Vidyā–Avidyā and the Twenty-Fifth Principle
Sāṃkhya–Yoga Clarification
स जानन्नपि चाकार्यमर्थार्थ सेवते नर: । बालस्नेहपरीतात्मा तत्क्षयाच्चानुतप्यते,यद्यपि मनुष्य जानता है कि अमुक काम करना पाप है, तो भी वह धनके लिये उसका सेवन करता है। बाल-बच्चोंके स्नेहमें उसका मन डूबा रहता है और उनमेंसे जब कोई मर जाता है तब उनके लिये वह बारंबार संतप्त होता है
sa jānann api cākāryam arthārtha sevate naraḥ | bāla-sneha-parītātmā tat-kṣayāc cānutapyate ||
स जानन्नपि चाकार्यमर्थार्थं सेवते नरः। बालस्नेहपरीतात्मा तत्क्षयाच्चानुतप्यते॥
पराशर उवाच