Adhyaya 3
Svargarohana ParvaAdhyaya 349 Verses

Adhyaya 3

स्वर्गारोहणपर्व — तृतीयोऽध्यायः (Indra and Dharma’s Consolation; Celestial Gaṅgā Purification)

Upa-parva: Svargārohaṇa (Divine Consolation and Purification Episode)

Vaiśaṃpāyana reports that after Yudhiṣṭhira stands briefly in the prior grim setting, the devas arrive led by Śakra (Indra), alongside Maruts, Vasus, Aśvins, Rudras, Ādityas, Siddhas, and great ṛṣis. With their luminous presence, the infernal markers—Vaitaraṇī, Kūṭaśālmalī, iron cauldrons, and other punitive visions—cease to appear, and an auspicious, fragrant, cooling wind arises. Indra addresses Yudhiṣṭhira with reassurance: the gods are pleased; his success is secured; and the experience of naraka is described as a necessary sight for kings, interpreted through a doctrine of karmic sequencing (some enjoy merit first then suffer, others suffer first then enjoy). Indra further explains that Yudhiṣṭhira’s brief ordeal corresponds to a residual ethical blemish linked to a ‘vyāja’ (pretext/deception) involving Droṇa, and that similar ‘by pretext’ descents applied to his companions. He is invited to behold his allies and even Karṇa established in their proper stations, and to relinquish grief. Dharma then appears in embodied form, explicitly praising Yudhiṣṭhira’s devotion, truthfulness, forbearance, and self-restraint, stating that this is the third and final test, and clarifying that the earlier perception of the brothers’ suffering was a divinely arranged māyā. Indra and Dharma guide him to the celestial Gaṅgā (Ākāśa-Gaṅgā); upon immersion, Yudhiṣṭhira’s human condition falls away, he attains a divine body, becomes free of enmity and distress, and proceeds surrounded by devas and praised by sages.

Chapter Arc: नरक-दर्शन के धुएँ और भय के बीच युधिष्ठिर को अचानक दिव्य प्रकाश का स्पर्श मिलता है—देवगण आते हैं और तमस छँटने लगता है। → युधिष्ठिर के चारों ओर दिखते विकृत शरीर और पीड़ा के दृश्य एक-एक कर अदृश्य होते हैं; तभी साक्षात् धर्म देह धारण कर उपस्थित होते हैं और इस विचित्र अनुभव का अर्थ खोलने लगते हैं—कर्मफल की दो राशियाँ, शुभ-अशुभ, और उनका क्रम। → धर्म युधिष्ठिर को कर्मफल-क्रम का रहस्य सुनाते हैं: कोई पहले नरक भोगकर फिर स्वर्ग पाता है, और कोई पहले स्वर्ग भोगकर फिर नरक—यह क्रम शेष बचे पुण्य-पाप के ‘भोग’ से तय होता है; साथ ही वे बताते हैं कि यह नरक-दर्शन ‘व्याज’ (उपाय/छल) से कराया गया था। → धर्म स्पष्ट करते हैं कि यह परीक्षा और दर्शन युधिष्ठिर के कल्याण हेतु था; फिर वे युधिष्ठिर को दिखाते हैं कि युद्ध में मारे गए अनेक राजा और योद्धा पापमुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त हो चुके हैं। अंततः युधिष्ठिर की सिद्धि और अक्षय लोकों की प्राप्ति की घोषणा होती है। → धर्म यह भी खोलते हैं कि द्रौपदी और पाण्डव भ्राताओं को भी इसी प्रकार ‘व्याज’ से नरक-दर्शन कराया गया—पाठक के मन में प्रश्न उठता है कि उनके सूक्ष्म दोष क्या थे और स्वर्गारोहण का अंतिम दृश्य कैसे पूर्ण होगा।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत स्वगरिह्हणपर्वमें युधिष्टिरकों नरकका दर्शनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥/ २ ॥ ऑपन-माज बछ। अल तृतीयो<थध्याय: इन्द्र और धर्मका युधिष्िरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना वैशम्पायन उवाच स्थिते मुहूर्त पार्थे तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । आजम्मुस्तत्र कौरव्य देवा: शक्रपुरोगमा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरको उस स्थानपर खड़े हुए अभी दो ही घड़ी बीतने पायी थी कि इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता वहाँ आ पहुँचे

स्थिते मुहूर्ते पार्थे तु धर्मराजे युधिष्ठिरे। आजग्मुस्तत्र कौरव्य देवाः शक्रपुरोगमाः॥

Verse 2

सच विग्रहवान्‌ धर्मो राजानं प्रसमीक्षितुम्‌ तत्राजगाम यत्रासौ कुरुराजो युधिषिर:,साक्षात्‌ धर्म भी शरीर धारण करके राजासे मिलनेके लिये उस स्थानपर आये जहाँ वे कुरुराज युधिष्छिर विद्यमान थे

स च विग्रहवान् धर्मो राजानं प्रसमीक्षितुम्। तत्राजगाम यत्रासौ कुरुराजो युधिष्ठिरः॥

Verse 3

तेषु भासुरदेहेषु पुण्याभिजनकर्मसु । समागतेषु देवेषु व्यगमत्‌ तत्‌ तमो नृूप,राजन्‌! जिनके कुल और कर्म पवित्र हैं, उन तेजस्वी शरीरवाले देवताओंके आते ही वहाँका सारा अन्धकार दूर हो गया इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि युधिष्ठिरतनुत्यागे तृतीयो5ध्याय:

तेषु भासुरदेहेषु पुण्याभिजनकर्मसु । समागतेषु देवेषु व्यगमत् तत् तमो नृप ॥

Verse 4

नादृश्यन्त च तास्तत्र यातना: पापकर्मिणाम्‌ | नदी वैतरणी चैव कूटशाल्मलिना सह

नादृश्यन्त च तास्तत्र यातनाः पापकर्मिणाम् । नदी वैतरणी चैव कूटशाल्मलिना सह ॥

Verse 5

विकृतानि शरीराणि यानि तत्र समन्तत:,ववौ देवसमीपस्थ: शीतलो5तीव भारत | कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिरने वहाँ चारों ओर जो विकृत शरीर देखे थे वे सभी अदृश्य हो गये। तदनन्तर वहाँ पावन सुगन्ध लेकर बहनेवाली पवित्र सुखदायिनी वायु चलने लगी। भारत! देवताओंके समीप बहती हुई वह वायु अत्यन्त शीतल प्रतीत होती थी

विकृतानि शरीराणि यानि तत्र समन्ततः । ववौ देवसमीपस्थः शीतलोऽतीव भारत ॥

Verse 6

ददर्श राजा कौरव्यस्तान्यदृश्यानि चाभवन्‌ । ततो वायु: सुखस्पर्श: पुण्यगन्धवह: शुचि:

ददर्श राजा कौरव्यस्तान्यदृश्यानि चाभवन् । ततो वायुः सुखस्पर्शः पुण्यगन्धवहः शुचिः ॥

Verse 7

मरुत: सह शक्रेण वसवश्चाश्चिनौ सह

मरुतः सह शक्रेण वसवश्चाश्विनौ सह ॥

Verse 8

साध्या रुद्रास्तथा55दित्या ये चान्येडपि दिवौकस: । सर्वे तत्र समाजग्मु: सिद्धाश्व॒ परमर्षय:

वैशम्पायन उवाच—साध्याः रुद्रास्तथाऽऽदित्याः ये चान्येऽपि दिवौकसः । सर्वे तत्र समाजग्मुः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥

Verse 9

यत्र राजा महातेजा थधर्मपुत्र: स्थितो5भवत्‌ । इन्द्रके साथ मरुद्गण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार, साध्यगण, रुद्रगण, आदित्यगण, अन्यान्य देवलोकवासी सिद्ध और महर्षि सभी उस स्थानपर आये जहाँ महातेजस्वी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े थे ।। ततः शक्र: सुरपति: श्रिया परमया युत:

यत्र राजा महातेजा धर्मपुत्रः स्थितोऽभवत् । तत्रेन्द्रः सह मरुद्गणैर्वसुगणैश्च समागतः । अश्विनौ च तथा साध्याः रुद्राः आदित्यकास्तथा । अन्ये च दिवौकसः सिद्धा महर्षयस्तथा ॥ ततः शक्रः सुरपतिः श्रिया परमया युतः ॥

Verse 10

युधिष्ठिर महाबाहो लोकाश्षाप्यक्षयास्तव,“महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं। पुरुषसिंह! प्रभो! अबतक जो हुआ सो हुआ। अब अधिक कष्ट उठानेकी आवश्यकता नहीं है। आओ हमारे साथ चलो। महाबाहो! तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि मिली है; साथ ही अक्षयलोकोंकी भी प्राप्ति हुई है

वैशम्पायन उवाच—महाबाहो युधिष्ठिर लोकास्तवाक्षयाः स्मृताः । पुरुषसिंह प्रभो यत्तद्भूतं भूतमेव तत् । नातः परं त्वया दुःखं सोढव्यं नृपसत्तम । आगच्छास्माभिरस्माकं सह गच्छ महाबाहो । महतीं सिद्धिमापन्नोऽक्षयान् लोकानवाप्तवान् ॥

Verse 11

“महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं। पुरुषसिंह! प्रभो! अबतक जो हुआ सो हुआ। अब अधिक कष्ट उठानेकी आवश्यकता नहीं है। आओ हमारे साथ चलो। महाबाहो! तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि मिली है; साथ ही अक्षयलोकोंकी भी प्राप्ति हुई है

महाबाहो युधिष्ठिर त्वयाऽक्षयाः समवाप्ताः लोकाः । पुरुषसिंह प्रभो यावदिदानीं यदभूत तत् । नातः परं त्वया दुःखं सोढव्यं नृपसत्तम । आगच्छ गच्छास्माभिः सह महाबाहो । महतीं सिद्धिमापन्नो नित्यलोकानवाप्तवान् ॥

Verse 12

न च मन्युस्त्वया कार्य: शृणु चेद॑ वचो मम | अवश्यं नरकस्तात द्रष्टव्य: सर्वराजभि:,“तात! तुम्हें जो नरक देखना पड़ा है इसके लिये क्रोध न करना। मेरी यह बात सुनो! समस्त राजाओंको निश्चय ही नरक देखना पड़ता है

न च मन्युस्त्वया कार्यः शृणु चेदं वचो मम । अवश्यं नरकस्तात द्रष्टव्यः सर्वराजभिः ॥

Verse 13

शुभानामशुभानां च द्वौ राशी पुरुषर्षभ । यः पूर्व सुकृतं भुड्चक्ते पश्चान्रिरयमेव स:,'पुरुषप्रवर! मनुष्यके जीवनमें शुभ और अशुभ कर्मोंकी दो राशियाँ सज्चित होती हैं। जो पहले ही शुभ कर्म भोग लेता है उसे पीछे नरकमें ही जाना पड़ता है

वैशम्पायन उवाच— शुभानामशुभानां च द्वौ राशी पुरुषर्षभ । यः पूर्वं सुकृतं भुङ्क्ते पश्चान्निरयमेव सः ॥

Verse 14

पूर्व नरकभाग्‌ यस्तु पश्चात्‌ स्वर्गमुपैति सः । भूयिष्ठं पापकर्मा यः स पूर्व स्वर्गमश्षुते,'परंतु जो पहले नरक भोग लेता है वह पीछे स्वर्गमें जाता है। जिसके पास पापकर्मोका संग्रह अधिक है वह पहले ही स्वर्ग भोग लेता है

पूर्वं नरकभाग् यस्तु पश्चात् स्वर्गमुपैति सः । भूयिष्ठं पापकर्मा यः स पूर्वं स्वर्गमश्नुते ॥

Verse 15

तेन त्वमेवं गमितो मया श्रेयोडर्थिना नूप । व्याजेन हि त्वया द्रोण उपचीर्ण: सुतं प्रति

तेन त्वमेवं गमितो मया श्रेयोधर्थिना नृप । व्याजेन हि त्वया द्रोण उपचीर्णः सुतं प्रति ॥

Verse 16

यथैव त्वं तथा भीमस्तथा पार्थो यमौ तथा

यथैव त्वं तथा भीमस्तथा पार्थो यमौ तथा ॥

Verse 17

आगच्छ नरशार्दूल मुक्तास्ते चैव कल्मषात्‌,'पुरुषसिंह! आओ, वे सभी पापसे मुक्त हो गये हैं। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे पक्षके जो-जो राजा युद्धमें मारे गये हैं वे सभी स्वर्गलोकमें आ पहुँचे हैं। चलो, उनका दर्शन करो

आगच्छ नरशार्दूल मुक्तास्ते चैव कल्मषात् ।

Verse 18

स्वपक्ष्याश्वैव ये तुभ्यं पार्थिवा निहता रणे । सर्वे स्वर्गमनुप्राप्तास्तान्‌ पश्य भरतर्षभ,'पुरुषसिंह! आओ, वे सभी पापसे मुक्त हो गये हैं। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे पक्षके जो-जो राजा युद्धमें मारे गये हैं वे सभी स्वर्गलोकमें आ पहुँचे हैं। चलो, उनका दर्शन करो

स्वपक्ष्याश्चैव ये तुभ्यं पार्थिवा निहता रणे । सर्वे स्वर्गमनुप्राप्तास्तान् पश्य भरतर्षभ ॥

Verse 19

कर्णश्रैव महेष्वास: सर्वशस्त्रभृतां वर: । स गत: परमां सिद्धि यदर्थ परितप्यसे,“तुम जिनके लिये सदा संतप्त रहते हो वे सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर कर्ण भी परम सिकद्धिको प्राप्त हुए हैं

कर्णश्चैव महेष्वासः सर्वशस्त्रभृतां वरः । स गतः परमां सिद्धिं यदर्थं परितप्यसे ॥

Verse 20

त॑ पश्य पुरुषव्याप्रमादित्यतनयं विभो । स्वस्थानस्थं महाबाहो जहि शोकं नरर्षभ,'प्रभो! नरश्रेष्ठ! महाबाहो! तुम पुरुषसिंह सूर्यकुमार कर्णका दर्शन करो। वे अपने स्थानमें स्थित हैं। तुम उनके लिये शोक त्याग दो

तं पश्य पुरुषव्याघ्रमादित्यतनयं विभो । स्वस्थानस्थं महाबाहो जहि शोकं नरर्षभ ॥

Verse 21

भ्रातृश्चान्यांस्तथा पश्य स्वपक्ष्याश्रैव पार्थिवान्‌ । स्वं स्वं स्थानमनुप्राप्तान्‌ व्येतु ते मानसो ज्वर:,“अपने दूसरे भाइयोंको तथा पाण्डवपक्षके अन्यान्य राजाओंको भी देखो। वे सब अपने-अपने योग्य स्थानको प्राप्त हुए हैं। उन सबकी सद्गतिके विषयमें अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये

भ्रातॄंश्चान्यान्तथा पश्य स्वपक्ष्यांश्चैव पार्थिवान् । स्वं स्वं स्थानमनुप्राप्तान् व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥

Verse 22

कृच्छू पूर्व चानुभूय इत:प्रभूति कौरव । विहरस्व मया साथे गतशोको निरामय:,“कुरुनन्दन! पहले कष्टका अनुभव करके अबसे तुम मेरे साथ रहकर रोग-शोकसे रहित हो स्वच्छन्द विहार करो

कृच्छ्रं पूर्वं चानुभूय इतःप्रभृति कौरव । विहरस्व मया सार्धं गतशोको निरामयः ॥

Verse 23

कर्मणां तात पुण्यानां जितानां तपसा स्वयम्‌ । दानानां च महाबाहो फल प्राप्रुहि पार्थिव,“तात! महाबाहु! पृथ्वीनाथ! अपने किये हुए पुण्यकर्मोंका, तपस्यासे जीते हुए लोकोंका और दानींका फल भोगो

वैशम्पायन उवाच— तात! महाबाहो पार्थिव! स्वयमेव तपसा जितानां पुण्यकर्मणां दानानां च फलानि प्राप्नुहि भुङ्क्ष्व च।

Verse 24

अद्य त्वां देवगन्धर्वा दिव्याश्षाप्सरसो दिवि | उपसेवन्तु कल्याण्यो विरजो<म्बरभूषणा:,“आजसे देव, गन्धर्व तथा कल्याणस्वरूपा दिव्य अप्सराएँ स्वच्छ वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो स्वर्गलोकमें तुम्हारी सेवा करें

अद्य त्वां देवगन्धर्वा दिवि दिव्याः शुभाः अप्सरसश्च विरजाम्बरभूषणाः उपसेवन्तु।

Verse 25

राजसूयजिताॉल्लोकान श्वमेधाभिवर्धितान्‌ । प्राप्रुहि त्वं महाबाहो तपसश्न महाफलम्‌,“महाबाहो! राजसूय यज्ञद्वारा जीते हुए तथा अश्वमेध यज्तद्वारा वृद्धिको प्राप्त हुए पुण्य लोकोंको प्राप्त करो और अपने तपके महान्‌ फलको भोगो

राजसूयजितान् लोकान् अश्वमेधाभिवर्धितान् प्राप्नुहि त्वं महाबाहो, तपसश्च महाफलम्।

Verse 26

उपर्युपरि राज्ञां हि तव लोका युधिष्छिर । हरिश्वन्द्रसमा: पार्थ येषु त्वं विहरिष्यसि,“कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हें प्राप्त हुए सम्पूर्ण लोक राजा हरिश्वन्द्रके लोकोंकी भाँति सब राजाओंके लोकोंसे ऊपर हैं; जिनमें तुम विचरण करोगे

उपर्युपरि राज्ञां हि तव लोका युधिष्ठिर। हरिश्चन्द्रसमाः पार्थ येषु त्वं विहरिष्यसि॥

Verse 27

मान्धाता यत्र राजर्षियत्र राजा भगीरथ: । दौष्यन्तिर्यत्र भरतस्तत्र त्वं विहरिष्यसि

मान्धाता यत्र राजर्षिर्यत्र राजा भगीरथः। दौष्यन्तिर्यत्र भरतस्तत्र त्वं विहरिष्यसि॥

Verse 28

“जहाँ राजर्षि मान्धाता, राजा भगीरथ और दुष्यन्तकुमार भरत गये हैं, उन्हीं लोकोंमें तुम भी विहार करोगे ।। एषा देवनदी पुण्या पार्थ त्रैलोक्यपावनी । आकाशगड़् राजेन्द्र तत्राप्लुत्य गमिष्यसि,'पार्थ! ये तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली पुण्यसलिला देवनदी आकाशगड़ा हैं। राजेन्द्र! इनके जलमें गोता लगाकर तुम दिव्य लोकोंमें जा सकोगे

वैशम्पायन उवाच— यत्र राजर्षिर्मान्धाता राजा भगीरथो दुष्यन्तपुत्रो भरतश्च गताः, तेष्वेव लोकेषु त्वमपि विहरिष्यसि। एषा देवनदी पुण्या, पार्थ, त्रैलोक्यपावनी—आकाशगङ्गा। राजेन्द्र, अस्यां निमज्ज्य त्वं दिव्यान् लोकान् गमिष्यसि।

Verse 29

अत्र स्नातस्य भावस्ते मानुषो विगमिष्यति । गतशोको निरायासो मुक्तवैरो भविष्यसि,“मन्दाकिनीके इस पवित्र जलमें स्नान कर लेनेपर तुम्हारा मानव-स्वभाव दूर हो जायगा। तुम शोक, संताप और वैरभावसे छुटकारा पा जाओगे”

अत्र स्नातस्य ते भावो मानुषो विगमिष्यति। गतशोको निरायासो मुक्तवैरो भविष्यसि॥

Verse 30

एवं ब्रुवति देवेन्द्रे कौरवेन्द्रं युधिष्ठिरम्‌ । धर्मो विग्रहवान्‌ साक्षादुवाच सुतमात्मन:,देवराज इन्द्र जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय शरीर धारण करके आये हुए साक्षात्‌ धर्मने अपने पुत्र कौरवराज युधिष्ठिससे कहा--

एवं ब्रुवति देवेन्द्रे कौरवेन्द्रं युधिष्ठिरम्। धर्मो विग्रहवान् साक्षादुवाच सुतमात्मनः॥

Verse 31

भो भो राजन महाप्राज्ञ प्रीतो5स्मि तव पुत्रक । मद्धकत्या सत्यवाक्यैश्नल क्षमया च दमेन च,“महाप्राज्ञ नरेश! मेरे पुत्र! तुम्हारे धर्मविषयक अनुराग, सत्यभाषण, क्षमा और इन्द्रियसंयम आदि गुणोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ

भो भो राजन् महाप्राज्ञ प्रीतोऽस्मि तव पुत्रक। मद्भक्त्या सत्यवाक्यैश्च क्षमया च दमेन च॥

Verse 32

एषा तृतीया जिज्ञासा तव राजन्‌ कृता मया | न शकक्‍्यसे चालयितु स्वभावात्‌ पार्थ हेतुतः,“राजन! यह मैंने तीसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी। पार्थ! किसी भी युक्तिसे कोई तुम्हें अपने स्वभावसे विचलित नहीं कर सकता

एषा तृतीया जिज्ञासा तव राजन् कृता मया। न शक्यसे चालयितुं स्वभावात् पार्थ हेतुतः॥

Verse 33

पूर्व परीक्षितो हि त्व॑ं प्रश्नाद्‌ द्वैृतवने मया । अरणीसहितस्यार्थ तच्च निस्तीर्णवानसि,'द्वैतववनमें अरणिकाष्ठका अपहरण करनेके पश्चात्‌ जब यक्षके रूपमें मैंने तुमसे कई प्रश्न किये थे वह मेरे द्वारा तुम्हारी पहली परीक्षा थी। उसमें तुम भलीभाँति उत्तीर्ण हो गये

वैशम्पायन उवाच—पूर्वं द्वैतवने प्रश्नैर्मया त्वं परीक्षितः। अरणीसहितस्यार्थे तच्च त्वं निस्तीर्णवानसि॥

Verse 34

सोदर्येषु विनष्टेषु द्रौपद्या तत्र भारत । श्वरूपधारिणा तत्र पुनस्त्व॑ मे परीक्षित:,“भारत! फिर द्रौपदीसहित तुम्हारे सभी भाइयोंकी मृत्यु हो जानेपर कुत्तेका रूप धारण करके मैंने दूसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी। उसमें भी तुम सफल हुए

वैशम्पायन उवाच—सोदर्येषु विनष्टेषु द्रौपद्याश्चैव भारत। श्वस्वरूपधृता तत्र पुनस्त्वं मे परीक्षितः॥

Verse 35

इदं तृतीयं भ्रातृणामर्थ यत्‌ स्थातुमिच्छसि । विशुद्धोईसि महाभाग सुखी विगतकल्मष:,“अब यह तुम्हारी परीक्षाका तीसरा अवसर था; किंतु इस बार भी तुम अपने सुखकी परवा न करके भाइयोंके हितके लिये नरकमें रहना चाहते थे, अतः महाभाग! तुम इस तरहसे शुद्ध प्रमाणित हुए। तुममें पापका नाम भी नहीं है; अत: सुखी होओ

वैशम्पायन उवाच—इदं तृतीयं भ्रातृणामर्थे यत्स्थातुमिच्छसि। विशुद्धोऽसि महाभाग सुखी भव विगतकल्मषः॥

Verse 36

नच ते भ्रातरः पार्थ नरकार्हा विशाम्पते । मायैषा देवराजेन महेन्द्रेण प्रयोजिता,'पार्थ! प्रजानाथ! तुम्हारे भाई नरकमें रहनेके योग्य नहीं हैं। तुमने जो उन्हें नरक भोगते देखा है वह देवराज इन्द्रद्वारा प्रकट की हुई माया थी

वैशम्पायन उवाच—न च ते भ्रातरः पार्थ नरकार्हा विशाम्पते। मायैषा देवराजेन महेन्द्रेण प्रयोजिता॥

Verse 37

अवश्यं नरकास्तात द्रष्टव्या: सर्वराजभि: । ततस्त्वया प्राप्तमिदं मुहूर्त दुःखमुत्तमम्‌,“तात! समस्त राजाओंको नरकका दर्शन अवश्य करना पड़ता है; इसलिये तुमने दो घड़ीतक यह महान्‌ दु:ख प्राप्त किया है

वैशम्पायन उवाच—अवश्यं नरकास्तात द्रष्टव्याः सर्वराजभिः। ततस्त्वया प्राप्तमिदं मुहूर्तदुःखमुत्तमम्॥

Verse 38

न सव्यसाची भीमो वा यमौ वा पुरुषर्षभौ | कर्णो वा सत्यवाक्‌ शूरो नरकार्ह श्चिरं नृप

वैशम्पायन उवाच—न सव्यसाची भीमो वा यमौ वा पुरुषर्षभौ। कर्णो वा सत्यवाक् शूरो नरकार्हश्चिरं नृप॥

Verse 39

“नरेश्वर! सव्यसाची अर्जुन, भीमसेन, पुरुषप्रवर नकुल-सहदेव अथवा सत्यवादी शूरवीर कर्ण--इनमेंसे कोई भी चिरकालतक नरकमें रहनेके योग्य नहीं है ।। न कृष्णा राजपुत्री च नरकार्हा कथंचन । एहोहि भरतश्रेष्ठ पश्य गड्जां त्रिलोकगाम्‌,“भरतश्रेष्ठ) राजकुमारी कृष्णा भी किसी तरह नरकमें जानेयोग्य नहीं है। आओ, त्रिभुवनगामिनी गंगाजीका दर्शन करो”

वैशम्पायन उवाच—नरेश्वर! न सव्यसाची अर्जुनो भीमसेनो न च पुरुषप्रवरौ नकुलसहदेवौ। न वा सत्यवादी शूरवीरः कर्णः कश्चिद् एतेषु चिरं नरके वासयोग्यः॥ न च कृष्णा राजपुत्री नरकार्हा कथञ्चन। एहि भरतश्रेष्ठ पश्य गङ्गां त्रिलोकगामिनीम्॥

Verse 40

एवमुक्त: स राजर्षिस्तव पूर्वपितामह: । जगाम सह धर्मेण सर्वैक्ष त्रिदिवालयै:,जनमेजय! धर्मके यों कहनेपर तुम्हारे पूर्वपितामह राजर्षि युधिष्ठिरने धर्म तथा समस्त स्वर्गवासी देवताओंके साथ जाकर मुनिजनवन्दित परम पावन पुण्यसलिला देवनदी गड़ाजीमें स्नान किया। स्नान करके राजाने तत्काल अपने मानवशरीरको त्याग दिया

वैशम्पायन उवाच—एवमुक्तः स राजर्षिस्तव पूर्वपितामहः। जगाम सह धर्मेण सर्वैश्च त्रिदिवालयैः जनमेजय॥

Verse 41

गड्ढां देवनदीं पुण्यां पावनीमृषिसंस्तुताम्‌ । अवगाहा ततो राजा तनुं तत्याज मानुषीम्‌,जनमेजय! धर्मके यों कहनेपर तुम्हारे पूर्वपितामह राजर्षि युधिष्ठिरने धर्म तथा समस्त स्वर्गवासी देवताओंके साथ जाकर मुनिजनवन्दित परम पावन पुण्यसलिला देवनदी गड़ाजीमें स्नान किया। स्नान करके राजाने तत्काल अपने मानवशरीरको त्याग दिया

वैशम्पायन उवाच—गङ्गां देवनदीं पुण्यां पावनीमृषिसंस्तुताम्। अवगाह्य ततो राजा तनुं त्यक्त्वा मानुषीम् जनमेजय॥

Verse 42

ततो दिव्यवपुर्भूत्वा धर्मराजो युधिष्िर: । निर्वेरो गतसंतापो जले तस्मिन्‌ समाप्लुत:,तत्पश्चात्‌ दिव्यदेह धारण करके धर्मराज युधिष्ठिर वैरभावसे रहित हो गये। मन्दाकिनीके शीतल जलमें स्नान करते ही उनका सारा संताप दूर हो गया

वैशम्पायन उवाच—ततो दिव्यवपुर्भूत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः। निर्वैरः गतसन्तापो जले तस्मिन् समाप्लुतः॥

Verse 43

लोहकुम्भ्य: शिलाश्वैव नादृश्यन्त भयानका: । वहाँ पापकर्मी पुरुषोंको जो यातनाएँ दी जाती थीं वे सहसा अदृश्य हो गयीं। न वैतरणी नदी रह गयी, न कूटशाल्मलि वृक्ष। लोहेके कुम्भ और लोहमयी भयंकर तप्त शिलाएँ भी नहीं दिखायी देती थीं,ततो ययौ वृतो देवै: कुरुराजो युधिष्ठिर: । धर्मेण सहितो धीमान्‌ स्तूयमानो महर्षिभि: तत्पश्चात्‌ देवताओंसे घिरे हुए बुद्धिमान्‌ कुरुराज युधिष्छठिर महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए धर्मके साथ उस स्थानको गये जहाँ वे पुरुषसिंह शूरवीर पाण्डव और धृतराष्ट्रपुत्र क्रोध त्यागकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानोंपर रहते थे

लोहकुम्भ्यः शिलाश्चैव नादृश्यन्त भयानकाः । ततो ययौ वृतो देवैः कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ धर्मेण सहितो धीमान् स्तूयमानो महर्षिभिः । यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शूरा विगतमन्यवः ॥ पाण्डवाः धार्तराष्ट्राश्च स्वानि स्थानानि भेजिरे ॥

Verse 44

यत्र ते पुरुषव्याप्रा: शूरा विगतमन्यव: । पाण्डवा धार्तराष्ट्रश्न स्वानि स्थानानि भेजिरे,तत्पश्चात्‌ देवताओंसे घिरे हुए बुद्धिमान्‌ कुरुराज युधिष्छठिर महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए धर्मके साथ उस स्थानको गये जहाँ वे पुरुषसिंह शूरवीर पाण्डव और धृतराष्ट्रपुत्र क्रोध त्यागकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानोंपर रहते थे

यत्र ते पुरुषव्याप्राः शूरा विगतमन्यवः । पाण्डवाः धार्तराष्ट्राश्च स्वानि स्थानानि भेजिरे ॥ ततो ययौ वृतो देवैः कुरुराजो युधिष्ठिरः । धर्मेण सहितो धीमान् स्तूयमानो महर्षिभिः ॥

Verse 66

ववौ देवसमीपस्थ: शीतलो5तीव भारत | कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिरने वहाँ चारों ओर जो विकृत शरीर देखे थे वे सभी अदृश्य हो गये। तदनन्तर वहाँ पावन सुगन्ध लेकर बहनेवाली पवित्र सुखदायिनी वायु चलने लगी। भारत! देवताओंके समीप बहती हुई वह वायु अत्यन्त शीतल प्रतीत होती थी

ववौ देवसमीपस्था शीतला तीव भारत । युधिष्ठिरस्य दृष्टानि विकृतानि शरीरिणाम् ॥ सर्वाण्यदृश्यतां यान्ति तदनन्तरमेव हि । ततो गन्धवहा पुण्या सुखदा पावनी अनिला ॥ प्रववौ देवसमीपस्था शीतला तीव भारत ॥

Verse 93

युधिष्ठिरमुवाचेदं सान्त्वपूर्वमिदं वच: । तदनन्तर उत्तम शोभासे सम्पन्न देवराज इन्द्रने युधिष्ठिरको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा

युधिष्ठिरमुवाचेदं सान्त्वपूर्वमिदं वचः । तदनन्तरं देवराज इन्द्रः परमशोभनः ॥ सान्त्वयन् युधिष्ठिरं प्राह वाक्यं शनैरिव ॥

Verse 131

एहोहि पुरुषव्यात्र कृतमेतावता विभो । सिद्धि: प्राप्ता महाबाहो लोकाश्षाप्यक्षयास्तव

एहोहि पुरुषव्याघ्र कृतमेतावता विभो । सिद्धिः प्राप्ता महाबाहो लोकाश्चाप्यक्षयास्तव ॥

Verse 153

व्याजेनैव ततो राजन्‌ दर्शितो नरकस्तव । “नरेश्वर! मैंने तुम्हारे कल्याणकी इच्छासे तुम्हें पहले ही इस प्रकार नरकका दर्शन करानेके लिये यहाँ भेज दिया है। राजन! तुमने गुरुपुत्र अश्वत्थामाके विषयमें छलसे काम लेकर द्रोणाचार्यको उनके पुत्रकी मृत्युका विश्वास दिलाया था, इसलिये तुम्हें भी छलसे ही नरक दिखलाया गया है

वैशम्पायन उवाच—राजन्, व्याजेनैव तव नरकः प्रदर्शितः। यथा त्वं द्रोणाचार्यं गुरुपुत्रेऽश्वत्थामनि विषयं कृत्वा छलोपायेन तस्य मृत्युविश्वासं कारितवान्, तथैव त्वमपि छलोपायेन नरकं दर्शितवान्।

Verse 1636

द्रौपदी च तथा कृष्णा व्याजेन नरकं गता: । 'जैसे तुम यहाँ लाये गये थे उसी प्रकार भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा ट्रपदकुमारी कृष्णा--ये सभी छलसे नरकके निकट लाये गये थे

वैशम्पायन उवाच—द्रौपदी च तथा कृष्णा व्याजेन नरकं गता। यथा त्वं तत्र नीतः, तथैव भीमसेनार्जुननकुलसहदेवाश्च द्रुपदकन्या कृष्णा च—एते सर्वे व्याजेन नरकसमीपं नीताः।

Frequently Asked Questions

The chapter confronts how a righteous king should respond when reality appears to contradict moral expectation—whether to accept personal elevation or to remain loyal to companions and to truth, even amid distressing visions.

Karmic results are depicted as temporally ordered rather than simplistic: merit and demerit may ripen in different sequences, and apparent injustice can function as a limited, instructive ordeal rather than a final verdict.

Yes: Dharma states the vision was māyā arranged by Indra, clarifies it as Yudhiṣṭhira’s third examination, and presents immersion in the celestial Gaṅgā as the transition point where the human state is relinquished and reconciliation is completed.