् गन्धकं तेजश्चाभवत्; अस्थिभ्यश्च देवदारवः प्रादुर्भूताः। श्लेष्मणः स्फटिकं जातं, पित्तात् मरकतमपि तथा॥

Verse 15

यकृत्‌ कृष्णायसं तस्य त्रिभिरेव बभु: प्रजा: । नखास्तस्याभ्रपटलं शिराजालानि विद्रुमम्‌,और उनका यकृत्‌ (जिगर) ही काले रंगका लोहा बनकर प्रकट हुआ। काष्ठ, पाषाण और लोहा--इन तीनोंसे ही प्रजाजनोंकी शोभा होती है। उनके नख मेघसमूहका रूप धारण करते हैं। नाडियाँ मूँगा बनकर प्रकट हुई हैं

मार्कण्डेय उवाच— तस्य यकृतः कृष्णायसं प्रादुरभवत्; त्रिभिरेव द्रव्यैः— काष्ठपाषाणायसैः— प्रजाः स्वरूपशोभां लेभिरे। तस्य नखाः अभ्रपटलसदृशा बभूवुः, शिराजालानि च विद्रुमरूपाणि॥

Verse 16

शरीराद्‌ विविधाश्रान्ये धातवोडस्थाभवन्‌ नृप । एवं त्यक्त्वा शरीरं च परमे तपसि स्थित:,राजन्‌! सह अग्निके शरीरसे अन्य नाना प्रकारके धातु उत्पन्न हुए। इस प्रकार शरीर त्यागकर वे बड़ी भारी तपस्यामें लग गये

मार्कण्डेय उवाच— नृप, शरीरात् विविधा अन्ये धातवः प्रादुरभवन्; अस्थीन्यपि समुत्पन्नानि। एवं स शरीरं त्यक्त्वा परमे तपसि स्थितः॥

Verse 17

भग्व्धिरादिभिर्भूयस्तपसोत्थापितस्तदा । भृशं जज्वाल तेजस्वी तपसा55प्यायित: शिखी,जब भृगु और अंगिरा आदि ऋषियोंने पुनः: उनको तपस्यासे उपरत कर दिया, तब वे तपस्यासे पुष्ट हुए तेजस्वी अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे

मार्कण्डेय उवाच— तदा भृग्वङ्गिरसादिभिः पुनस्तपसा प्रबोधितः। तपसैवोपपन्नतेजाः स शिखी भृशं जज्वाल॥

Verse 18

दृष्टवा ऋषिं भयाच्चापि प्रविवेश महार्णवम्‌ | तस्मिन्‌ नष्टे जगद्‌ भीतमथर्वाणमथाश्रितम्‌ | अर्चयामासुरेवैनमथर्वाणं सुरादय:,महर्षि अंगिराको सामने देख वे अग्नि भयके मारे पुनः महासागरके भीतर प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार अग्निके अदृश्य हो जानेपर सारा संसार भयभीत हो अथर्वा--अंगिराकी शरणमें आया तथा देवताओंने इन अथर्वाकी पूजा की

मार्कण्डेय उवाच— ऋषिं दृष्ट्वा भयाच्च स पुनर्महार्णवं प्रविवेश। तस्मिन् नष्टे जगद्भीतम् अथर्वाणं शरणं ययौ; सुरादयश्च तमथर्वाणं समर्चयन्॥

Verse 19

अथर्वा त्वसृजललोकानात्मना55लोक्य पावकम्‌ । मिषतां सर्वभूतानामुन्ममाथ महार्णवम्‌,अथरवनि सब प्राणियोंके देखते-देखते समुद्रकों मथ डाला और अग्निदेवका दर्शन करके स्वयं ही सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की

अथर्वा त्वसृजल्लोकानात्मना लोक्य पावकम् । मिषतां सर्वभूतानामुन्ममाथ महार्णवम् ॥

Verse 20

एवमग्निर्भगवता नष्ट: पूर्वमथर्वणा । आहूत: सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा,इस प्रकार पूर्वकालमें अदृश्य हुए अग्निको भगवान्‌ अंगिराने फिर बुलाया। जिससे प्रकट होकर वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंका हविष्य वहन करते हैं

एवमग्निर्भगवता नष्टः पूर्वमथर्वणा । आहूतः सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा ॥

Verse 21

एवं त्वजनयद्‌ धिष्ण्यान्‌ वेदोक्तान्‌ विबुधान्‌ बहून्‌ । विचरन्‌ विविधान्‌ देशान्‌ भ्रममाणस्तु तत्र वै,उस समुद्रके भीतर नाना स्थानोंमें विचरण एवं भ्रमण करते हुए सह अग्निने इसी प्रकार विविध भाँतिके बहुत-से वेदोक्त अग्निदेवों तथा उनके स्थानोंको उत्पन्न किया

एवं त्वजनयद्धिष्ण्यान् वेदोक्तान् विबुधान् बहून् । विचरन् विविधान् देशान् भ्रममाणस्तु तत्र वै ॥

Verse 22

सिन्धुनदं पञजचनदं देविकाथ सरस्वती । गड़ा च शतकुम्भा च सरयूर्गण्डसाह्दया,एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो या: प्रकीर्तिता: । सिन्धुनद, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुंगवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र “-ये सब नदियाँ और नद हैं, जो अग्नियोंके उत्पत्ति-स्थान कहे गये हैं

सिन्धुनदं पञ्चनदं देविकाथ सरस्वती । गङ्गा च शतकुम्भा च सरयूर्गण्डकी तथा ॥ एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो याः प्रकीर्तिताः ।

Verse 23

चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधातिथिस्तदा । ताम्रवती वेत्रवती नद्यस्तिस्रो5<थ कौशिकी

चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधातिथिस्तथा । ताम्रवती वेत्रवती नद्यस्तिस्रोऽथ कौशिकी ॥

Verse 24

तमसा नर्मदा चैव नदी गोदावरी तथा । वेणोपवेणा भीमा च वडवा चैव भारत

मārkaṇḍeya uvāca—तमसा नर्मदा चैव नदी गोदावरी तथा । वेणोपवेणा भीमा च वडवा चैव भारत ॥

Verse 25

भारती सुप्रयोगा च कावेरी मुर्मुरा तथा । तुड़्वेणा कृष्णवेणा कपिला शोण एव च

मārkaṇḍeya uvāca—भारती सुप्रयोगा च कावेरी मुर्मुरा तथा । तुड्वेणा कृष्णवेणा कपिला शोण एव च ॥

Verse 26

अद्भुतस्य प्रिया भार्या तस्य पुत्रो विभूरसि:,अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके “विभूरसि” नामक पुत्र हुआ। अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है। वे सब अग्नि ब्रद्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं

मārkaṇḍeya uvāca—अद्भुतस्य प्रिया भार्या तस्य पुत्रो विभूरसिः । यावन्तः पावकाः प्रोक्ताः सोमास्तावन्त एव तु । ते सर्वेऽत्रेरन्वये जाता ब्रह्मणो मानसाḥ प्रजाः ॥

Verse 27

यावन्तः पावकाः: प्रोक्ता: सोमास्तावन्त एव तु । अन्रेश्नाप्यन्वये जाता ब्रह्मणो मानसा: प्रजा:,अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके “विभूरसि” नामक पुत्र हुआ। अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है। वे सब अग्नि ब्रद्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं

मārkaṇḍeya uvāca—यावन्तः पावकाः प्रोक्ताः सोमास्तावन्त एव तु । अन्रेश्नाप्यन्वये जाता ब्रह्मणो मानसाḥ प्रजाः ॥

Verse 28

अत्रि: पुत्रान्‌ स्रष्टकामस्तानेवात्मन्यधारयत्‌

मārkaṇḍeya uvāca—अत्रिः पुत्रान् स्रष्टकामस्तानेवात्मन्यधारयत् ॥

Verse 29

तस्य तद्ब्रह्मणः कार्यन्निर्हरन्ति हुताशना: । अत्रिको जब प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने उन अग्नियोंको ही अपने हृदयमें धारण किया। फिर उन ब्रह्मर्षिके शरीरसे विभिन्न अग्नियोंका प्रादुर्भाव हुआ ।। २८ ई || एवमेते महात्मान: कीर्तितास्ते5ग्नयो मया

तस्य तद्ब्रह्मणः कार्यं निर्वहन्ति हुताशनाः। अत्रेः प्रजासृष्टिं कर्तुमिच्छा समभवत्, तदा स तानग्नीन् एव हृदये न्यधारयत्। ततः तस्य ब्रह्मर्षेः शरीराद् विविधा अग्नयः प्रादुर्भूताः॥ एवमेते महात्मानो मया कीर्तितास्तेऽग्नयः॥

Verse 30

अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम्‌

अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम्।

Verse 32

इत्येष वंश: सुमहानग्नीनां कीर्तितो मया । योडर्चितो विविधैर्मन्त्रैहव्यं वहति देहिनाम्‌,इस प्रकार मेरेद्वारा अग्निदेवके महान्‌ वंशका प्रतिपादन किया गया। वे भगवान्‌ अग्नि विविध वेदमन्त्रोंद्वार पूजित होकर देहधारियोंके दिये हुए हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं

इत्येष वंशः सुमहानग्नीनां कीर्तितो मया। योऽर्चितो विविधैर्मन्त्रैर्हव्यं वहति देहिनाम्॥

Verse 222

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आज्ञिरसोपाख्यानेडग्निसमुद्धवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमो5ध्याय:

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आज्ञिरसोपाख्यानेऽग्निसमुद्भवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः।

Verse 253

एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो या: प्रकीर्तिता: । सिन्धुनद, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुंगवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र “-ये सब नदियाँ और नद हैं, जो अग्नियोंके उत्पत्ति-स्थान कहे गये हैं

एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो याः प्रकीर्तिताः। सिन्धुः पञ्चनदश्चैव देविका सरस्वती तथा। गङ्गा शतकुम्भा सरयूर्गण्डकी चर्मण्वती। मही मेध्या मेधातिथिस्ताम्रवती वेत्रवती। कौशिकी तमसा नर्मदा गोदावरी च वेणा। उपवेणा भीमा वडवा भारती सुप्रयोगा। कावेरी मुर्मुरा तुङ्गवेणा कृष्णवेणा कपिला। तथा शोणभद्र इत्येताः धिष्ण्यजननीः स्मृताः॥

Verse 293

अप्रमेया यथोत्पन्ना: श्रीमन्तस्तिमिरापहा: । राजन्‌! इस प्रकार मैंने इन अप्रमेय, अन्धकारनिवारक तथा दीप्तिमान्‌ महामना अग्नियोंकी जिस क्रमसे उत्पत्ति हुई है, उसका तुमसे वर्णन किया

मार्कण्डेय उवाच—राजन्, एवमहम् अप्रमेयान् तमोऽपहन् श्रीमतो महात्मनः अग्नीन् यथाक्रमं यथोत्पत्तिं तव सम्यग् आख्यातवान्।

Verse 306

तादृशं विद्धि सर्वेषामेको होषु हुताशन: । वेदोंमें "अद्भुत! नामक अग्निके माहात्म्यका जैसा वर्णन है, वैसा ही सब अग्नियोंका समझना चाहिये; क्योंकि इन सबमें एक ही अग्नितत्त्व विद्यमान है

मार्कण्डेय उवाच—सर्वेषामग्नीनां तादृशमेवैकं तत्त्वं विद्धि; सर्वत्र हि एक एव हुताशनतत्त्वः। तस्मादद्भुताग्नेर्माहात्म्यं यद्वेदेषु वर्णितं तत् सर्वाग्निषु यथावत् ज्ञेयम्।

Verse 316

एक एवैष भगवान्‌ विज्ञेय: प्रथमो5जड्लिरा: ३१ ।। बहुधा निःसृतः कायाज्ज्योतिष्टोम: क्रतुर्यथा । ये प्रथम भगवान्‌ अग्नि, जिन्हें अंगिरा भी कहते हैं, एक ही हैं, ऐसा जानना चाहिये। जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ उद्धिद्‌ आदि अनेक रूपोंमें प्रकट हुआ है, उसी प्रकार एक ही अग्नितत्त्व प्रजापतिके शरीरसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हुआ है

मार्कण्डेय उवाच—एष भगवान् अग्निः प्रथमोऽङ्गिरा इति च प्रसिद्धः, एक एव विज्ञेयः। स तु यथा ज्योतिष्टोमः क्रतुरेकः बहुधा प्रवर्तते, तथा प्रजापतेः कायादेकमेवाग्नितत्त्वं निःसृत्य नानारूपेण प्रादुर्भूतम्।

Frequently Asked Questions

How to preserve marital stability and avert rivalry-driven discord through disciplined conduct—especially reception etiquette, controlled speech, and prudent social alignment within a household marked by multiple relationships and external pressures.

Affection and stability are maintained through intentional service, restraint, and situational awareness: respect in daily rituals, confidentiality, avoidance of heedlessness, and association with ethically reputable companions.

It does not present a formal phalaśruti formula; however, it implies outcomes—reputation, prosperity, social harmony, and merit—by describing the benefits of the husband’s favor and the social consequences of disciplined versus careless conduct.