शल्यपर्व — चतुर्विंशोऽध्यायः | Śalya Parva, Chapter 24: Disruption of Kaurava Formations and the Elephant Encirclement
वह सेना एक वनके समान थी। वह वन कुन्त, खड्ग और बाणोंसे अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था, शक्तिरूपी काँटोंसे भरा हुआ था, गदा और परिघ उसमें जानेके मार्ग थे, रथ और हाथी उसमें रहनेवाले बड़े-बड़े वृक्ष थे, घोड़े और पैदलरूपी लताओंसे वह व्याप्त हो रहा था, महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण ऊँची पताकावाले रथके द्वारा उस सैन्यवनमें प्रवेश करके सब ओर विचरने लगे ।। ते हया: पाण्डुरा राजन् वहन्तो<र्जुनमाहवे । दिक्षु सर्वास्वदृश्यन्त दाशाहेण प्रचोदिता:,राजन! श्रीकृष्णके द्वारा हाँके गये वे सफेद घोड़े युद्धस्थलमें अर्जुनको ढोते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें दिखायी पड़ते थे
te hayāḥ pāṇḍurā rājan vahanto 'rjunam āhave | dikṣu sarvāsv adṛśyanta dāśārheṇa pracoditāḥ ||
सञ्जय उवाच—राजन्, सा सेना वनमिवाभवत्; कुन्तखड्गबाणैर्भृशं घोरं, शक्तिकण्टकसङ्कुलं, गदापरिघमार्गं, रथगजमहावृक्षनिवासं, हयपदातिलताव्याप्तं च। तस्मिन् सैन्यवने महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्णोऽतिपताकिनं रथमारुह्य प्रविश्य सर्वतो व्यचरन्। दाशार्हेण प्रचोदिताः पाण्डुराः हयाः, राजन्, आहवेऽर्जुनं वहन्तः सर्वासु दिक्ष्वदृश्यन्त।
संजय उवाच