Mahabharata Adhyaya 9
Sabha ParvaAdhyaya 935 Verses

Adhyaya 9

वारुणी सभा — Varuṇa’s Divine Assembly (Nārada’s Description)

Upa-parva: Sabhā-vibhāga (Divine Assembly Halls: Varuṇa-sabhā and transition to Kubera-sabhā)

Nārada narrates to Yudhiṣṭhira the features of Varuṇa’s radiant white assembly hall, constructed by Viśvakarman and situated amid inner waters. The hall is portrayed as climatically balanced and sensorially pleasant, ornamented with gem-like trees bearing flowers and fruits, and populated by multicolored botanical forms and innumerable birds with gentle, indistinct calls. Varuṇa is described as seated with Vāruṇī, adorned with divine garments and ornaments, receiving veneration from Ādityas. A detailed roll of Nāgas follows (including Vāsuki, Takṣaka, Airāvata, and others), characterized by banners, coils, and hoods, attending without fatigue. Daityas and Dānavas are also listed as present—garlanded, crowned, and richly accoutred—depicted as recipients of boons and steadfast in observance within Varuṇa’s order. The chapter expands the court’s constituency to the four oceans, major rivers (e.g., Bhāgīrathī, Kāliṇdī, Narmadā, Sindhu), waterscapes (wells, ponds, lakes), directions, earth, mountains, aquatic beings, and the musical praise of Gandharvas and Apsarases. The unit concludes with Nārada stating he has seen this Vāruṇī sabhā and inviting Yudhiṣṭhira to hear next of Kubera’s hall, marking a transition in the divine-sabhā catalog.

Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को उस अद्भुत सभा का वर्णन सुनाते हैं जिसे विश्वकर्मा ने जल के भीतर रचा—रत्नमय वृक्षों, फल-फूलों और दिव्य प्रकाश से भरी हुई। → सभा के भीतर के रंग-रूप और बनावट का विस्तार होता है—नीले, पीले, काले, श्वेत, लाल लता-गुल्म; मञ्जरी-जाल; और अग्नियों के अनेक नामों का स्मरण, मानो यज्ञ-शक्ति स्वयं वास्तु में प्रवाहित हो। फिर सभा में उपस्थित दैत्य-दानव, गन्धर्व-अप्सरा, नदियाँ-तीर्थ और मूर्तिमान रस/पर्वत—सबका क्रमशः परिचय आता है, जिससे यह स्थान केवल भवन नहीं, एक जीवित ब्रह्माण्ड-सभा बन जाता है। → वरुण-सभा में समस्त गन्धर्व-अप्सराएँ वाद्य-गीत सहित वरुण की स्तुति करते हैं; रत्नयुक्त पर्वत और प्रतिष्ठित ‘रस’ मधुर कथाएँ कहते हैं; और वरुण का मन्त्री सुनाभ पुत्र-पौत्रों सहित, ‘गौ’ तथा ‘पुष्कर’ तीर्थ के साथ उपासना में स्थित दिखता है—यह दृश्य सभा की दिव्यता और देव-व्यवस्था की पराकाष्ठा है। → अध्याय सभा की पूर्णता को स्थिर करता है—निर्माण (विश्वकर्मा), अलंकरण (रत्न-वृक्ष, रंग-लताएँ), और निवास/उपासना (वरुण-स्तुति, मन्त्री-परिवार, तीर्थ-नदियाँ) के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि यह सभा धर्म-व्यवस्था और ऐश्वर्य का केन्द्र है। → यह दिव्य वैभव आगे चलकर मनुष्यों की सभा-राजनीति और अहंकार के लिए मानक/प्रलोभन बनेगा।

Shlokas

Verse 1

- नीलकण्ठने अपनी टीकामें इन सत्ताईस पावकोंके नाम इस प्रकार बताये हैं--अंगिरा

नारद उवाच—युधिष्ठिर, वरुणस्य दिव्या सभा अमितप्रभा नित्यं विराजते। प्रमाणेन सा यथा याम्या सभा तथा एव; तस्याः शुभाः प्राकाराः तोरणानि च अतिशयेन मनोहराणि।

Verse 2

अन्त:ःसलिलमास्थाय विदहिता विश्वकर्मणा । दिव्यै रत्नमयैर्वृक्षै:ः फलपुष्पप्रदैर्युता,विश्वकर्माने उस सभाको जलके भीतर रहकर बनाया है। वह फल-फूल देनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे सुशोभित होती है

अन्तःसलिलमास्थाय विश्वकर्मणा विनिर्मिता। दिव्यै रत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युता॥

Verse 3

नीलपीतासितश्यामै: सितैलॉहितकैरपि । अवतानैस्तथा गुल्मैर्मज्जरीजालधारिभि:

नीलपीतासितश्यामैः सितैर्लोहितकैः अपि। अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीजालधारिभिः॥

Verse 4

तथा शकुनयस्तस्यां विचित्रा मधुरस्वरा: । अनिर्देश्या वपुष्मन्त: शतशो5थ सहस्रश:

तथा शकुनयस्तस्यां विचित्रा मधुरस्वराः। अनिर्देश्या वपुष्मन्तः शतशोऽथ सहस्रशः॥

Verse 5

सा सभा सुखसंस्पर्शा न शीता न च घर्मदा । वेश्मासनवती रम्या सिता वरुणपालिता

सा सभा सुखसंस्पर्शा न शीता न च घर्मदा। वेश्मासनवती रम्या सिता वरुणपालिता॥

Verse 6

यस्यामास्ते स वरुणो वारुण्या च समन्वित: । दिव्यरत्नाम्बरधरो दिव्याभरणभूषित:,उसमें दिव्य रत्नों और वस्त्रोंकी धारण करनेवाले तथा दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत वरुणदेव वारुणी देवीके साथ विराजमान होते हैं

तस्यां सभायां वरुणो देवो वारुण्या सह समन्वितः आस्ते। स दिव्यरत्नमयाम्बरधरो दिव्याभरणैश्च भूषितः, तेजोमयैः भूषणैः समलङ्कृतः शोभते।

Verse 7

स्रग्विणो दिव्यगन्धाश्न दिव्यगन्धानुलेपना: । आदित्यास्तत्र वरुणं जलेश्वरमुपासते,उस सभामें दिव्य हार, दिव्य सुगन्ध तथा दिव्य चन्दनका अंगराग धारण करनेवाले आदित्यगण जलके स्वामी वरुणकी उपासना करते हैं

तत्र सभायां दिव्यस्रग्विणो दिव्यगन्धानुलेपनाः। आदित्यास्तत्र जलेश्वरं वरुणं भक्त्या समुपासते।

Verse 8

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापवके अन्तर्गत लोकपालयभाख्यानपर्वमें यमस भा-वर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि यमसभावर्णननामाष्टमोऽध्यायः समाप्तः। वासुकिस्तक्षकश्चैव नागश्चैरावतस्तथा। कृष्णश्च लोहितश्चैव पद्मश्च चित्र एव च वीर्यवान्॥

Verse 9

कम्बलाश्चतरौ नागौ धृतराष्ट्रबलाहकौ । (मणिनागश्न नागश्न मणि: शड्खनखस्तथा । कौरव्य: स्वस्तिकश्नैव एलापत्रश्ष॒ वामन: ।।

कम्बलाश्चाश्वतरौ नागौ धृतराष्ट्रबलाहकौ। मणिनागश्च नागश्च मणिः शङ्खनखस्तथा। कौरव्यः स्वस्तिकश्चैव एलापत्रोऽथ वामनः। अपराजितोऽथ दोषश्च नन्दकः पूरणस्तथा। अभीकः शिभिकः श्वेतो भद्रः भद्रेश्वरस्तथा। मणिमांश्च कुण्डधारश्च कर्कोटकधनंजयौ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि वरुणसभावर्णने नवमोऽध्यायः।

Verse 10

पाणिमान्‌ कुण्डधारश्न बलवान्‌ पृथिवीपते । प्रहादो मूषिकादश्व॒ तथैव जनमेजय:

नारद उवाच। पाणिमान् कुण्डधारश्च बलवान् पृथिवीपते। प्रह्रादो मूषिकादश्च तथैव जनमेजयः॥ ध्वजमण्डलफणैर्दीप्ताः ते तत्र समुपस्थिताः। तत्रैवानन्तो भगवान् शेषोऽपि समवस्थितः। तं दृष्ट्वा वरुणो देवः आसनाद्यैः सत्कृत्य पूजयति। वासुक्यादयः सर्वे नागाः कृताञ्जलयः पुरतः तिष्ठन्ति; शेषाज्ञया यथायोग्यमासनेषु निषीदन्ति, सभां शोभयन्ति। एते चान्ये च बहवो नागाः क्लेशरहिता महात्मानं वरुणं तत्रोपासते।

Verse 11

पाणिमान्‌ू, बलवान कुण्डधार, प्रहाद, मूषिकाद, जनमेजय आदि नाग जो पताका, मण्डल और फणोंसे सुशोभित वहाँ उपस्थित होते हैं, महानाग भगवान्‌ अनन्त भी वहाँ स्थित होते हैं, जिन्हें देखते ही जलके स्वामी वरुण आसन आदि देते और सत्कारपूर्वक उनका पूजन करते हैं। वासुकि आदि सभी नाग हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े होते और भगवान्‌ शेषकी आज्ञा पाकर यथायोग्य आसनोंपर बैठकर वहाँकी शोभा बढ़ाते हैं। युधिष्ठि!! ये तथा और भी बहुतसे नाग उस सभामें क्लेशरहित हो महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं

Narada says: Many serpent-lords—Pāṇimān, the mighty Kuṇḍadhāra, Prahlāda, Mūṣikāda, Janamejaya, and others—adorned with banners, circular emblems, and splendid hoods, are present there. The great serpent, the divine Ananta, is also seated in that assembly; at the very sight of him Varuṇa, lord of the waters, rises to honor him, offers him a seat and other courtesies, and worships him with due reverence. Vāsuki and the other nāgas stand before him with folded hands; then, by the command of the blessed Śeṣa, they take their appropriate seats and enhance the splendor of the hall. O Yudhiṣṭhira, these and many other nāgas dwell there without distress, devotedly attending upon the great-souled Varuṇa. The passage highlights a moral order in which even powerful beings observe hierarchy, humility, and proper hospitality toward the truly venerable.

Verse 12

बलिवैंरोचनो राजा नरकः पृथिवींजय: । प्रह्मादो विप्रचित्तिश्ष कालखज्जाश्नल दानवा:

Narada said: “King Bali, son of Virocana, and Naraka the conqueror of the earth; Prahlada, Vipracitti, and the Danavas such as Kalakhañja—along with many other Daityas and Danavas—appear in that celestial assembly adorned with charming earrings, beautiful garlands, crowns, and divine garments and ornaments. There they continually attend upon the great Varuṇa, bearer of the noose of Dharma. Having obtained boons, they are mighty in valor and free from death; their conduct and vows are described as excellent.”

Verse 13

सुहनुर्दुर्मुख: शुड्ख: सुमना: सुमतिस्तत: । घटोदरो महापार्शच: क्रथन: पिठरस्तथा

Nārada said: “Suhanu, Durmukha, Śaṅkha, Sumanas, Sumati; Ghaṭodara, Mahāpārśva, Krathana, Piṭhara; King Bali, son of Virocana; the earth-conquering Narakāsura; Prahlāda; Vipracitti; the Dānava Kālakhañja; and many others—Viśvarūpa, Svarūpa, Virūpa, Mahāśiras, the ten-headed Rāvaṇa, Vālī, Meghavāsa, Daśāvara, Ṭiṭṭibha, Viṭabhūta, Saṃhāda, Indratāpana, and the rest—these hosts of Daityas and Dānavas, adorned with charming earrings, splendid garlands, crowns, and divine garments and ornaments, continually worship in that assembly the great god Varuṇa, the noble bearer of the ‘noose of Dharma’. Having obtained boons, they have become valorous and free from death; their conduct and vows are declared to be exceedingly excellent.”

Verse 14

विश्वरूप: स्वरूपश्ष विरूपो5थ महाशिरा: । दशग्रीवक्ष॒ वाली च मेघवासा दशावर:

Narada said: There in that assembly are gathered hosts of Daityas and Danavas—Viśvarūpa, Svarūpa, Virūpa, Mahāśiras; Daśagrīva (Rāvaṇa), Vālī, Meghavāsa, Daśāvara; King Bali, son of Virocana; the earth-conqueror Narakāsura; Prahlāda; Vipracitti; the Danava Kālakhañja; Suhanu, Durmukha, Śaṅkha, Sumanas, Sumati, Ghaṭodara, Mahāpārśva, Krathana, Piṭhara, and others. Adorned with charming earrings, splendid garlands, crowns, and divine garments and ornaments, they continually worship the great-souled god Varuṇa, who bears the noose of dharma. Having obtained boons, they are endowed with valor and have become free from death; their conduct and their vowed observances are described as exceedingly excellent.

Verse 15

टिट्टिभो विटभूतश्न संद्वादश्रेन्द्रतापन: । देत्यदानवसड्घाश्च सर्वे रुचिरकुण्डला:

Nārada said: “There are many hosts of Daityas and Dānavas—adorned with charming earrings—such as Ṭiṭṭibha, Viṭabhūta, Saṃdvāda, Indratāpana, the king Bali (son of Virocana), the earth-conqueror Narakāsura, Prahlāda, Vipracitti, Kālakhañja, Suhanu, Durmukha, Śaṅkha, Sumanas, Sumati, Ghaṭodara, Mahāpārśva, Krathana, Piṭhara, Viśvarūpa, Svarūpa, Virūpa, Mahāśiras, the ten-headed Rāvaṇa, Vālī, Meghavāsa, Daśāvara, and others. Wearing beautiful garlands, crowns, and divine garments and ornaments, they continually worship in that assembly the great Varuṇa, who bears the noose of Dharma. Having obtained boons, they have become valorous and free from death; their conduct and vows are described as exceedingly excellent.”

Verse 16

स्रग्विणो मौलिनश्वैव तथा दिव्यपरिच्छदा: । सर्वे लब्धवरा: शूरा: सर्वे विगतमृत्यव:

नारद उवाच—स्रग्विणो मौलिनश्चैव दिव्यपरिच्छदधारिणः। सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्यवः॥ विरोचनपुत्रो राजा बलिः पृथ्वीविजयी नरकासुरः प्रह्लादो विप्रचित्तिः कालखञ्जो दानवः। सुहनुर्दुर्मुखः शङ्खः सुमनाः सुमतिः घटोदरः महापार्श्वः क्रथनः पिठरः। विश्वरूपः स्वरूपो विरूपो महाशिराः दशमुखो रावणो वाली मेघवासा दशावरः। टिट्टिभो विटभूतः संहाद इन्द्रतापनश्चान्ये च—एते दैत्यदानवसमूहाः। मनोहरकुण्डलैः सुन्दरहारैः किरीटैर्दिव्यवस्त्राभरणैश्च विभूषिताः, तस्यां सभायां धर्मपाशधरं महात्मानं वरुणदेवं नित्यं समुपासते। वरदानैः प्राप्तैः शौर्यसम्पन्ना मृत्युवर्जिताश्च; तेषां चरित्रं व्रतं चात्यन्तं प्रशस्तम्।

Verse 17

ते तस्यां वरुणं देवं धर्मपाशधरं सदा । उपासते महात्मानं सर्वे सुचरितव्रता:

नारद उवाच—ते तस्यां सभायां वरुणं देवं धर्मपाशधरं सदा उपासते महात्मानं सर्वे सुचरितव्रताः। विरोचनपुत्रो राजा बलिः पृथ्वीविजयी नरकासुरः प्रह्लादो विप्रचित्तिः कालखञ्जो दानवः। सुहनुर्दुर्मुखः शङ्खः सुमनाः सुमतिः घटोदरः महापार्श्वः क्रथनः पिठरः। विश्वरूपः स्वरूपो विरूपो महाशिराः दशमुखो रावणो वाली मेघवासा दशावरः। टिट्टिभो विटभूतः संहाद इन्द्रतापनश्चान्ये च—एते दैत्यदानवाः। मनोहरकुण्डलैः स्रग्भिः किरीटैर्दिव्यवस्त्राभरणैश्च विभूषिताः, तत्र वरुणं नित्यं प्रणमन्ति धर्मनिग्रहकर्तारम्। वरदानैः प्राप्तैः शौर्यसम्पन्ना मृत्युवर्जिताश्च; तेषां चरित्रं व्रतं चात्यन्तं प्रशस्तम्।

Verse 18

तथा समुद्राश्चत्वारो नदी भागीरथी च सा | कालिन्दी विदिशा वेणा नर्मदा वेगवाहिनी,चारों समुद्र, भागीरथी नदी, कालिन्दी, विदिशा, वेणा, नर्मदा, वेगवाहिनी,

नारद उवाच—तथा समुद्राश्चत्वारो भागीरथी च सा नदी। कालिन्दी विदिशा वेणा नर्मदा वेगवाहिनी॥

Verse 19

विपाशा च शठतद्गुश्न चन्द्रभागा सरस्वती । इरावती वितस्ता च सिन्धुर्देवनदी तथा,विपाशा, शतद्रु, चन्द्रभागा, सरस्वती, इरावती, वितस्ता, सिन्धु, देवनदी,

नारद उवाच—विपाशा च शतद्रुश्च चन्द्रभागा सरस्वती। इरावती वितस्ता च सिन्धुर्देवनदी तथा॥

Verse 20

गोदावरी कृष्णवेणा कावेरी च सरिद्वधरा । किम्पुना च विशल्या च तथा वैतरणी नदी,गोदावरी, कृष्णवेणा, सरिताओंमें श्रेष्ठ कावेरी, किम्पुना, विशल्या, वैतरणी नदी,

नारद उवाच—गोदावरी कृष्णवेणा कावेरी च सरिद्वरा। किम्पुना च विशल्या च तथा वैतरणी नदी॥

Verse 21

तृतीया, ज्येष्ठलिला, महानद शोण, चर्मण्वती, पर्णाशा, महानदी,

तृतीया ज्येष्ठलिला चैव महानदः शोण एव च । चर्मण्वती तथा पर्णाशा महानदी च कीर्तिता ॥

Verse 22

सरयूर्वारवत्याथ लाड़्ली च सरिद्वरा । करतोया तथात्रेयी लौहित्यशक्ष महानद:,सरयू, वारखत्या, सरिताओंमें श्रेष्ठ लांगली, करतोया, आत्रेयी, महानद लौहित्य,

सरयूर्वारवती चैव लाङ्गली सरिदुत्तमा । करतोया तथात्रेयी लौहित्यश्च महानदः ॥

Verse 23

तृतीया ज्येछ्ठिला चैव शोणश्लवापि महानद: । चर्मण्वती तथा चैव पर्णाशा च महानदी

तृतीया ज्येष्ठिला चैव शोणश्लवा महानदः । चर्मण्वती तथा पर्णाशा महानदी तथैव च ॥ लङ्घती गोमती चैव सन्ध्या त्रिःस्रोतसी तथा । एतान्यन्यानि राजेन्द्र सुतीर्थानि लोकविश्रुताः ॥

Verse 24

सरित: सर्वतश्नान्यास्तीर्थानि च सरांसि च | कूृपाश्न सप्रस्रवणा देहवन्तो युधिष्ठिर

सरितः सर्वतः स्नान्यास्तीर्थानि च सरांसि च । कूपाः सप्रस्रवणाश्च देहवन्तो युधिष्ठिर ॥ उपासते महात्मानं वरुणं सर्व एव ते । तथा सर्वे जलचराः पूजयन्ति तमेव हि ॥

Verse 25

पल्वलानि तडागानि देहवन्त्यथ भारत । दिशस्तथा मही चैव तथा सर्वे महीधरा:

पल्वलानि तडागानि देहवन्त्यथ भारत । दिशस्तथा मही चैव तथा सर्वे महीधराः ॥

Verse 26

गीतवादित्रवन्तश्न गन्धर्वाप्सरसां गणा:

नारद उवाच—गीतवादित्रनिनादैः समन्तात् प्रतिनादिते। गन्धर्वाप्सरसां संघा बभूवुस्तत्र सर्वशः॥

Verse 27

महीधरा रत्नवन्तो रसा ये च प्रतिछ्िता:

नारद उवाच—महीधराः रत्नसमृद्धा रसा ये च प्रतिष्ठिताः। देशाः स्वस्वरसोपेताः सुदृढाः समवस्थिताः॥

Verse 28

वारुणश्न तथा मन्त्री सुनाभ: पर्युपासते

नारद उवाच—वारुणश्नस्तथा मन्त्री सुनाभः पर्युपासते। नित्यं सन्नद्धभावेन सेवां कुर्वन्ति तत्पराः॥

Verse 29

सर्वे विग्रहवन्तस्ते तमीश्वरमुपासते,ये सभी शरीर धारण करके लोकेश्वर वरुणकी उपासना करते रहते हैं

नारद उवाच—सर्वे विग्रहवन्तस्ते तमीश्वरमुपासते। लोकाधिपं वरुणं नित्यं भक्त्या समनुव्रताः॥

Verse 30

एषा मया सम्पतता वारुणी भरतर्षभ | दृष्टपूर्वा सभा रम्या कुबेरस्य सभां शूणु,भरतश्रेष्ठ। पहले सब ओर घूमते हुए मैंने वरुणजीकी इस रमणीय सभाका भी दर्शन किया है। अब तुम कुबेरकी सभाका वर्णन सुनो

नारद उवाच—एषा मया सम्पतता वारुणी भरतर्षभ। दृष्टपूर्वा सभा रम्या; कुबेरस्य सभां शृणु, भरतश्रेष्ठ॥

Verse 113

पताकिनो मण्डलिन: फणावन्तश्न सर्वश: । (अनन्तश्न महानागो यं स दृष्टवा जलेश्वर: । अभ्यर्चयति सत्कारैरासनेन च त॑ विभुम्‌ ।।

नारद उवाच—तत्र सर्वतः पताकिनो मण्डलिनः फणावन्तश्च सर्पाः सन्ति। महानागं चानन्तं दृष्ट्वा जलाधिपो वरुणः उत्थाय तं विभुं सत्कारैः पूजयति, आसनेन चोपवेशयति। वासुकिप्रमुखाः सर्वे नागाः प्राञ्जलयः स्थिताः; शेषेणानुज्ञातोऽहं यथाविध्युपविश्य च। एते चान्ये च बहवः सर्पाः, हे युधिष्ठिर, तत्र विगतक्लमा महात्मानं वरुणमुपासते।

Verse 253

उपासते महात्मानं॑ सर्वे जलचरास्तथा । समस्त सरिताएँ

नारद उवाच—सर्वे जलचराः अपि तथा महात्मानं वरुणमुपासते। सरितः सर्वाणि च जलाशयानि—सरोवराणि कूपाः प्रस्रवणानि तडागाः पुष्करिण्यश्च—दिशश्च पृथिवी पर्वताश्च; तथा जलगताः सर्वे प्राणिनः स्वस्वरूपं धारयन्तः वरुणं श्रद्धया पूजयन्ति।

Verse 263

स्तुवन्तो वरुणं तस्यां सर्व एव समासते । सभी गन्धर्व और अप्सराओंके समुदाय भी गीत गाते और बाजे बजाते हुए उस सभामें वरुणदेवताकी स्तुति एवं उपासना करते हैं

नारद उवाच—तस्यां सभायां सर्व एव समागताः समासते, वरुणं स्तुवन्तः। गन्धर्वाश्चाप्सरसां गणाश्च गीतवाद्यैः सह तत्र वरुणदेवतां स्तुतिभिरुपासते।

Verse 276

कथयन्त: सुमधुरा: कथास्तत्र समासते । रत्नयुक्त पर्वत और प्रतिष्ठित रस (मूर्तिमान्‌ होकर) अत्यन्त मधुर कथाएँ कहते हुए वहाँ निवास करते हैं

नारद उवाच—तत्र सर्वे समासते, सुमधुराः कथाः कथयन्तः। रत्नयुक्ता गिरयश्च प्रतिष्ठिता रसाश्च मूर्तिमन्तो भूत्वा तत्र निवसन्ति, नित्यं परममधुराः कथाः प्रवदन्तः।

Verse 286

पुत्रपौत्रै: परिवृतों गोनाम्ना पुष्करेण च | वरुणका मन्त्री सुनाभ अपने पुत्र-पौत्रोंसे घिरा हुआ गौ तथा पुष्कर नामवाले तीर्थके साथ वरुणदेवकी उपासना करता है

नारद उवाच—वरुणस्य मन्त्री सुनाभः पुत्रपौत्रैः परिवृतः, गौ-नाम्ना तीर्थेन पुष्कर-नाम्ना च तीर्थेन सह, वरुणदेवमुपासते।

Frequently Asked Questions

The motif is accountability through moral restraint: Varuṇa’s sovereignty is presented as rule that binds wrongdoing and stabilizes order, implying governance grounded in enforceable ethical norms.

It instructs that authority is validated by ordered integration—ritual, environment, and diverse constituencies—so a sabhā symbolizes not only power but the capacity to harmonize domains under a coherent rule.

No formal phalaśruti appears; the closing functions as narrative meta-direction, with Nārada asserting eyewitness credibility and shifting the discourse toward Kubera’s sabhā as the next comparative exemplar.

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