Previous Verse
Next Verse

Shloka 206

Droṇa’s Rebuke to Duryodhana after Jayadratha’s Fall (द्रोणेन दुर्योधनं प्रति प्रत्युक्तिः)

स्वर्गेप्सवो मित्रकार्ये नाभ्यनन्दन्त जीवितम्‌ । वे उत्तम तेजवाले नरेश स्वर्गलोक प्राप्त करना चाहते थे। अतः उन्हें युद्धमें शस्त्रोंद्वारा मृत्यु आनेकी अभिलाषा थी। इसीलिये उन्होंने मित्रका कार्य सिद्ध करनेके प्रयत्नमें अपने प्राणोंकी परवा नहीं की

स्वर्गेप्सवो मित्रकार्ये नाभ्यनन्दन्त जीवितम् । उत्तमतेजसो नरेशाः स्वर्गलोकं प्राप्तुमिच्छन्तः शस्त्रैर्मरणमेवाभिलषन्त स्म । तस्मान्मित्रकार्यसिद्ध्यर्थं प्रयतमानाः स्वप्राणानां न परवाहमकुर्वन् ॥

स्वर्गेप्सवःdesirous of heaven
स्वर्गेप्सवः:
Karta
TypeAdjective
Rootस्वर्गेप्सु
FormMasculine, Nominative, Plural
मित्रकार्येin the task of a friend
मित्रकार्ये:
Adhikarana
TypeNoun
Rootमित्रकार्य
FormNeuter, Locative, Singular
not
:
TypeIndeclinable
Root
अभ्यनन्दन्तthey rejoiced in / welcomed
अभ्यनन्दन्त:
TypeVerb
Rootअभि-नन्द्
FormImperfect (Lan), Third, Plural, Parasmaipada
जीवितम्life
जीवितम्:
Karma
TypeNoun
Rootजीवित
FormNeuter, Accusative, Singular

संजय उवाच