Garuḍa–Śakra Saṃvāda and the Retrieval of Amṛta (गरुड–शक्र संवादः अमृत-अपहरण-प्रसङ्गः)
Upa-parva: Āstīka Upākhyāna (Garuḍa–Amṛta Episode)
Garuḍa offers Śakra (Indra) friendship and, when asked, states his extraordinary strength while disclaiming self-praise as improper unless queried. He claims capacity to bear the earth with mountains and oceans, emphasizing unwearied power. Indra responds by accepting the alliance and requests that Garuḍa not give the soma/amṛta to others, warning of resulting hostility. Garuḍa clarifies he is transporting it for a specific purpose and will not hand it over to anyone; instead he proposes to place it somewhere so Indra may swiftly take it. Pleased, Indra offers a boon; Garuḍa asks that the powerful serpents become his food, aligning with his role as nāga-adversary and recalling the coercive conditions tied to his mother’s servitude. Garuḍa returns to the serpents, announces he will place the amṛta on kuśa grass, and instructs them to bathe and perform auspicious rites before drinking; he also declares his mother freed as agreed. When the serpents depart for ritual preparation, Indra retrieves the amṛta. The serpents return, realize the amṛta is gone, and lick the darbha, resulting in their tongues becoming bifurcated; darbha becomes ritually purified by amṛta-contact. The chapter closes with a phalaśruti: hearing or reciting this account is said to yield merit and ascent to heaven through praising Garuḍa.
Chapter Arc: गरुड एक विशाल वट-वृक्ष की महाशाखा तोड़कर उड़ान भरते हैं—पर उसी क्षण उनकी दृष्टि नीचे उलटे लटके तपोरत वालखिल्य ब्रह्मर्षियों पर पड़ती है, और बल के साथ विवेक की परीक्षा आरम्भ होती है। → अपरिमित वेग से उड़ते हुए भी गरुड यह निश्चय करते हैं कि ‘ऋषियों को हानि नहीं होनी चाहिए’; वे शाखा को संभाले रखते हैं और सोचते हैं कि इसे कहाँ छोड़ा जाए जहाँ मनुष्यों का निवास न हो और तपस्वियों का अपमान भी न हो। महर्षि उनके अलौकिक सामर्थ्य को देखकर विस्मित होते हैं और ‘महाखग’ नाम से उनका अभिषेक-सा कर देते हैं। → गरुड महर्षियों से विनीत होकर पूछते हैं—‘भगवन्, इस शाखा को मैं कहाँ छोड़ूँ?’—और उसी समय उनके अद्भुत कर्म से आकाश में बिना बादल के भी विकट गर्जना, अशुभ उत्पात और देवताओं में हलचल उठती है; इन्द्र स्वयं कारण पूछते हैं कि शत्रु दिखता नहीं, फिर यह भय क्यों। → देवगण युद्ध के लिए सज्ज हो जाते हैं—असुर-पुर-विदारक तेजस्वी सुर परिघों और आयुधों से भरकर आकाश को तपन-किरणों-सा दीप्त कर देते हैं; गरुड का पराक्रम देव-लोक तक कंपित कर देता है और कथा देव-सभा की तैयारी पर ठहरती है। → देवता शस्त्र धारण कर मोर्चा बाँधते हैं—अब प्रश्न यह है कि यह उत्पात किसके विरुद्ध है: क्या गरुड स्वयं देवताओं के सामने चुनौती बनेंगे, या कोई और महान प्रयोजन प्रकट होगा?
Verse 1
न-आऔका-<० ड-ण करा - “कनिष्छान् पुत्रवत् पश्येज्ज्येष्ठो भ्राता पितु: समः' अर्थात् “बड़ा भाई पिताके समान होता है। वह अपने छोटे भाइयोंको पुत्रके समान देखे।” यह शास्त्रकी आज्ञा है। जिनमें फूट हो जाती है, वे पीछे इस आज्ञाका पालन नहीं कर पाते। त्रिशो5थ्याय: गरुडका कश्यपजीसे मिलना, उनकी प्रार्थनासे वालखिल्य ऋषियोंका शाखा छोड़कर तपके लिये प्रस्थान और गरुडका निर्जन पर्वतपर उस शाखाको छोड़ना सौतिरुवाच स्पृष्टमात्रा तु पद्धयां सा गरुडेन बलीयसा । अभज्यत तरो: शाखा भग्नां चैनामधारयत्,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनकादि महर्षियो! महाबली गरुडके पैरोंका स्पर्श होते ही उस वृक्षकी वह महाशाखा टूट गयी; किंतु उस टूटी हुई शाखाको उन्होंने फिर पकड़ लिया
उग्रश्रवा उवाच—शौनकादीन् महर्षीन् प्रति: महाबलिनो गरुडस्य पादस्पर्शमात्रेणैव तस्य तरोर्महाशाखा भग्ना; तथापि भग्नामपि तां शाखां स जग्राहाधारयच्च, निपातं निवारयन्।
Verse 2
तां भड़्क््त्वा स महाशाखां स्मयमानो विलोकयन् । अथात्र लम्बतो5पश्यद् वालखिल्यानधोमुखान्,उस महाशाखाको तोड़कर गरुड मुसकराते हुए उसकी ओर देखने लगे। इतनेहीमें उनकी दृष्टि वालखिल्य नामवाले महर्षियोंपर पड़ी, जो नीचे मुँह किये उसी शाखामें लटक रहे थे
तां भग्नां स महाशाखां स्मयमानो विलोकयन्। अथात्र लम्बतोऽपश्यद् वालखिल्यानधोमुखान्॥
Verse 3
ऋष यो ह्वात्र लम्बन्ते न हन््यामिति तानूषीन् । तपोरतान् लम्बमानान ब्रह्मर्षीनभिवीक्ष्य सः,तपस्यामें तत्पर हुए उन ब्रह्मर्षियोंको वटकी शाखामें लटकते देख गरुडने सोचा -- इसमें ऋषि लटक रहे हैं। मेरे द्वारा इनका वध न हो जाय। यह गिरती हुई शाखा इन ऋषियोंका अवश्य वध कर डालेगी।” यह विचारकर वीरवर पक्षिराज गरुडने हाथी और कछुएको तो अपने पंजोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और उन महर्षियोंके विनाशके भयसे झपटकर वह शाखा अपनी चोंचमें ले ली। उन मुनियोंकी रक्षाके लिये ही गरुडने ऐसा अदभुत पराक्रम किया था
ऋषयो ह्यत्र लम्बन्ते न हन्यामिति तान् मुनीन्। तपोरतान् लम्बमानान् ब्रह्मर्षीनभिवीक्ष्य सः॥ पतन्तीं तां शाखां मनसा चिन्तयामास—एषा निपतन्ती शाखा नूनं तान् ऋषीन् हनिष्यति। इति मत्वा स पक्षिराजो गजकूर्मौ तु पादतलैर्दृढं जग्राह, महर्षीणां विनाशभयात् झटिति तां शाखां चञ्च्वा जग्राह। मुनिरक्षणार्थमेव तदद्भुतं पराक्रमं प्रदर्शितवान्।
Verse 4
हन्यादेतान् सम्पतन्ती शाखेत्यथ विचिन्त्य सः । नखैर्दढतरं वीर: संगृह्द गजकच्छपौ,तपस्यामें तत्पर हुए उन ब्रह्मर्षियोंको वटकी शाखामें लटकते देख गरुडने सोचा -- इसमें ऋषि लटक रहे हैं। मेरे द्वारा इनका वध न हो जाय। यह गिरती हुई शाखा इन ऋषियोंका अवश्य वध कर डालेगी।” यह विचारकर वीरवर पक्षिराज गरुडने हाथी और कछुएको तो अपने पंजोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और उन महर्षियोंके विनाशके भयसे झपटकर वह शाखा अपनी चोंचमें ले ली। उन मुनियोंकी रक्षाके लिये ही गरुडने ऐसा अदभुत पराक्रम किया था
वटशाखां पतन्तीं तत्र तपस्यापरान् ब्रह्मर्षीन् विलम्बमानान् दृष्ट्वा गरुडः समचिन्तयत्—“एषा शाखा पतति; पतिता चेत् एते ऋषयः नूनं नश्येयुः; मया तेषां वधो मा भूत्विति।” इति निश्चित्य स वीरः स्वनखैः गजकच्छपौ दृढतरं जग्राह, महर्षिविनाशभयात् च झटिति अभिपत्य तां शाखां चञ्च्वा जग्राह—मुनिरक्षणार्थमेव तदद्भुतं पराक्रमं चकार।
Verse 5
स तद्विनाशसंत्रासादभिपत्य खगाधिप: । शाखामास्येन जग्राह तेषामेवान्ववेक्षया,तपस्यामें तत्पर हुए उन ब्रह्मर्षियोंको वटकी शाखामें लटकते देख गरुडने सोचा -- इसमें ऋषि लटक रहे हैं। मेरे द्वारा इनका वध न हो जाय। यह गिरती हुई शाखा इन ऋषियोंका अवश्य वध कर डालेगी।” यह विचारकर वीरवर पक्षिराज गरुडने हाथी और कछुएको तो अपने पंजोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और उन महर्षियोंके विनाशके भयसे झपटकर वह शाखा अपनी चोंचमें ले ली। उन मुनियोंकी रक्षाके लिये ही गरुडने ऐसा अदभुत पराक्रम किया था
तेषां विनाशसंत्रासात् खगाधिपः अभिपत्य तां शाखामास्येन जग्राह, तेषामेव मुनिनां रक्षणे मनः स्थापयन्। पतन्त्या शाखया तपस्विनां वधो मा भूत्विति स एव तदर्थं प्रवृत्तः।
Verse 6
अतिदैवं तु तत् तस्य कर्म दृष्टवा महर्षय: । विस्मयोत्कम्पह्दया नाम चक्रुर्महाखगे,जिसे देवता भी नहीं कर सकते थे, गरुडका ऐसा अलौकिक कर्म देखकर वे महर्षि आश्चर्यसे चकित हो उठे। उनके हृदयमें कम्प छा गया और उन्होंने उस महान् पक्षीका नाम इस प्रकार रखा (उनके गरुड नामकी व्युत्पत्ति इस प्रकार की)--
तस्य तदतिदैवं कर्म दृष्ट्वा महर्षयः विस्मयोत्कम्पहृदयाः अभवन्। ते च तं महाखगं तस्यैव कर्ममहत्त्वेन नाम्ना समन्वयन्।
Verse 7
गुरु भारं समासाद्योड्डीन एष विहंगम: । गरुडस्तु खगश्रेष्स्तस्मात् पन्नमनभोजन:,ये आकाशमें विचरनेवाले सर्पभोजी पक्षिराज भारी भार लेकर उड़े हैं; इसलिये (“गुरुम् आदाय उड्डीन इति गरुड:” इस व्युत्पत्तिके अनुसार) ये गरुड कहलायेंगे
गुरुं भारं समादाय उड्डीन एष विहंगमः। तस्माद् गरुड इत्येष खगश्रेष्ठः प्रकीर्त्यते॥ पन्नगान् न भुङ्क्ते चेति संयमं चास्य दर्श्यते।
Verse 8
ततः शनै: पर्यपतत् पक्षै: शैलान् प्रकम्पयन् । एवं सो5भ्यपतद् देशान् बहूनू सगजकच्छप:,तदनन्तर गरुड अपने पंखोंकी हवासे बड़े-बड़े पर्वतोंको कम्पित करते हुए धीरे-धीरे उड़ने लगे। इस प्रकार वे हाथी और कछुएको साथ लिये हुए ही अनेक देशोंमें उड़ते फिरे
ततः शनैः पर्यपतत् पक्षैः शैलान् प्रकम्पयन्। एवं सोऽभ्यपतद् देशान् बहून् सगजकच्छपः॥
Verse 9
दयार्थ वालखिल्यानां न च स्थानमविन्दत । स गत्वा पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनमञज्जसा,वालखिल्य ऋषियोंके ऊपर दयाभाव होनेके कारण ही वे कहीं बैठ न सके और उड़ते- उड़ते अनायास ही पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर जा पहुँचे
दयार्थं वालखिल्यानां न च स्थानमविन्दत । स गत्वा पर्वतश्रेष्ठं गन्धमादनमञ्जसा ॥
Verse 10
ददर्श कश्यपं तत्र पितरं तपसि स्थितम् | ददर्श तं पिता चापि दिव्यरूपं विहंगमम्,वहाँ उन्होंने तपस्यामें लगे हुए अपने पिता कश्यपजीको देखा। पिताने भी अपने पुत्रको देखा। पक्षिराजका स्वरूप दिव्य था। वे तेज, पराक्रम और बलसे सम्पन्न तथा मन और वायुके समान वेगशाली थे। उन्हें देखकर पर्वतके शिखरका भान होता था। वे उठे हुए ब्रह्मदण्डके समान जान पड़ते थे
ददर्श कश्यपं तत्र पितरं तपसि स्थितम् । ददर्श तं पिता चापि दिव्यरूपं विहंगमम् ॥
Verse 11
तेजोवीर्यबलोपेतं मनोमारुतरंहसम् । शैलशड्डप्रतीकाशं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम्,वहाँ उन्होंने तपस्यामें लगे हुए अपने पिता कश्यपजीको देखा। पिताने भी अपने पुत्रको देखा। पक्षिराजका स्वरूप दिव्य था। वे तेज, पराक्रम और बलसे सम्पन्न तथा मन और वायुके समान वेगशाली थे। उन्हें देखकर पर्वतके शिखरका भान होता था। वे उठे हुए ब्रह्मदण्डके समान जान पड़ते थे
तेजोवीर्यबलोपेतं मनोमारुतरंहसम् । शैलशृङ्गप्रतीकाशं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ॥
Verse 12
अचिन्त्यमनभिध्येयं सर्वभूतभयंकरम् । महावीर्यधरं रौद्रं साक्षादग्निमिवोद्यतम्,उनका स्वरूप ऐसा था, जो चिन्तन और ध्यानमें नहीं आ सकता था। वे समस्त प्राणियोंके लिये भय उत्पन्न कर रहे थे। उन्होंने अपने भीतर महान् पराक्रम धारण कर रखा था। वे बहुत भयंकर प्रतीत होते थे। जान पड़ता था, उनके रूपमें स्वयं अग्निदेव प्रकट हो गये हैं
अचिन्त्यमनभिध्येयं सर्वभूतभयंकरम् । महावीर्यधरं रौद्रं साक्षादग्निमिवोद्यतम् ॥
Verse 13
अप्रधृष्यमजेयं च देवदानवराक्षसै: । भेत्तारं गिरिशुज्भाणां समुद्रजलशोषणम्,देवता, दानव तथा राक्षस कोई भी न तो उन्हें दबा सकता था और न जीत ही सकता था। वे पर्वत-शिखरोंको विदीर्ण करने और समुद्रके जलको सोख लेनेकी शक्ति रखते थे
अप्रधृष्यमजेयं च देवदानवराक्षसैः । भेत्तारं गिरिशृङ्गाणां समुद्रजलशोषणम् ॥
Verse 14
लोकसंलोडडनं घोर कृतान्तसमदर्शनम् | तमागतमभिप्रेक्ष्य भगवान् कश्यपस्तदा । विदित्वा चास्य संकल्पमिदं वचनमत्रवीत्,वे समस्त संसारको भयसे कम्पित किये देते थे। उनकी मूर्ति बड़ी भयंकर थी। वे साक्षात् यमराजके समान दिखायी देते थे। उन्हें आया देख उस समय भगवान् कश्यपने उनका संकल्प जानकर इस प्रकार कहा
लोकसंलोडनं घोरं कृतान्तसमदर्शनम् । तमागतमभिप्रेक्ष्य भगवान् कश्यपस्तदा । विदित्वा चास्य संकल्पमिदं वचनमब्रवीत् ॥
Verse 15
कश्यप उवाच पुत्र मा साहसं कार्षी्मा सद्यो लप्स्यसे व्यथाम् | मा त्वां दहेयु: संक्रुद्धा वालखिल्या मरीचिपा:,कश्यपजी बोले--बेटा! कहीं दुःसाहसका काम न कर बैठना, नहीं तो तत्काल भारी दुःखमें पड़ जाओगे। सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले वालखिल्य महर्षि कुपित होकर तुम्हें भस्म न कर डालें
कश्यप उवाच पुत्र मा साहसं कार्षीर्मा सद्यो लप्स्यसे व्यथाम् । मा त्वां दहेयुः संक्रुद्धा वालखिल्या मरीचिपाः ॥
Verse 16
सौतिरुवाच ततः प्रसादयामास कश्यप: पुत्रकारणात् | वालखिल्यान् महाभागांस्तपसा हतकल्मषान्,उग्रश्रवाजी कहते हैं--तदनन्तर पुत्रके लिये महर्षि कश्यपने तपस्यासे निष्पाप हुए महाभाग वालखिल्य मुनियोंको इस प्रकार प्रसन्न किया
सौतिरुवाच ततः प्रसादयामास कश्यपः पुत्रकारणात् । वालखिल्यान् महाभागांस्तपसा हतकल्मषान् ॥
Verse 17
कश्यप उवाच प्रजाहितार्थमारम्भो गरुडस्य तपोधना: । चिकीर्षति महत्कर्म तदनुज्ञातुमरहथ,कश्यपजी बोले--तपोधनो! गरुडका यह उद्योग प्रजाके हितके लिये हो रहा है। ये महान् पराक्रम करना चाहते हैं, आपलोग इन्हें आज्ञा दें
कश्यप उवाच प्रजाहितार्थमारम्भो गरुडस्य तपोधनाः । चिकीर्षति महत्कर्म तदनुज्ञातुमर्हथ ॥
Verse 18
सौतिरुवाच एवमुक्ता भगवता मुनयस्ते समभ्ययु: । मुक्त्वा शाखां गिरिं पुण्यं हिमवन्तं तपोडर्थिन:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--भगवान् कश्यपके इस प्रकार अनुरोध करनेपर वे वालखिल्य मुनि उस शाखाको छोड़कर तपस्या करनेके लिये परम पुण्यमय हिमालयपर चले गये
सौतिरुवाच एवमुक्ता भगवता मुनयस्ते समभ्ययुः । मुक्त्वा शाखां गिरिं पुण्यं हिमवन्तं तपोऽर्थिनः ॥
Verse 19
ततस्तेष्वपयातेषु पितरं विनतासुत: । शाखाव्याक्षिप्तवदन: पर्यपृच्छत कश्यपम्,उनके चले जानेपर विनतानन्दन गरुडने, जो मुँहमें शाखा लिये रहनेके कारण कठिनाईसे बोल पाते थे, अपने पिता कश्यपजीसे पूछा--
ततस्तेष्वपयातेषु विनतासुतो गरुडः शाखाव्याक्षिप्तवदनः स्वं पितरं कश्यपं पर्यपृच्छत्।
Verse 20
भगवन् कक््व विमुज्चामि तरो: शाखामिमामहम् । वर्जित मानुषैर्देशमाख्यातु भगवान् मम,“'भगवन्! इस वृक्षकी शाखाको मैं कहाँ छोड़ दूँ? आप मुझे ऐसा कोई स्थान बतावें जहाँ बहुत दूरतक मनुष्य न रहते हों”
भगवन्, क्व विमुञ्चामि तरोः शाखामिमामहम्। वर्जितं मानुषैर्देशमाख्यातु भगवान् मम॥
Verse 21
ततो नि:पुरुषं शैलं हिमसंरुद्धकन्दरम् । अगम्यं मनसाप्यन्यैस्तस्थाचख्यौ स कश्यप:,तब कश्यपजीने उन्हें एक ऐसा पर्वत बता दिया, जो सर्वथा निर्जन था। जिसकी कन्दराएँ बर्फसे ढँकी हुई थीं और जहाँ दूसरा कोई मनसे भी नहीं पहुँच सकता था
ततो निःपुरुषं शैलं हिमसंरुद्धकन्दरम्। अगम्यं मनसाप्यन्यैस्तस्थाचख्यौ स कश्यपः॥
Verse 22
त॑ं पर्वतं महाकुक्षिमुद्दिश्य स महाखग: । जवेनाभ्यपतत् तार्क्ष्य: सशाखागजकच्छप:,उस बड़े पेटवाले पर्वतका पता पाकर महान् पक्षी गरुड उसीको लक्ष्य करके शाखा, हाथी और कछुएसहित बड़े वेगसे उड़े
तं पर्वतं महाकुक्षिमुद्दिश्य स महाखगः। जवेनाभ्यपतत्तार्क्ष्यः सशाखागजकच्छपः॥
Verse 23
नतां वध्री परिणहेच्छतचर्मा महातनुभ् | शाखिनो महतीं शाखां यां प्रगृह्दा ययौ खग:,गरुड वटवृक्षकी जिस विशाल शाखाको चोंचमें लेकर जा रहे थे, वह इतनी मोटी थी कि सौ पशुओंके चमड़ोंसे बनायी हुई रस्सी भी उसे लपेट नहीं सकती थी
न तां वध्री परिणहेच्छतचर्मा महातनुः। शाखिनो महतीं शाखां यां प्रगृह्य ययौ खगः॥
Verse 24
स ततः शतसाहस्र॑ योजनान्तरमागत: । कालेन नातिमहता गरुड: पतगेश्वर:,पक्षिराज गरुड उसे लेकर थोड़ी ही देरमें वहाँसे एक लाख योजन दूर चले आये
स ततः शतसाहस्रं योजनान्तरमागतः । कालेन नातिमहता गरुडः पतगेश्वरः ॥
Verse 25
सतं गत्वा क्षणेनैव पर्वतं वचनात् पितु: । अमुज्चन्महतीं शाखां सस्वनं तत्र खेचर:,पिताके आदेशसे क्षणभरमें उस पर्वतपर पहुँचकर उन्होंने वह विशाल शाखा वहीं छोड़ दी। गिरते समय उससे बड़ा भारी शब्द हुआ
शतं गत्वा क्षणेनैव पर्वतं वचनात्पितुः । अमुञ्चन्महतीं शाखां सस्वनं तत्र खेचरः ॥
Verse 26
पक्षानिलहतकश्चास्य प्राकम्पत स शैलराट । मुमोच पुष्पवर्ष च समागलितपादप:,वह पर्वतराज उनके पंखोंकी वायुसे आहत होकर काँप उठा। उसपर उगे हुए बहुतेरे वृक्ष गिर पड़े और वह फूलोंकी वर्षा-सी करने लगा
पक्षानिलहतश्चास्य प्राकम्पत स शैलराट् । मुमोच पुष्पवर्षं च समागलितपादपः ॥
Verse 27
शृज्भाणि च व्यशीर्यन्त गिरेस्तस्प समन्तत: । मणिकाज्चनचित्राणि शोभयन्ति महागिरिम्,उस पर्वतके मणिकांचनमय विचित्र शिखर, जो उस महान् शैलकी शोभा बढ़ा रहे थे, सब ओरसे चूर-चूर होकर गिर पड़े
शृङ्गाणि च व्यशीर्यन्त गिरेस्तस्य समन्ततः । मणिकाञ्चनचित्राणि शोभयन्ति महागिरिम् ॥
Verse 28
शाखिनो बहवश्चापि शाखयाभिहतास्तया । काज्चनै: कुसुमैर्भान्ति विद्युत्वन्त इवाम्बुदा:,उस विशाल शाखासे टकराकर बहुत-से वृक्ष भी धराशायी हो गये। वे अपने सुवर्णमय फ़ूलोंके कारण बिजलीसहित मेघोंकी भाँति शोभा पाते थे
शाखिनो बहवश्चापि शाखयाभिहतास्तया । काञ्चनैः कुसुमैर्भान्ति विद्युत्वन्त इवाम्बुदाः ॥
Verse 29
इस प्रकार श्रीमह़्ा भारत आदिपव॑ीके अन्तर्गत आस्तीकपरवरर्में गरुडचरित्र-विषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,ते हेमविकचा भूमौ युता: पर्वतधातुभि: । व्यराजण्छाखिनस्तत्र सूर्याशुप्रतिरज्जिता: सुवर्णमय पुष्पवाले वे वृक्ष धरतीपर गिरकर पर्वतके गेरू आदि धातुओंसे संयुक्त हो सूर्यकी किरणोंद्वारा रँगे हुए-से सुशोभित होते थे
हेमविच्छा भूमौ युताः पर्वतधातुभिः । व्यराजञ्छाखिनस्तत्र सूर्यांशुप्रतिरञ्जिताः ॥ सुवर्णमयपुष्पवन्तस्ते वृक्षाः पृथिव्यां पतित्वा गिरिधातुभिः—गैरिकादिभिः—संमिश्राः, तत्र शाखाभिः सूर्यकिरणैः प्रतिरञ्जिताः इव दीप्तिमन्तो व्यराजन्।
Verse 30
ततस्तस्य गिरे: शृड्रमास्थाय स खगोत्तम: । भक्षयामास गरुडस्तावुभी गजकच्छपौ,तदनन्तर पक्षिराज गरुडने उसी पर्वतकी एक चोटीपर बैठकर उन दोनों--हाथी और कछुएको खाया इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे त्रिंशो&ध्याय:
ततस्तस्य गिरेः शृङ्गमास्थाय स खगोत्तमः । भक्षयामास गरुडस्तावुभौ गजकच्छपौ ॥ ततो गिरिशिखरे निषण्णः पक्षिराजः गरुडः तौ उभौ—गजं कच्छपं च—भक्षयामास।
Verse 31
तावुभौ भक्षयित्वा तु स तार्क्ष्य: कूर्मकुञ्जरौ । ततः पर्वतकूटाग्रादुत्पपात महाजव:,इस प्रकार कछुए और हाथी दोनोंको खाकर महान् वेगशाली गरुड पर्वतकी उस चोटीसे ही ऊपरकी ओर उड़े
तावुभौ भक्षयित्वा तु स तार्क्ष्यः कूर्मकुञ्जरौ । ततः पर्वतकूटाग्रादुत्पपात महाजवः ॥ कूर्मकुञ्जरौ तौ उभौ भक्षयित्वा, महाजवः तार्क्ष्यः पर्वतकूटाग्रात् ऊर्ध्वं समुत्पपात।
Verse 32
प्रावर्तन्ताथ देवानामुत्पाता भयशंसिन: । इन्द्रस्य वज्ज॑ दयितं प्रजज्वाल भयात् ततः,उस समय देवताओंके यहाँ बहुत-से भयसूचक उत्पात होने लगे। देवराज इन्द्रका प्रिय आयुध वज्र भयसे जल उठा
प्रावर्तन्ताथ देवानामुत्पाता भयशंसिनः । इन्द्रस्य वज्रं दयितं प्रजज्वाल भयात् ततः ॥ तदा देवलोके भयशंसिन उत्पाता बहवः प्रावर्तन्त; ततः इन्द्रस्य दयितं वज्रमपि भयात् इव प्रजज्वाल।
Verse 33
सथूमा न््यपतत् सार्चिर्दिवोल्का नभसभ्ष्युता । तथा वसूनां रुद्राणामादित्यानां च सर्वश:,आकाशसे दिनमें ही धूएँ और लपटोंके साथ उल्का गिरने लगी। वसु, रुद्र, आदित्य, साध्य, मरुदगण तथा और जो-जो देवता हैं, उन सबके आयुध परस्पर इस प्रकार उपद्रव करने लगे, जैसा पहले कभी देखनेमें नहीं आया था। देवासुर-संग्रामके समय भी ऐसी अनहोनी बात नहीं हुई थी। उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ बड़े जोरकी आँधी उठने लगी। हजारों उल्काएँ गिरने लगीं
सधूमा न्यपतत् सार्चिर्दिवोल्का नभसः श्युता । तथा वसूनां रुद्राणामादित्यानां च सर्वशः ॥ दिवा अपि नभसः सधूमा सार्चिर्दिवोल्का न्यपतत्; एवं वसूनां रुद्राणामादित्यानां च सर्वशः उत्पाताः प्रादुर्भवन्।
Verse 34
साध्यानां मरुतां चैव ये चान्ये देवतागणा: । स्वं स्वं प्रहरणं तेषां परस्परमुपाद्रवत्,आकाशसे दिनमें ही धूएँ और लपटोंके साथ उल्का गिरने लगी। वसु, रुद्र, आदित्य, साध्य, मरुदगण तथा और जो-जो देवता हैं, उन सबके आयुध परस्पर इस प्रकार उपद्रव करने लगे, जैसा पहले कभी देखनेमें नहीं आया था। देवासुर-संग्रामके समय भी ऐसी अनहोनी बात नहीं हुई थी। उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ बड़े जोरकी आँधी उठने लगी। हजारों उल्काएँ गिरने लगीं
साध्यानां मरुतां चैव ये चान्ये देवतागणाः । स्वं स्वं प्रहरणं तेषां परस्परमुपाद्रवत् ॥
Verse 35
अभूतपूर्व संग्रामे तदा देवासुरेडपि च । ववुर्वाता: सनिर्घाता: पेतुरुल्का: सहस्रश:,आकाशसे दिनमें ही धूएँ और लपटोंके साथ उल्का गिरने लगी। वसु, रुद्र, आदित्य, साध्य, मरुदगण तथा और जो-जो देवता हैं, उन सबके आयुध परस्पर इस प्रकार उपद्रव करने लगे, जैसा पहले कभी देखनेमें नहीं आया था। देवासुर-संग्रामके समय भी ऐसी अनहोनी बात नहीं हुई थी। उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ बड़े जोरकी आँधी उठने लगी। हजारों उल्काएँ गिरने लगीं
अभूतपूर्वे संग्रामे तदा देवासुरेष्वपि च । ववुर्वाताः सनिर्घाताः पेतुरुल्काः सहस्रशः ॥
Verse 36
निरभ्रमेव चाकाशं प्रजगर्ज महास्वनम् । देवानामपि यो देव: सो<प्यवर्षत शोणितम्,आकाशमें बादल नहीं थे तो भी बड़ी भारी आवाजमें विकट गर्जना होने लगी। देवताओंके भी देवता पर्जन्य रक्तकी वर्षा करने लगे
निरभ्रमेव चाकाशं प्रजगर्ज महास्वनम् । देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्षत शोणितम् ॥
Verse 37
मम्लुर्माल्यानि देवानां नेशुस्तेजांसि चैव हि । उत्पातमेघा रौद्राश्न ववृषु: शोणितं बहु,देवताओंके दिव्य पुष्पहार मुर॒झा गये, उनके तेज नष्ट होने लगे। उत्पातकालिक बहुत- से भयंकर मेघ प्रकट हो अधिक मात्रामें रुधिरकी वर्षा करने लगे
मम्लुर्माल्यानि देवानां नेशुस्तेजांसि चैव हि । उत्पातमेघा रौद्राश्च ववृषुः शोणितं बहु ॥
Verse 38
रजांसि मुकुटान्येषामुत्थितानि व्यधर्षयन् । ततस्त्राससमुद्धिग्न: सह देवै: शतक्रतुः । उत्पातान् दारुणान् पश्यन्नित्युवाच बृहस्पतिम्,बहुत-सी धूलें उड़कर देवताओंके मुकुटोंको मलिन करने लगीं। ये भयंकर उत्पात देखकर देवताओं-सहित इन्द्र भयसे व्याकुल हो गये और बृहस्पतिजीसे इस प्रकार बोले
रजांसि मुकुटान्येषामुत्थितानि व्यधर्षयन् । ततस्त्राससमुद्धिग्नः सह देवैः शतक्रतुः । उत्पातान् दारुणान् पश्यन्नित्युवाच बृहस्पतिम् ॥
Verse 39
इन्द्र वाच किमर्थ भगवन् घोरा उत्पाता: सहसोत्थिता: । न च शत्रु प्रपश्यामि युधि यो नः प्रधर्षयेत्,इन्द्रने पूछा--भगवन्! सहसा ये भयंकर उत्पात क्यों होने लगे हैं? मैं ऐसा कोई शात्र नहीं देखता, जो युद्धमें हम देवताओंका तिरस्कार कर सके
इन्द्र उवाच—किमर्थं भगवन् घोराः उत्पाताः सहसोत्थिताः? न च शत्रुं प्रपश्यामि युधि यो नः प्रधर्षयेत्॥
Verse 40
ब॒हस्पतिरु्वाच तवापराधाद् देवेन्द्र प्रमादाच्च शतक्रतो । तपसा वालखिल्यानां महर्षीणां महात्मनाम्,बृहस्पतिजीने कहा--देवराज इन्द्र! तुम्हारे ही अपराध और प्रमादसे तथा महात्मा वालखिल्य महर्षियोंके तपके प्रभावसे कश्यप मुनि और विनताके पुत्र पक्षिराज गरुड अमृतका अपहरण करनेके लिये आ रहे हैं। वे बड़े बलवान् और इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं
बृहस्पतिरुवाच—तवापराधाद् देवेन्द्र प्रमादाच्च शतक्रतो। तपसा वालखिल्यानां महर्षीणां महात्मनाम्॥
Verse 41
कश्यपस्य मुने: पुत्रो विनतायाश्व खेचर: । हर्तु सोममभिप्राप्तो बलवान् कामरूपधृक्,बृहस्पतिजीने कहा--देवराज इन्द्र! तुम्हारे ही अपराध और प्रमादसे तथा महात्मा वालखिल्य महर्षियोंके तपके प्रभावसे कश्यप मुनि और विनताके पुत्र पक्षिराज गरुड अमृतका अपहरण करनेके लिये आ रहे हैं। वे बड़े बलवान् और इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं
कश्यपस्य मुनेः पुत्रो विनतायाश्च खेचरः। हर्तु सोममभिप्राप्तो बलवान् कामरूपधृक्॥
Verse 42
समर्थों बलिनां श्रेष्ठो हर्तु सोम॑ं विहंगम: । सर्व सम्भावयाम्यस्मिन्नसा ध्यमपि साधयेत्,बलवानोंमें श्रेष्ठ आकाशचारी गरुड अमृत हर ले जानेमें समर्थ हैं। मैं उनमें सब प्रकारकी शक्तियोंके होनेकी सम्भावना करता हूँ। वे असाध्य कार्य भी सिद्ध कर सकते हैं
समर्थो बलिनां श्रेष्ठो हर्तु सोमं विहंगमः। सर्वं सम्भावयाम्यस्मिन्नसाध्यमपि साधयेत्॥
Verse 43
सौतिरुवाच श्रुत्वैतद् वचन शक्र: प्रोवाचामृतरक्षिण: । महावीर्यबल: पक्षी हर्तु सोममिहोद्यतः,उग्रश्रवाजी कहते हैं--बृहस्पतिजीकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र अमृतकी रक्षा करनेवाले देवताओंसे बोले--'रक्षको! महान् पराक्रमी और बलवान पक्षी गरुड यहाँसे अमृत हर ले जानेको उद्यत हैं
सौतिरुवाच—श्रुत्वैतद्वचनं शक्रः प्रोवाचामृतरक्षिणः। महावीर्यबलः पक्षी हर्तु सोममिहोद्यतः॥
Verse 44
युष्मान् सम्बोधयाम्येष यथा न स हरेद् बलात् | अतुल हि बल॑ तस्य बृहस्पतिरुवाच ह,“मैं तुम्हें सचेत कर देता हूँ, जिससे वे बलपूर्वक इस अमृतको न ले जा सकें। बृहस्पतिजीने कहा है कि उनके बलकी कहीं तुलना नहीं है”
काश्यप उवाच—युष्मानहं पूर्वमेव सम्बोधयामि, यथा स बलादमृतं न हरेत्। अतुलं हि तस्य बलम्—इति बृहस्पतिरुवाच।
Verse 45
तच्छुत्वा विबुधा वाक््यं विस्मिता यत्नमास्थिता: । परिवार्यामृतं तस्थुर्वज्नी चेन्द्र: प्रतापवान्,इन्द्रकी यह बात सुनकर देवता बड़े आश्वर्यमें पड़ गये और यत्नपूर्वक अमृतको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। प्रतापी इन्द्र भी हाथमें वज् लेकर वहाँ डट गये
तद्वाक्यं श्रुत्वा विबुधा विस्मिता यत्नमास्थिताः। परिवार्यामृतं तस्थुर्वज्री चेन्द्रोऽपि प्रतापवान्॥
Verse 46
धारयन्तो विचित्राणि काउचनानि मनस्विन: । कवचानि महाहणि वैदूर्यविकृतानि च,मनस्वी देवता विचित्र सुवर्णमय तथा बहुमूल्य वैदूर्य मणिमय कवच धारण करने लगे
धारयन्तो विचित्राणि काञ्चनानि मनस्विनः। कवचानि महार्हाणि वैदूर्यविकृतानि च॥
Verse 47
चर्माण्यपि च गात्रेषु भानुमन्ति दृढानि च । विविधानि च शस्त्राणि घोररूपाण्यनेकश:,उन्होंने अपने अंगोंमें यथास्थान मजबूत और चमकीले चमड़ेके बने हुए हाथके मोजे आदि धारण किये। नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्र भी ले लिये। उन सब आयुधोंकी धार बहुत तीखी थी। वे श्रेष्ठ देवता सब प्रकारके आयुध लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये। उनके पास ऐसे-ऐसे चक्र थे, जिनसे सब ओर आगकी चिनगारियाँ और धूमसहित लपटें प्रकट होती थीं। उनके सिवा परिघ, त्रिशूल, फरसे, भाँति-भाँतिकी तीखी शक्तियाँ चमकीले खड्ग और भयंकर दिखायी देनेवाली गदाएँ भी थीं। अपने शरीरके अनुरूप इन अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर देवता डट गये
चर्माण्यपि च गात्रेषु भानुमन्ति दृढानि च। विविधानि च शस्त्राणि घोररूपाण्यनेकशः॥
Verse 48
शिततीक्ष्णाग्रधाराणि समुद्यम्य सुरोत्तमा: | सविस्फुलिड्गजज्वालानि सधूमानि च सर्वश:
शिततीक्ष्णाग्रधाराणि समुद्यम्य सुरोत्तमाः। सविस्फुलिङ्गजज्वालानि सधूमानि च सर्वशः॥
Verse 49
चक्राणि परिघांश्ैव त्रिशूलानि परश्वधान् | शक्तीश्न विविधास्तीक्ष्णा: करवालांश्व निर्मलान् | स्वदेहरूपाण्यादाय गदाश्षोग्रप्रदर्शना:
कश्यप उवाच—ते चक्राणि परिघांश्चैव त्रिशूलानि परश्वधान् । शक्तीश्च विविधास्तीक्ष्णाः करवालांश्च निर्मलान् ॥ स्वदेहरूपाण्यादाय गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः ॥
Verse 50
तैः शस्त्रैर्भानुमद्धिस्ते दिव्याभरण भूषिता: । भानुमन्त: सुरगणास्तस्थुर्विगतकल्मषा:,दिव्य आभूषणोंसे विभूषित निष्पाप देवगण तेजस्वी अस्त्र-शस्त्रोंक॒े साथ अधिक प्रकाशमान हो रहे थे
कश्यप उवाच—तैः शस्त्रैर्भानुमद्भिस्ते दिव्याभरणभूषिताः । भानुमन्तः सुरगणास्तस्थुर्विगतकल्मषाः ॥
Verse 51
अनुपमबलवीर्यतेजसो धृतमनस: परिरक्षणेडमृतस्य । असुरपुरविदारणा: सुरा ज्वलनसमिद्धवपु:प्रकाशिन:,उनके बल, पराक्रम और तेज अनुपम थे, जो असुरोंके नगरोंका विनाश करनेमें समर्थ एवं अग्निके समान देदीप्यमान शरीरसे प्रकाशित होनेवाले थे; उन्होंने अमृतकी रक्षाके लिये अपने मनमें दृढ निश्चय कर लिया था
कश्यप उवाच—अनुपमबलवीर्यतेजसो धृतमनसः परिरक्षणेऽमृतस्य । असुरपुरविदारणाः सुरा ज्वलनसमिद्धवपुःप्रकाशिनः ॥
Verse 52
इति समरवरं सुरा: स्थितास्ते परिघसहस्रशतै: समाकुलम् । विगलितमिव चाम्बरान्तरं तपनमरीचिविकाशितं बभासे,इस प्रकार वे तेजस्वी देवता उस श्रेष्ठ समरके लिये तैयार खड़े थे। वह रणांगण लाखों परिघ आदि आयुधोंसे व्याप्त होकर सूर्यकी किरणोंद्वारा प्रकाशित एवं टूटकर गिरे हुए दूसरे आकाशके समान सुशोभित हो रहा था
इति समरवरं सुराः स्थितास्ते परिघसहस्रशतैः समाकुलम् । विगलितमिव चाम्बरान्तरं तपनमरीचिविकाशितं बभासे ॥
Verse 419
उन्होंने अपने अंगोंमें यथास्थान मजबूत और चमकीले चमड़ेके बने हुए हाथके मोजे आदि धारण किये। नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्र भी ले लिये। उन सब आयुधोंकी धार बहुत तीखी थी। वे श्रेष्ठ देवता सब प्रकारके आयुध लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये। उनके पास ऐसे-ऐसे चक्र थे, जिनसे सब ओर आगकी चिनगारियाँ और धूमसहित लपटें प्रकट होती थीं। उनके सिवा परिघ, त्रिशूल, फरसे, भाँति-भाँतिकी तीखी शक्तियाँ चमकीले खड्ग और भयंकर दिखायी देनेवाली गदाएँ भी थीं। अपने शरीरके अनुरूप इन अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर देवता डट गये
ते स्वाङ्गेषु यथास्थानं दृढानि दीप्तचर्माणि हस्तत्राणादिकानि च । धृतवन्तो महाघोरान् नानाशस्त्राणि सर्वशः ॥ तेषामायुधधाराश्च सर्वाः परमदारुणाः । ते देवाः श्रेष्ठवर्यास्तु सर्वायुधसमन्विताः ॥ युद्धाय समुपातिष्ठन् चक्राणि च तदाऽहरन् । यैः सर्वतोऽग्निचिङ्गाराः सधूमज्वालसम्भवाः ॥ परिघास्त्रिशूलपरशवः शक्तयश्च विविधास्तथा । खड्गा दीप्ताः सगदाश्च घोररूपप्रदर्शनाः ॥ स्वदेहानुरूपाणि तान्यस्त्राणि समादाय देवाः सुसंहिता भूत्वा युद्धाय समवस्थिताः ॥
Garuḍa must satisfy a coerced transactional promise to the serpents to liberate his mother while preventing an ethically destabilizing outcome—serpents acquiring amṛta—requiring a solution that is formally compliant yet outcome-aware.
The chapter models disciplined speech and duty: power is acknowledged without gratuitous self-exaltation, and obligations are managed through precise commitments, strategic timing, and prioritization of a higher protective order.
Yes. The closing verses state that one who regularly hears or recites this account—especially in learned assemblies—gains religious merit and is said to attain heaven through the commemorative praise (prākīrtana) of Garuḍa.