मृदु-तीक्ष्ण-नीति तथा दुष्टलक्षण-विज्ञानम्
Measured Policy and the Recognition of Malicious Disposition
न नित्यं परिभूयारीन् सुखं स्वपिति वासव । जागर्त्येव हि दुष्टात्मा संकरेडग्निरिवोत्थित:,इन्द्र! जो सदा शत्रुओंका तिरस्कार ही करता है, वह सुखसे सोने नहीं पाता। वह दुष्टात्मा नरेश बाँस और घास-फूसमें प्रज्वलित हो चट-चट शब्द करनेवाली आगके समान सदा जागता ही रहता है
भीष्म उवाच— न नित्यं परिभूयारीन् सुखं स्वपिति वासव। जागर्त्येव हि दुष्टात्मा संकरेऽग्निरिवोत्थितः॥
भीष्म उवाच