कपिलगोसंवादे गृहस्थ-त्यागधर्मयोः प्रमाण्यविचारः
Kapila–Cow Dialogue: Authority of Householder and Renunciant Dharmas
तत्रापातयतां राजन शिरस्यण्डानि खेचरौ । तान्यबुध्यत तेजस्वी स विप्र: संशितव्रत:,राजन! धीरे-धीरे वर्षा-ऋतु बीत गयी और शरत्काल उपस्थित हुआ। उस समय कामसे मोहित होकर उन गौरैयोंने संतानोत्पादनकी विधिसे परस्पर समागम किया और विश्वासके कारण महर्षिके सिरपर ही अण्डे दिये। कठोर व्रतका पालन करनेवाले उन तेजस्वी ब्राह्मणको यह मालूम हो गया कि पक्षियोंने मेरी जटाओंमें अण्डे दिये हैं
tatrāpātayatāṃ rājan śirasy aṇḍāni khecarau | tāny abudhyata tejasvī sa vipraḥ saṃśitavrataḥ ||
तत्रापातयतां राजन् शिरस्यण्डानि खेचरौ । तान्यबुध्यत तेजस्वी स विप्रः संशितव्रतः ॥
भीष्म उवाच