Chapter 5: Dāruka’s Mission, Balarāma’s Yogic Departure, and Kṛṣṇa’s Niṣkramaṇa
रत्नशैवलसंघातां वज्रप्राकारमालिनीम् | रथ्यास्रोतोजलावर्ता चत्वरस्तिमितह्ददाम्,द्वारकापुरी एक नदीके समान थी। वृष्णि और अन्धकवंशके लोग उसके भीतर जलके समान थे। घोड़े मछलीके समान थे। रथ नावका काम करते थे। वाद्योंकी ध्वनि और रथकी घरघराहट मानो उस नदीके बहते हुए जलका कलकल नाद थी। लोगोंके घर ही तीर्थ एवं बड़े-बड़े जलाशय थे। रत्नोंकी राशि ही वहाँ सेवारसमूहके समान शोभा पाती थी। वच्ध नामक मणिकी बनी हुई चहारदीवारी ही उसकी तटपंक्ति थी। सड़कें और गलियाँ उसमें जलके सोते और भँवरें थीं, चौराहे मानो उसके स्थिर जलवाले तालाब थे। बलराम और श्रीकृष्ण उसके भीतर दो बड़े-बड़े ग्राह थे। कालपाश ही उसमें मगर और घड़ियालके समान था। ऐसी द्वारकारूपी नदीको बुद्धिमान् अर्जुनने वृष्णिवीरोंसे रहित हो जानेके कारण वैतरणीके समान भयानक देखा। वह शिशिर कालकी कमलिनीके समान श्रीहीन तथा आनन्दशून्य जान पड़ती थी
vaiśampāyana uvāca | ratnaśaivalasaṅghātāṃ vajraprākāramālinīm | rathyāsrotojalāvartā catvarastimitahradām |
वैशम्पायन उवाच— द्वारका सरितेवाभात् रत्नशैवलसंघाता वज्रप्राकारमालिनी। रथ्यास्रोतोजलावर्ता चत्वरस्तिमितह्रदा॥ यत्र वृष्ण्यन्धकाः पूर्वं सलिलं इव संस्थिताः। अश्वा मत्स्या इवाभान्त रथा नाव इवाभवन्॥ वाद्यनिनादो रथघोषश्च प्रवाहकलकलस्वन इवाभवत्। गृहाणि तीर्थानीव महाह्रदाश्च, रत्नराशयः फेनसमूहा इव शोभन्ते स्म। वज्रप्राकार एव तटपङ्क्तिरिव, रथ्याश्च गलयश्च स्रोतांसि भ्रामराश्चेव; चत्वराणि स्थिरजलह्रदवत्। बलरामश्च श्रीकृष्णश्च तत्र महाग्राहाविव; कालपाशो मकरघडियाल इव। सा तु वृष्णिवीरविहीना द्वारका बुद्धिमता अर्जुनेन वैतरणीव भीमा दृष्टा— शिशिरे पद्मिनीव गतश्रीर्निरानन्दा च।
वैशम्पायन उवाच
The passage underscores impermanence: even a city famed for prosperity and divine protection becomes desolate when its sustaining community and dharmic order collapse. Splendor without living virtue and guardianship turns into भय (dread), symbolized by the comparison to the Vaitaraṇī.
Vaiśampāyana describes Dvārakā through an extended river-metaphor. Once vibrant with the Vṛṣṇi and Andhaka clans, it is now emptied of its heroes; Arjuna beholds it as terrifying and joyless, signaling the aftermath of the Yādavas’ end and the withdrawal of Kṛṣṇa and Balarāma.