Droṇa-parva Adhyāya 95 — Sātyaki’s Breakthrough and the Routing of Allied Contingents
पत्त्यश्वरथनागैश्व प्रच्छन्नकृतसंक्रमाम् । शरवर्षप्लवां घोरां केशशैवलशाद्धलाम् । प्रावर्तयन्नदीमुग्रां शोणितौघतरड्धिणीम्,देहेभ्यो राजपुत्राणां नागाश्चरथसादिनाम् । उस समय अर्जुनने वहाँ रक्तकी एक भयंकर नदी बहा दी, जो प्रलयकालकी नदीके समान डरावनी प्रतीत होती थी। उसमें पैदल मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथियोंको बिछाकर मानो पुल तैयार किया गया था, बाणोंकी वर्षा ही नौकाके समान जान पड़ती थी। केश सेवार और घासके समान जान पड़ते थे। उस भयंकर नदीसे रक्त-प्रवाहकी ही तरंगें उठ रही थीं। कटी हुई अँगुलियाँ छोटी-छोटी मछलियोंके समान जान पड़ती थीं। हाथी, घोड़े और रथोंकी सवारी करनेवाले राजकुमारोंके शरीरोंसे बहनेवाले रक्तसे लबालब भरी हुई उस नदीको अर्जुनने स्वयं प्रकट किया था। उसमें हाथियोंकी लाशें व्याप्त हो रही थीं
sañjaya uvāca |
pattyaśvarathanāgaiś ca pracchannakṛtasaṅkramām |
śaravarṣaplavāṃ ghorāṃ keśaśaivalśādvalām |
prāvartayannadīm ugrāṃ śoṇitaughataraṅgiṇīm |
dehebhyo rājaputrāṇāṃ nāgāś ca rathasādinām ||
सञ्जय उवाच—पत्त्यश्वरथनागैश्च प्रच्छन्नकृतसंक्रमाम्, शरवर्षप्लवां घोरां केशशैवलशाद्वलाम्। प्रावर्तयन्नदीमुग्रां शोणितौघतरङ्गिणीम्; देहेभ्यो राजपुत्राणां नागाश्चरथसादिनाम्, शोणितेन परिपूर्णां तां नदीं स्वयमर्जुनः प्रादर्शयत्।
संजय उवाच