Mahabharata Adhyaya 122
Drona ParvaAdhyaya 12261 Versesपाण्डव-पक्ष के पक्ष में—सात्यकि के आक्रमण से कौरव पंक्तियाँ टूटती हैं और दुर्योधन-पक्ष पीछे हटता है।

Adhyaya 122

अर्जुनस्य गुरुधर्मविलापः तथा शैनेयकर्णयोर्युद्धारम्भः | Arjuna’s Lament on Guru-Dharma and the Opening of the Sātyaki–Karṇa Duel

Upa-parva: Saindhava-vadha-anantara Saineya–Karṇa-saṃgama (Post–Jayadratha Episode: Sātyaki vs Karṇa)

Dhṛtarāṣṭra asks Sañjaya what the Kauravas did after Jayadratha’s death. Sañjaya reports that Kṛpa Śāradvata, driven by indignation, and Aśvatthāmā together shower Arjuna with missiles from their chariots, causing severe pressure. Arjuna counters their weapons with weapons, releasing moderated arrows while intending to neutralize both teacher-figures without excessive harm. Kṛpa is struck by Arjuna’s arrows, collapses into a faint on his chariot, and is withdrawn by his charioteer; Aśvatthāmā shifts position. Seeing Kṛpa incapacitated, Arjuna laments, recalling earlier counsel that one must not strike a guru; he frames his action as potentially merit-destroying and infernal in consequence, and offers reverential salutations even while in combat. The narrative then turns: Karṇa advances, apparently unable to tolerate recent losses, and Arjuna instructs Kṛṣṇa to drive toward Karṇa’s target (Sātyaki) to prevent Sātyaki from being pushed into a fatal trajectory. Kṛṣṇa acknowledges timing and notes strategic constraints regarding Arjuna’s direct engagement with Karṇa. Sañjaya describes Kṛṣṇa’s foreknowledge and logistical signaling to Dāruka; Sātyaki mounts Kṛṣṇa’s chariot and meets Karṇa. A high-profile duel unfolds with complex chariot maneuvers; Sātyaki breaks Karṇa’s defenses, kills his horses, and renders him chariotless, after which Karṇa mounts Duryodhana’s chariot. The chapter closes with additional attrition notes: many Kaurava sons are felled by Bhīma, while Sātyaki and Arjuna continue to cause extensive losses, framed as consequences of Dhṛtarāṣṭra’s earlier misgovernance.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं—यवन और काम्बोजों को जीतकर, सिंह-सा सात्यकि विचित्र ध्वज-कवच धारण किए आपकी सेना में ऐसे घुसा जैसे व्याघ्र मृगों के झुंड में। → द्रोणाचार्य और कृतवर्मा की दुस्तर व्यूह-रेखा को लाँघकर सात्यकि ‘जल-संधि’ समान कठिन मोर्चे को पार करता है। रथ-हाथी-घोड़े और पदातियों की लहरों से भरे ‘सेना-महार्णव’ के किनारे (वेला) पर वह टिककर एक-एक कर महारथियों को चुनौती देता है; कौरव रथी चारों ओर से घेरकर बाण-वर्षा करते हैं। → दुःशासन, दुःसह, दुर्मुख और स्वयं दुर्योधन सहित अनेक कौरव-वीर एक साथ सात्यकि पर शर-प्रहार करते हैं; प्रत्युत्तर में सात्यकि तीक्ष्ण, सुवर्ण-पंख वाले बाणों की घनघोर वर्षा कर रथों की पंक्तियाँ तोड़ देता है और दुर्योधन-पक्ष में भगदड़ मचा देता है। → कौरव सेना के भागने पर सात्यकि पीछा कर उन्हें और अधिक क्षत-विक्षत करता है; दुर्योधन भाइयों सहित रणभूमि से हटने/पलायन की स्थिति में आ जाता है, और कौरव पंक्तियाँ बिखर जाती हैं। → सात्यकि की प्रचण्ड गति के सामने कौरवों का अगला प्रतिरोध कौन संभालेगा—और क्या द्रोण/कृतवर्मा पुनः उसे रोक पाएँगे?

Shlokas

Verse 1

&--“&<&< श्नु नासा त्सथिस विशत्यधिकशततमो< ध्याय: सात्यकिद्वारा दुर्योधनकी सेनाका संहार तथा भाइयोंसहित दुर्योधनका पलायन संजय उवाच जित्वा यवन काम्बोजान्‌ युयुधानस्ततो<र्जुनम्‌ जगाम तव सैन्यस्य मध्येन रथिनां वर:

सञ्जय उवाच—राजन्, यवनान् काम्बोजांश्च जित्वा युयुधानस्ततोऽर्जुनं जगाम। तव सैन्यस्य मध्येन गत्वा रथिनां वरः॥

Verse 2

चारुदंष्टो नरव्याप्रो विचित्रकवचध्वज: । मृगं व्याप्र इवाजिप्रंस्तव सैन्यम भीषयत्‌

चारुदंष्ट्रो नरव्याघ्रो विचित्रकवचध्वजः। मृगं व्याघ्र इवाजिग्रन् तव सैन्यमभीषयत्॥

Verse 3

पुरुषसिंह सात्यकिके दाँत बड़े सुन्दर थे। उनके कवच और ध्वज भी विचित्र थे। वे मृगकी गन्ध लेते हुए व्याप्रके समान आपकी सेनाको भयभीत कर रहे थे ।।

स रथेन चरन् मार्गान् धनुरभ्रामयद् भृशम्। रुक्मपृष्ठं महावेगं रुक्मचन्द्रकसंकुलम्॥

Verse 4

रुक्माड्गदशिरस्त्राणो रुक्मवर्मसमावृत: । रुक्मध्वजथनु: शूरो मेरुशुज्मिवाबभौ

रुक्माङ्गदशिरस्त्राणो रुक्मवर्मसमावृतः। रुक्मध्वजधनुः शूरो मेरुशृङ्ग इवाबभौ॥

Verse 5

सभनुर्मण्डल: संख्ये तेजोभास्कररश्मिवान्‌ । शरदीवोदित: सूर्यो नूसूर्यों विरराज ह

सञ्जय उवाच—युद्धस्थले मण्डलाकारं धनुः धारयन् स सात्यकिः, तेजोभास्कररश्मिवानिव, शरदि नवोदित इव सूर्यः, नरसूर्यः समन्तात् विरराज।

Verse 6

वृषभस्कन्धविक्रान्तो वृषभाक्षो नरर्षभ: । तावकानां बभौ मध्ये गवां मध्ये यथा वृष:

वृषभस्कन्धविक्रान्तो वृषभाक्षो नरर्षभः । तावकानां बभौ मध्ये गवां मध्ये यथा वृषः ॥

Verse 7

उनके कंधे और चाल-ढाल वृषभके समान थे। नेत्र भी वृषभके ही तुल्य बड़े-बड़े थे। वे नरश्रेष्ठ सात्यकि आपके सैनिकोंके बीचमें उसी प्रकार सुशोभित होते थे, जैसे गौओंके झुंडमें साँड़की शोभा होती है ।।

मत्तद्विरदसंकाशं मत्तद्विरदगामिनम् । प्रभिन्नमिव मातङ्गं यूथमध्ये व्यवस्थितम् ॥

Verse 8

द्रोणानीकमतिक्रान्तं भोजानीकं च दुस्तरम्‌

द्रोणानीकमतिक्रान्तं भोजानीकं च दुस्तरम् ।

Verse 9

जलसंधार्णवं तीर्त्वा काम्बोजानां च वाहिनीम्‌ । हार्दिक्यमकरान्मुक्त तीर्ण वै सैन्यसागरम्‌

जलसन्धार्णवं तीर्त्वा काम्बोजानां च वाहिनीम् । हार्दिक्यमकरान्मुक्तः तीर्णो वै सैन्यसागरम् ॥

Verse 10

परिवत्र॒ुः सुसंक्रुद्धास्त्वदीया: सात्यकिं रथा: । वे सात्यकि जब द्रोणाचार्य और कृतवर्माकी दुस्तर सेनाको लाँधचकर जलसंधरूपी सिन्धुको पार करके काम्बोजोंकी सेनाका संहारकर कृतवर्मारूपी ग्राहके चंगुलसे छूटकर आपकी सेनाके समुद्रसे पार हो गये

सञ्जय उवाच—तव रथिनः सुसंक्रुद्धाः सात्यकिं प्रति सर्वतः समवर्तन्त। स दुस्तरान् व्यूहान् भित्त्वा, कृतवर्मग्राहभयात् प्रमुक्तः, तव सैन्यसमुद्रं तीर्त्वा पुनरपि प्रतिकोपेन परिवृतोऽभवत्—यत्र शौर्यं प्रतिशौर्यं जनयति, क्रोधश्च क्रोधं, न च युद्धे विश्रामो दृश्यते।

Verse 11

शकुनिर्दु:सहश्वैव युवा दुर्धर्षण: क्रथ: । अन्ये च बहव: शूरा: शस्त्रवन्तो दुरासदा:

सञ्जय उवाच—शकुनिर्दुःसहश्चैव युवा दुर्धर्षणः क्रथः। अन्ये च बहवः शूराः शस्त्रवन्तो दुरासदाः॥

Verse 12

अथ शब्दो महानासीत्‌ तव सैन्यस्य मारिष

सञ्जय उवाच—अथ शब्दो महानासीत्तव सैन्यस्य मारिष॥

Verse 13

मारुतोद्धूतवेगस्य सागरस्येव पर्वणि । माननीय नरेश! पूर्णिमाके दिन वायुके झकोरोंसे वेगपूर्वक ऊपर उठनेवाले महासागरके समान आपकी सेनामें बड़े चोर-जोरसे गर्जन-तर्जनका शब्द होने लगा ।।

सञ्जय उवाच—मारुतोद्धूतवेगस्य सागरस्येव पर्वणि। तव सैन्ये महाराज महान् नादोऽभवत्तदा॥ तानभिद्रवतः सर्वान् समीक्ष्य शिनिपुङ्गवः॥

Verse 14

शनैर्याहीति यन्तारमब्रवीत्‌ प्रहसन्निव | उन सबको आक्रमण करते देख शिनिप्रवर सात्यकिने अपने सारथिसे हँसते हुए-से कहा--'सूत! धीरे-धीरे चलो ।।

सञ्जय उवाच—शनैर्याहीति यन्तारमब्रवीत् प्रहसन्निव। इदमेतत् समुद्धूतं धार्तराष्ट्रस्य यद् बलम्॥ वेलेव मकरालयं स्थास्याम्यहं महारणे; रथनादेन दिशः सर्वाः प्रतिनादयन्, भूमिं दिवं च सागरांश्च कम्पयन्॥

Verse 15

मामेवाभिमुखं तूर्ण गजाश्वरथपत्तिमत्‌ । नादयन्‌ वै दिश: सर्वा रथघोषेण सारथे

Sañjaya said: “Rushing straight toward me, with elephants, horses, chariots, and foot-soldiers, he made all the directions resound with the thunder of his chariot—O charioteer.”

Verse 16

पृथिवीं चान्तरिक्षं च कम्पयन्‌ सागरानपि । एतद्‌ बलार्णवं सूत वारयिष्ये महारणे

Sañjaya said: “Shaking the earth and the mid-air, and even setting the oceans in turmoil—O charioteer, in this great battle I shall hold back this ocean-like surge of force.” The line conveys a warrior’s resolve to restrain overwhelming violence, framing martial prowess as disciplined control rather than mere destruction.

Verse 17

पश्य मे सूत विक्रान्तमिन्द्रस्येव महामृधे

Sañjaya said: “O charioteer, behold my hero’s prowess in this great battle—like that of Indra himself.”

Verse 18

निहतानाहवे पश्य पदात्यश्चवरथद्विपान्‌

Sañjaya said: “Behold—slain in the thick of battle—foot-soldiers as well as the finest chariot-warriors and elephants.” The line underscores the indiscriminate devastation of war, where rank and strength offer no refuge from death.

Verse 19

मच्छरैरग्निसंकाशैरविंद्धदेहानू सहस्रश: । “इस युद्धस्थलमें मेरे द्वारा मारे गये सहस्रों पैदलों, घुड़सवारों, रथियों और हाथीसवारोंको देखना, जिनके शरीर मेरे अग्निसदृश बाणोंद्वारा विदीर्ण हुए होंगे” ।।

Sañjaya said: “With arrows blazing like fire, he pierced bodies by the thousand. ‘Look here on this battlefield at the thousands of foot-soldiers, horsemen, chariot-warriors, and elephant-riders slain by me—men whose bodies will be torn apart by my fire-like shafts.’ While the mighty Sātyaki was speaking in this manner, all your troops, eager for battle, quickly closed in upon him, shouting commands such as, ‘Run! Strike! Stand fast! Look—look!’

Verse 20

समीपे सैनिकास्ते तु शीघ्रमीयुर्युयुत्सव: । जह्याद्रवस्व तिछेति पश्य पश्येति वादिन:

समीपे सैनिकास्ते तु शीघ्रमीयुर्युयुत्सवः । जह्याद्रवस्व तिष्ठेति पश्य पश्येति वादिनः ॥

Verse 21

तानेवं ब्रुवतो वीरान्‌ सात्यकिर्निशितै: शरै: । जघान त्रिशतानश्चान्‌ कुज्जरांश्व चतु:ःशतान्‌

तानेवं ब्रुवतो वीरान् सात्यकिर्निशितैः शरैः । जघान त्रिशतानश्वान् कुञ्जरांश्च चतुःशतान् ॥ (लघ्वस्त्रश्च विचित्रयोधी च प्रहसन् शिनिपुङ्गवः ।)

Verse 22

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तस्य तेषां च धन्विनाम्‌ । देवासुररणप्रख्य: प्रावर्तत जनक्षय:,सात्यकि तथा आपकी सेनाके धनुर्धरोंका वह नरसंहारकारी युद्ध देवासुर-संग्रामके समान अत्यन्त भयंकर हो चला

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तस्य तेषां च धन्विनाम् । देवासुररणप्रख्यः प्रावर्तत जनक्षयः ॥

Verse 23

मेघजालनिभ सैन्यं तव पुत्रस्य मारिष । प्रत्यगृह्नाच्छिने: पौत्र: शरैराशीविषोपमै:

मेघजालनिभं सैन्यं तव पुत्रस्य मारिष । प्रत्यगृह्णाच्छिनेः पौत्रः शरैराशीविषोपमैः ॥

Verse 24

प्रच्छाद्यमान: समरे शरजालै: स वीर्यवान्‌ । असम्भ्रमन्‌ महाराज तावकानवधीद्‌ बहून्‌

प्रच्छाद्यमानः समरे शरजालैः स वीर्यवान् । असम्भ्रमन् महाराज तावकानवधीद् बहून् ॥

Verse 25

आश्चर्य तत्र राजेन्द्र सुमहद्‌ दृष्टवानहम्‌ । न मोघ:ः सायकः: कश्चित्‌ सात्यकेरभवत्‌ प्रभो,शक्तिशाली राजेन्द्र! वहाँ सबसे महान्‌ आश्वर्यकी बात मैंने यह देखी कि सात्यकिका कोई भी बाण व्यर्थ नहीं गया

सञ्जय उवाच—आश्चर्यं तत्र राजेन्द्र सुमहद् दृष्टवानहम्। न मोघः सायकः कश्चित् सात्यकेरभवत् प्रभो॥

Verse 26

रथनागाश्वकलिल: पदात्यूमिसमाकुल: । शैनेयवेलामासाद्य स्थित: सैन्यमहार्णव:,रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी तथा पैदलरूपी लहरोंसे व्याप्त हुई आपकी सागर-सदृश सेना सात्यकिरूपी तटभूमिके समीप आकर अवरुद्ध हो गयी

रथनागाश्वकलिलः पदात्यूर्मिसमाकुलः। शैनेयवेलामासाद्य स्थितः सैन्यमहार्णवः॥

Verse 27

सम्भ्रान्तनरनागाश्चवमावर्तत मुहुर्मुहु: । तत्‌ सैन्यमिषुभिस्तेन वध्यमानं समन्ततः,सात्यकिके बाणोंद्वारा सब ओरसे मारी जाती हुई आपकी सेनाके पैदल, हाथी और घोड़े सभी घबरा गये और बारंबार चक्कर काटने लगे

सम्भ्रान्तनरनागाश्च वमावर्तत मुहुर्मुहुः। तत् सैन्यमिषुभिस्तेन वध्यमानं समन्ततः॥

Verse 28

बश्राम तत्र तत्रैव गाव: शीतार्दिता इव । पदातिन रथं नागं सादिनं तुरगं तथा

वश्राम तत्र तत्रैव गावः शीतार्दिता इव। पदातीन् रथं नागं सादिनं तुरगं तथा॥

Verse 29

न तादूक्‌ कदनं राजन्‌ कृतवांस्तत्र फाल्गुन:

न तादृक् कदनं राजन् कृतवांस्तत्र फाल्गुनः॥

Verse 30

अत्यर्जुनं शिने: पौत्रो युध्यते पुरुषर्षभ:

सञ्जय उवाच—शिनेः पौत्रः पुरुषर्षभः सात्यकिरत्यर्जुनं समरेऽभ्ययुध्यत; उभौ महावीरौ प्रतिमुखं संनिपत्य युधि स्पर्धां परमां निन्यतुः।

Verse 31

वीतभीर्लाघवोपेत: कृतित्वं सम्प्रदर्शयन्‌ । शिनिपौत्र पुरुषश्रेष्ठ सात्यकि निर्भय हो बड़ी फुर्तीसे अस्त्र चलाते और अपनी कुशलताका प्रदर्शन करते हुए अर्जुनसे भी अधिक पराक्रमपूर्वक युद्ध कर रहे थे || ३० $ई || ततो दुर्योधनो राजा सात्वतस्य त्रिभि: शरै:

सञ्जय उवाच—वीतभीर्लाघवोपेतः कृतित्वं सम्प्रदर्शयन्। शिनिपौत्रः पुरुषश्रेष्ठः सात्यकिर्निर्भयो युधि॥

Verse 32

विव्याध सूत॑ निशितैश्नतुर्भिश्चतुरों हयान्‌ सात्यकिं च त्रिभिविद्ध्वा पुनरष्टाभिरेव च

सञ्जय उवाच—विव्याध सूतं निशितैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान्। सात्यकिं च त्रिभिर्विद्ध्वा पुनरष्टाभिरेव च॥

Verse 33

दुःशासन: षोडशभिर्विव्याध शिनिपुड्भवम्‌ | शकुनि: पञ्चविंशत्या चित्रसेनश्व॒ पठचभि:,तदनन्तर दुःशासनने सोलह, शकुनिने पचीस और चित्रसेनने पाँच बाणोंद्वारा शिनिप्रवर सात्यकिको बींध डाला

सञ्जय उवाच—दुःशासनः षोडशभिर्विव्याध शिनिपुङ्गवम्। शकुनिः पञ्चविंशत्या चित्रसेनश्च पञ्चभिः॥

Verse 34

दुःसह: पठचदशभिर्विव्याधोरसि सात्यकिम्‌ | उत्स्मयन्‌ वृष्णिशार्दटूलस्तथा बाणै: समाहतः

सञ्जय उवाच—दुःसहः पञ्चदशभिर्विव्याधोरसि सात्यकिम्। उत्स्मयन् वृष्णिशार्दूलस्तथा बाणैः समाहतः॥

Verse 35

गाढविद्धानरीन्‌ कृत्वा मार्गणै: सोडतितेजनै:

सञ्जय उवाच—सोडतितेजनैर्मार्गणैः शत्रून् गाढविद्धानरीन् कृत्वा स तान् समन्तात् प्राविध्यत्। रणस्य निष्ठुरवेगेऽस्मिन् पराक्रमः संयमे न, अपि तु विदारणे पराजये च परिमीयते।

Verse 36

शैनेय: श्येनवत्‌ संख्ये व्यचरल्लघुविक्रम: । उस युद्धस्थलमें शीघ्रतापूर्वक पराक्रम करनेवाले शिनिवंशी सात्यकि अपने अत्यन्त तेज बाणोंद्वारा शत्रुओंको गहरी चोट पहुँचाकर बाजके समान सब ओर विचरने लगे ।।

सञ्जय उवाच—शैनेयः श्येनवत् संख्ये लघुविक्रमो व्यचरৎ। तीक्ष्णैः प्रज्वलितैः शरैः शत्रून् गाढं विद्ध्वा रणभूमौ शीघ्रं समन्तात् पर्यटत्; स्वधर्मे नियतं वेगं स दर्शयामास।

Verse 37

चित्रसेनं शतेनैव दशभिर्दु:सहं तथा

सञ्जय उवाच—चित्रसेनं शतेनैव शराणां समवाकिरत्, दशभिश्च तथा दुःसहं पराजयत्। एवं रणस्य वेगोऽतिवर्धत; पराक्रमः क्षिप्रनिश्चयेनैव परिमीयते।

Verse 38

अथान्यद्‌ धनुरादाय श्यालस्तव विशाम्पते,प्रजानाथ! तत्पश्चात्‌ आपके सालेने दूसरा धनुष लेकर सात्यकिको पहले आठ बाण मारे। फिर पाँच बाणोंसे उन्हें घायल कर दिया। दुःशासनने दस और दुःसहने भी तीन बाण मारे

सञ्जय उवाच—अथान्यद् धनुरादाय श्यालस्तव विशाम्पते प्रजानाथ, स सात्यकिं प्रथममष्टभिः शरैर्जघान; ततः पञ्चभिरपि तं विव्याध। दुःशासनश्च दशभिः, दुःसहश्च त्रिभिः शरैः प्राहरत्। एवं समवेतैः कौरवैः सात्यकिरभ्यवकीर्यत।

Verse 39

अष्टाभि: सात्यकिं विदृध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभि: । दुःशासनश्व दशभिर्दु:सहश्न त्रिभि: शरै:ः

सञ्जय उवाच—अष्टाभिः सात्यकिं विद्ध्वा पुनः पञ्चभिरपि विव्याध। दुःशासनश्च दशभिः, दुःसहश्च त्रिभिः शरैः प्राहरत्। एवं प्रजानाथ, बहुभिरभ्युपेतः सात्यकिः संख्ये तीव्रं पीडितोऽभवत्।

Verse 40

दुर्मुखश्न॒ द्वादशभी राजन्‌ विव्याध सात्यकिम्‌ | दुर्योधनस्त्रिसप्तत्या विद्ूध्वा भारत माधवम्‌

सञ्जय उवाच—राजन्, दुर्मुखो द्वादशभिर्बाणैः सात्यकिं विव्याध; दुर्योधनस्तु, भारत, त्रिसप्तत्या शरैर्माधवं विद्ध्वा, युद्धं तीव्रेणाभिप्रायेण प्रचोदयामास।

Verse 41

ततोअस्य निशितैर्बाणैस्त्रिभिविंव्याध सारथिम्‌ । राजन! दुर्मुखने बारह बाणोंसे सात्यकिको क्षत-विक्षत कर दिया। भारत! इसके बाद दुर्योधनने तिहत्तर बाणोंसे युयुधानको घायल करके तीन पैने बाणोंद्वारा उनके सारथिको भी बींध डाला || ४० ई || तान्‌ सर्वान्‌ सहितान्‌ शूरान्‌ यतमानान्‌ महारथान्‌

ततोऽस्य निशितैर्बाणैस्त्रिभिर्विव्याध सारथिम्।

Verse 42

ततः स रथियनां श्रेष्ठस्तव पुत्रस्य सारथिम्‌

ततः स रथिनां श्रेष्ठस्तव पुत्रस्य सारथिम्।

Verse 43

पतिते सारथौ तस्मिंस्तव पुत्ररथ: प्रभो

पतिते सारथौ तस्मिंस्तव पुत्ररथः प्रभो।

Verse 44

वातायमानैस्तैरश्वैरपानीयत संगरात्‌ । प्रभो! उस सारथिके धराशायी होनेपर आपके पुत्रका रथ हवाके समान तीव्र वेगसे भागनेवाले घोड़ोंद्वारा युद्धस्थलसे दूर हटा दिया गया ।।

वातायमानैस्तैः अश्वैरपानीयत सङ्गरात्। ततस्तव सुताः राजन् सैनिकाश्च विशाम्पते॥

Verse 45

राज्ञो रथमभिप्रेक्ष्य विद्रुता:शतशो5भवन्‌ | राजन! प्रजानाथ! तदनन्तर आपके पुत्र और सैनिक राजा दुर्योधनके रथकी वैसी दशा देखकर सैकड़ोंकी संख्यामें भाग खड़े हुए || ४४ $ ।।

सञ्जय उवाच—राज्ञो रथं तादृशीं दशां दृष्ट्वा शतशो जनाः त्रस्ताः पलायितवन्तः। राजन् प्रजानाथ! तदनन्तरं तव पुत्राः सैनिकाश्च राजा दुर्योधनस्य रथं तथावस्थं विलोक्य बहवो विद्रुताः। तत्र तत् सैन्यं विद्रुतं दृष्ट्वा भारत सात्यकिः…

Verse 46

विद्राव्य सर्वसैन्यानि तावकानि सहस्रश:

सञ्जय उवाच—सर्वाणि तावकानि सैन्यानि सहस्रशो विद्राव्य तान् सर्वतः प्रत्यवर्तयताम्।

Verse 47

प्रययौ सात्यकी राजन श्वेताश्वस्य रथं प्रति । राजन्‌! इस प्रकार आपके सहस्रों सैनिकोंको भगाकर सात्यकि श्वेतवाहन अर्जुनके रथकी ओर चल दिये ।।

सञ्जय उवाच—राजन्, सात्यकिः श्वेताश्वस्यार्जुनस्य रथं प्रति प्रययौ। तं प्रयान्तं महाबाहुं दृष्ट्वा तावकाः, मारिष, दृष्टमप्यदृष्टवत्कृत्वा कर्मान्तरं प्रयोजयन्। शरानाददानं च सारथिं रक्षमाणं चात्मानं पालयानं च सात्यकिं तावकाः समपूजयन्।

Verse 76

व्याप्रा इव जिघांसन्तस्त्वदीया: समुपाद्रवन्‌ । मतवाले हाथीके समान पराक्रमी और मदोनन्‍्मत्त गजराजके समान मन्दगतिसे चलनेवाले सात्यकि जब मदस्रावी मातंगके समान कौरव-सैनिकोंके मध्यभागमें खड़े हुए

सञ्जय उवाच—सात्यकिः मदोन्मत्तगजराज इव मन्दं गच्छन् कौरवसैनिकानां मध्ये स्थितः। तदा तव योद्धारः तं जिघांसवो व्याघ्रा इव क्षुधिताः समुपाद्रवन्।

Verse 113

पृष्ठतः सात्यकिं यान्तमन्वधावन्नमर्षिण: । दुर्योधन

सञ्जय उवाच—सात्यकिं यान्तं पृष्ठतोऽन्वधावन् अमर्षिणः। दुर्योधनश्चित्रसेनश्च दुःशासनश्च विविंशतिः शकुनिर्दुःसहश्च तरुणो वीरः दुर्धर्षः क्रथश्चान्ये च बहवो दुर्जयाः शूरवीराः क्रोधसमाविष्टा अस्त्रशस्त्राणि गृहीत्वा तस्य पृष्ठतो धावन्ति स्म।

Verse 119

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिके कौरव-सेनामें प्रवेशके प्रसंगमें यवनोंकी पराजयविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे कौरवसेनायां यवनपराजयविषये एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः समाप्तः।

Verse 120

इति श्रीमहा भारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे दुर्योधनपलायने विंशत्यधिकशततमो<ध्याय:

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे दुर्योधनपलायने विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः समाप्तः।

Verse 166

ला | वेलेव मकरालयम्‌ । 'सूत! यह हाथी

सञ्जय उवाच— सूत! पश्यैतां दुर्योधनस्य सेनां गजाश्वरथपत्तिभिः परिपूर्णां युद्धाय समुत्सुकां ममाभिमुखीं तीव्रवेगेनाभ्युपयान्तीम्। अहं तु अस्मिन् महति समराङ्गणे रथघर्घरनादेन सर्वा दिशः प्रतिध्वनयन् पृथिवीमन्तरिक्षं सागरांश्च कम्पयन् एतां सेनासमुद्रं प्रगमनात् निवारयिष्यामि—यथा पूर्णिमायामुद्वेलितं महासागरं तटभूमिः प्रतिबध्नाति।

Verse 176

एष सैन्यानि शत्रूणां विधमामि शितै: शरै: । 'सारथे! इस महायुद्धमें देवराज इन्द्रके समान मेरा पराक्रम तुम देखो। मैं अभी-अभी अपने पैने बाणोंसे शत्रुओंकी सेनाओंका संहार कर डालता हूँ

एष सैन्यानि शत्रूणां विधमामि शितैः शरैः। सारथे! अस्मिन् महायुद्धे देवराजेन्द्रसमं मम पराक्रमं पश्य। अद्यैव शत्रुसैन्यं तीक्ष्णैः सायकैः संहरिष्यामि॥

Verse 283

अदिद्धं तत्र नाद्राक्षं युयुधानस्य सायकै: । सर्दीसे पीड़ित हुई गायोंके समान आपकी सारी सेना वहीं चक्कर लगा रही थी। मैंने वहाँ एक भी पैदल

सञ्जय उवाच— तत्र युयुधानस्य सायकैर्विद्धं विना न कञ्चिदद्राक्षम्। सर्वा च ते सेना तत्र भ्रममाणा मोहिता बभूव—यथा व्याधिपीडिताः पशवः। न च तत्र पत्तिं रथिनं गजं अश्वारोहिणं वा कञ्चिदपश्यं यो युयुधानशरैर्न विद्धः स्यात्।

Verse 293

यादृक्‌ क्षयमनीकानामकरोत्‌ सात्यकिर्नूप । राजन! नरेश्वर! सात्यकिने आपके सैनिकोंका जैसा संहार किया था, वैसा वहाँ अर्जुनने भी नहीं किया था

सञ्जय उवाच—राजन् नरेश्वर! सात्यकिः सैन्यानामनीकानां यादृशं क्षयमकरोत्, तादृशं तत्रार्जुनोऽपि न चकार। तव सैन्येषु तेन कृतो वधः सर्वधनुर्धरश्रेष्ठैरपि दुर्लभ इवाभवत्।

Verse 343

तानविध्यन्महाराज सवनिव त्रिभिस्त्रिभि: | इसके बाद दुःसहने सात्यकिकी छातीमें पंद्रह बाण मारे। महाराज! इस प्रकार उन बाणोंसे आहत होकर वृष्णिवंशके सिंह सात्यकिने मुसकराते हुए ही उन सबको ही तीन- तीन बाणोंसे घायल कर दिया

सञ्जय उवाच—महाराज! स तान् सवनिरिव पुरा त्रिभिस्त्रिभिर्बाणैरविध्यत्। ततः दुःसहः सात्यकेः उरस्येकपञ्चदशभिः शरैर्विव्याध। तैर्बाणैरभिहतोऽपि वृष्णिसिंहः सात्यकिः स्मयमान एव तान् सर्वान् पुनस्त्रिभिस्त्रिभिर्बाणैर्व्यथयामास।

Verse 363

दुर्योधन त्रिभिरबाणिरभ्यविध्यत्‌ स्तनान्तरे । उन्होंने सुबलपुत्र शकुनिके धनुष और दस्ताने काटकर दुर्योधनकी छातीमें तीन बाण मारे

सञ्जय उवाच—सात्यकिः दुर्योधनं स्तनान्तरदेशे त्रिभिर्बाणैरभ्यविध्यत्। ततः सुबलपुत्रस्य शकुनेर्धनुर्दस्ताने च छित्त्वा दुर्योधनस्य वक्षसि त्रीन् शरान् न्यपातयत्।

Verse 413

पज्चभि: पज्चभिर्बाणै: पुनर्विव्याध सात्यकि: | तब सात्यकिने एक साथ विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन समस्त शूरवीर महारथियोंको पुन: पाँच-पाँच बाणोंसे घायल कर दिया

सञ्जय उवाच—सात्यकिः पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैः पुनर्विव्याध तान्। ततः विजयायैकत्र प्रयतमानान् तान् सर्वान् शूरान् महारथान् पुनरपि पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः समन्तात् क्षतवान्।

Verse 426

आजघानाशु भल्लेन स हतो न्यपतद्‌ भुवि । तत्पश्चात्‌ रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकिने आपके पुत्रके सारथिके ऊपर शीघ्र ही एक भल्लका प्रहार किया। सारथि उसके द्वारा मारा जाकर पृथ्वीपर गिर पड़ा

सञ्जय उवाच—स भल्लेनाशु आजघान; स हतो न्यपतद् भुवि। ततः परं रथिनां श्रेष्ठः सात्यकिः तव पुत्रस्य सारथिं शीघ्रमेव भल्लेनाभ्यहनत्। तेनाभिहतः सारथिः प्राणान् त्यक्त्वा पृथिव्यां पपात।

Verse 456

अवाकिरच्छरैस्तीक्ष्ण रुक्मपुड्खै: शिलाशितै: । भारत! आपकी सेनाको भागती देख सात्यकिने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तीखे बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी

अवाकिरच्छरैस्तीक्ष्णै रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः। भारत! तव सेनां पलायमानां दृष्ट्वा सात्यकिः शाणोपपन्नैः सुवर्णपक्षैस्तीक्ष्णैर्बाणैः प्रचण्डां वर्षामारभत॥

Verse 3736

दुःशासन तु विंशत्या विव्याध शिनिपुड्भव: । फिर शिनिवंशके प्रमुख वीरने चित्रसेनको सौ, दुःसहको दस और दुःशासनको बीस बाणोंसे घायल कर दिया

दुःशासनं तु विंशत्या विव्याध शिनिपुड्भवः। ततः शिनिवंशप्रवरः चित्रसेनं शतेन, दुःसहं दशभिः, दुःशासनं विंशत्या बाणैर्विव्याध॥

Frequently Asked Questions

Arjuna confronts the conflict between battlefield necessity and the prohibition against harming one’s ācārya: he neutralizes Kṛpa under pressure, then interprets the act through the lens of guru-obligation and karmic consequence.

Instruction (vidyā) creates enduring ethical debt; even justified action can require moral reckoning. The chapter models reflective accountability—evaluating conduct not only by outcome but by relational duty and intention.

No explicit phalaśruti appears; the meta-commentary is functional and ethical—Sañjaya frames events as consequence-laden history, culminating in an attribution of large-scale loss to earlier failures of counsel and governance.

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