वासवी-शक्तेः प्रयोगः, घटोत्कच-वधोत्तर-शोकः, व्यासोपदेशश्च
The Vāsavī Spear’s Use, Post-Ghaṭotkaca Grief, and Vyāsa’s Counsel
उपस्थितैस्ततो युद्धे राक्षसैर्युद्धदुर्मदै: । विषण्णमभिसप्प्रेक्ष्य पुत्रं ते द्रौणिरब्रवीत्,तत्पश्चात् अश्वत्थामाने देखा कि घटोत्कच बिना किसी घबराहटके बहुत-से राक्षसोंसे घिरा हुआ पुन: रथपर आरूढ़ होकर आ रहा है। उसने अपने धनुषको खींचकर फैला रखा है। उसके साथ सिंह, व्याप्र और मतवाले हाथियोंके समान पराक्रमी तथा विकराल मुख, मस्तक और कण्ठवाले बहुत-से अनुचर हैं, जो हाथी, घोड़ों तथा रथपर बैठे हुए हैं। उसके अनुचरोंमें राक्षस, यातुधान तथा तामस जातिके लोग हैं, जिनका पराक्रम इन्द्रके समान है। नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले, भाँति-भाँतिके कवच और आशभूषणोंसे विभूषित, महाबली, भयंकर सिंहनाद करनेवाले तथा क्रोधसे घूरते हुए नेत्रोंवाले बहुसंख्यक रणदुर्मद राक्षस घटोत्कचकी ओरसे युद्धके लिये उपस्थित हैं। यह सब देखकर दुर्योधन विषादग्रस्त हो रहा है। इन सब बातोंपर दृष्टिपात करके अश्व॒त्थामाने आपके पुत्रसे कहा --
upasthitais tato yuddhe rākṣasair yuddha-durmadaiḥ | viṣaṇṇam abhisamprekṣya putraṁ te drauṇir abravīt ||
उपस्थितैस्ततो युद्धे राक्षसैर्युद्धदुर्मदैः । विषण्णमभिसम्प्रेक्ष्य पुत्रं ते द्रौणिरब्रवीत् ॥ ततः युद्धायोपस्थितैः रणदुर्मदै राक्षसैः सह, तव पुत्रं विषण्णं दृष्ट्वा द्रौणिरश्वत्थामा तमब्रवीत् ॥
संजय उवाच
The verse highlights a recurring Mahābhārata ethic: in war and crisis, inner collapse (viṣāda) can be as dangerous as external enemies, and timely counsel from a trusted ally becomes crucial for restoring resolve and judgment.
Rākṣasa forces are seen standing ready for battle. Duryodhana becomes despondent at the sight, and Aśvatthāman, noticing his dejection, begins to address him.