ऑपनआ कराता छा अकाल नवनवरत्याधिकशततमो< ध्याय: अश्वत्थामाके द्वारा नारायणास्त्रका प्रयोग, राजा युधिष्ठिरका खेद, भगवान् श्रीकृष्णके बताये हुए उपायसे सैनिकोंकी रक्षा, भीमसेनका वीरोचित उद्गार और उनपर उस अस्त्रका प्रबल आक्रमण संजय उवाच ततः स कदन चक्रे रिपूर्णां द्रोणनन्दन: । युगान्ते सर्वभूतानां कालसृष्ट इवान्तक:,संजय कहते हैं--राजन्! तदनन्तर द्रोणकुमार अभश्वत्थामाने प्रलयकालमें कालसे प्रेरित हो समस्त प्राणियोंका संहार करनेवाले यमराजके समान शत्रुओंका विनाश आरम्भ किया इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास््रगोक्षपर्वमें पाण्डव-सेनाका अस्त्र- त्यागविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १९९ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ ३ लोक मिलाकर कुल ६७३ श्लोक हैं।) भीस्न्ह+ज (2) आमने द्विशततमो<्ध्याय: श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अभश्वत्थामाका उसके पुन: प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अभ्रृत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन--इन छ: महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अभ्रृत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव- सेनाका पलायन संजय उवाच भीमसेनं समाकीर्ण दृष्ट्वास्त्रेण धनंजय: । तेजस: प्रतिघातार्थ वारुणेन समावृणोत्
sañjaya uvāca | tataḥ sa kadanaṃ cakre ripūṇāṃ droṇanandanaḥ | yugānte sarvabhūtānāṃ kālasṛṣṭa ivāntakaḥ ||
सञ्जय उवाच—ततः स कदनं चक्रे रिपूणां द्रोणनन्दनः। युगान्ते सर्वभूतानां कालसृष्ट इवान्तकः॥
संजय उवाच
The verse highlights how unchecked rage in war can resemble cosmic destruction: when violence exceeds restraint, it appears as ‘Time’ itself acting through a warrior. It implicitly warns that even within kṣatriya duty, ethical boundaries matter, because war can slide from duty into annihilating cruelty.
Sañjaya reports that Aśvatthāman, Droṇa’s son, begins a fierce onslaught against the opposing army. His attack is compared to Antaka (Death/Yama) at the end of a yuga, emphasizing the scale and terror of the carnage that is about to unfold.