उद्योगपर्व — अध्याय ९३: कृष्णस्य धृतराष्ट्रोपदेशः
Kṛṣṇa’s Counsel to Dhṛtarāṣṭra in the Assembly
आचतक्षेतां तु कृष्णस्य धृतराष्ट्रं सभागतम् । कुरूंश्व॒ भीष्मप्रमुखान् राज्ञ: सर्वाश्व पार्थिवान्,इसी समय राजा दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि भी संध्योपासनामें लगे हुए अपराजित वीर दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके पास आये और उनसे इस प्रकार बोले--“गोविन्द! महाराज धृतराष्ट्र सभामें आ गये हैं। भीष्म आदि कौरव तथा अन्य समस्त भूपाल भी वहाँ उपस्थित हैं। जैसे स्वर्गमें देवता इन्द्रका आवाहन करते हैं, इसी प्रकार भीष्म आदि सब लोग आपसे वहाँ दर्शन देनेकी प्रार्थना करते हैं।! यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वचनद्वारा उन दोनोंका अभिनन्दन किया
ācacakṣetāṃ tu kṛṣṇasya dhṛtarāṣṭraṃ sabhāgatam | kurūṃś ca bhīṣmapramukhān rājñaḥ sarvāṃś ca pārthivān |
वैशम्पायन उवाच— आचक्षेतां तु कृष्णस्य धृतराष्ट्रं सभागतम् । कुरूंश्च भीष्मप्रमुखान् राज्ञः सर्वांश्च पार्थिवान् ॥ “गोविन्द! सभायां धृतराष्ट्रः प्रविष्टः; भीष्मप्रमुखाः कुरवः सर्वे च पार्थिवाः समागताः। दिवि देवाः शक्रमिव, तथा त्वामाह्वयन्ति— आगच्छ, दर्शनं देहि।” इति श्रुत्वा भगवान् श्रीकृष्णः परमवल्गुना साम्ना तौ समभिनन्दत्।
वैशम्पायन उवाच
Even when approached by politically motivated actors, Kṛṣṇa responds with measured, soothing speech—modeling restraint, courtesy, and diplomatic composure as instruments of dharma in a volatile pre-war setting.
Duryodhana and Śakuni come to Kṛṣṇa during evening worship and convey that Dhṛtarāṣṭra, Bhīṣma, the Kurus, and many kings are assembled and request Kṛṣṇa to appear in the court; Kṛṣṇa receives the message and greets them with calming words.