Kṛṣṇa-vīrya-kathana
Dhṛtarāṣṭra’s appraisal of Vāsudeva’s deeds
यत्सेना: समकम्पन्त यद्वीरानस्पृशद् भयम् । के तत्र नाजहुढद्रोंणं के क्षुद्रा: प्राद्रवन्ू भयात्,जहाँ सारी सेनाएँ काँप उठीं, समस्त वीरोंके मनमें भय समा गया, वहाँ किन वीरोंने ट्रोणाचार्यका साथ नहीं छोड़ा और कौन-कौनसे अधम सैनिक भयके मारे मैदान छोड़कर भाग गये?
यत्सेनाः समकम्पन्त यद्वीरानस्पृशद् भयम् । के तत्र नाजहुः द्रोणं के क्षुद्राः प्राद्रवन् भयात् ॥
वैशम्पायन उवाच