Nārada–Vāyu–Śalmali Upākhyāna: Enmity with the Strong and the Primacy of Buddhi (नारद-वायु-शल्मलि उपाख्यानम्)
ऋषिर्दष्टवा नृपं तत्र जगहें सुभृशं तदा । कर्ता पापस्य महतो भ्रूणहा किमिहागत:,वहाँ जाकर उन्होंने मुनिके दोनों पैर पकड़ लिये और उन्हें धीरे-धीरे दबाने लगे। ऋषिने वहाँ राजाको देखकर उस समय उनकी बड़ी निन्दा की। वे कहने लगे--अरे! तू तो महान् पापाचारी और ब्रह्महत्यारा है। यहाँ कैसे आया? हमलोगोंसे तेरा क्या काम है? मुझे किसी तरह छूना मत। जा-जा, तेरा यहाँ ठहरना हमलोगोंको अच्छा नहीं लगता
ṛṣir dṛṣṭvā nṛpaṃ tatra jagarhe subhṛśaṃ tadā | kartā pāpasya mahato bhrūṇahā kim ihāgataḥ ||
ऋषिर्दृष्ट्वा नृपं तत्र जगर्हे सुभृशं तदा । कर्ता पापस्य महतो भ्रूणहा किमिहागतः ॥ किं तेऽस्माभिः प्रयोजनं मा मां स्पृश कदाचन । गच्छ गच्छेति तं प्राह न तेऽत्र वास इष्टवान् ॥
भीष्म उवाच