भीष्म-पर्व अध्याय १०० — त्रिगर्त-आक्रमण, भीष्म-केन्द्रित पुनर्संयोजन, तथा शक्त्यस्त्र-विनिमय
संस्तूयमान: सूतैश्न मागधैश्व महायशा: । पूजयानश्च तान् सर्वान् सर्वलोकेश्चरेश्वर:,(एवं स प्रययौ राजा सर्वसैन्यसमावृतः ।) सम्पूर्ण जगत्का अधीश्वर महायशस्वी राजा दुर्योधन सम्पूर्ण सेनाओंसे घिरकर सूतों और मागधोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता और सब लोगोंका समादर करता हुआ (भीष्मके शिविरकी ओर) आगे बढ़ता गया
saṁstūyamānaḥ sūtaiś ca māgadhaiś ca mahāyaśāḥ | pūjayānaś ca tān sarvān sarvalokeśvareśvaraḥ || (evaṁ sa prayayau rājā sarvasainyasamāvṛtaḥ |)
सूतैर्मागधैश्च संस्तूयमानो महायशाः सर्वलोकेश्वर इव स राजा सर्वान् तान् पूजयन्। एवं स राजा सर्वसैन्यसमावृतः स्तुतिं शृण्वन् सर्वजनान् सत्कृत्य भीष्मस्य शिविरं प्रति प्रययौ।
कर्ण उवाच