अध्याय ७१ — द्रोणव्यूहरक्षा तथा समकालीन द्वन्द्वयुद्धानि
Protection of Droṇa’s formation and parallel duels
238 48 त्वा महाबाहो धन्यमाख्यानमुत्तमम् | | पुराणानां यज्वनां दक्षिणावताम्,“महाबाहु महर्षे! यज्ञ करने और दक्षिणा देनेवाले प्राचीन राजर्षियोंका यह परम उत्तम सराहनीय उपाख्यान सुनकर मुझे ऐसा विस्मय हुआ है कि उसने मेरा सारा शोक हर लिया है। ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यका तेज सारा अन्धकार हर लेता है। अब मैं पाप (दुःख) और व्यथासे शून्य हो गया हूँ। बताइये, आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ”
tvā mahābāho dhanyam ākhyānam uttamam | purāṇānāṁ yajvanāṁ dakṣiṇāvatām |
त्वा महाबाहो महर्षे धन्यमाख्यानमुत्तमम्। पुराणानां यज्वनां दक्षिणावतां श्रुत्वा विस्मयेन हतः शोकः; तमसीवार्कतेजसा। विपाप्मास्म्यव्यथोपेतो ब्रूहि किं करवाण्यहम्॥
व्यास उवाच