Āśā-prabhava (आशाप्रभव) — On the Rise and Power of Hope/Expectation
Sumitra Itihāsa Begins
धर्म: सत्यं तथा वृत्तं बल॑ं चैव तथाप्यहम् । शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशय:,महाप्राज्ञ! धर्म, सत्य, सदाचार, बल और मैं (लक्ष्मी)--ये सब सदा शीलके ही आधारपर रहते हैं--शील ही इन सबकी जड़ है। इसमे संशय नहीं है
dharmaḥ satyaṃ tathā vṛttaṃ balaṃ caiva tathāpy aham | śīlamūlā mahāprājña sadā nāsty atra saṃśayaḥ ||
ब्राह्मण उवाच—धर्मः सत्यं तथा वृत्तं बलं चैव तथाप्यहम् । शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशयः ॥
ब्राह्मण उवाच