
Saṃvaraṇa–Tapatī Vivāhaḥ (The Marriage of Saṃvaraṇa and Tapatī) — Mahābhārata, Ādi Parva 163
Upa-parva: Vaṁśānucarita / Kuru-vaṁśa-prasaṅga (Genealogical and dynastic episode: Saṃvaraṇa–Tapatī narrative)
Vasiṣṭha petitions Savitṛ (the solar deity) for Tapatī’s hand on behalf of King Saṃvaraṇa, presenting the king’s suitability in reputation and dharma-oriented understanding. Savitṛ assents, praises the match, and formally entrusts Tapatī to Vasiṣṭha, who brings her to Saṃvaraṇa. The king, moved by desire and joy upon seeing Tapatī, completes a period of austerity; through tapas and Vasiṣṭha’s spiritual authority he obtains her as wife. The marriage is performed according to proper rite on a mountain frequented by divine beings. Saṃvaraṇa then remains with Tapatī for twelve years in secluded enjoyment, during which the capital and realm suffer drought and deprivation. Observing the crisis, Vasiṣṭha retrieves the king and returns him to the city; rains resume and the realm recovers. Saṃvaraṇa later performs extended rites with Tapatī, and the narrative culminates in the birth of Kuru—providing an etiological link for the Kaurava identity and Arjuna’s epithet tied to that lineage.
Chapter Arc: एक ब्राह्मण-परिवार की रक्षा के लिए भीमसेन स्वयं भोजन-सामग्री लेकर बकासुर के पास जाने का निश्चय करता है—और मार्ग में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि आज ‘कर’ नहीं, ‘कर्तव्य’ चुकाया जाएगा। → युधिष्ठिर की चिंता और सावधानी—कि नगरवासी न जानें, ब्राह्मण को यत्नपूर्वक आश्वस्त रखा जाए—के बीच भीम निर्भय होकर राक्षस के हिस्से का अन्न स्वयं खा लेता है और उसे पुकारकर चुनौती देता है। यह अपमान बकासुर के क्रोध को भड़काता है और वह युद्ध के लिए दौड़ पड़ता है। → भयंकर गर्जना करता नरभक्षी बकासुर भीम पर झपटता है; दोनों महाबली एक-दूसरे को घसीटते, खींचते, भिड़ते हैं। अंततः भीम घुटने से पीठ दबाकर राक्षस की कमर तोड़ देता है—टूटते शरीर से मुख से रक्त फूट पड़ता है और बकासुर का अंत निश्चित हो जाता है। → बकासुर का वध हो जाता है; ब्राह्मण-परिवार और एकचक्रा नगर भय-मुक्त होते हैं। पाण्डवों की गुप्त पहचान सुरक्षित रहते हुए भी उनका धर्म-रक्षण प्रकट हो उठता है। → नगर में फैले इस परिवर्तन का प्रभाव—और पाण्डवों के ‘अज्ञात’ रहते हुए भी उनके यश का फैलना—आगे की घटनाओं के लिए भूमि तैयार करता है।
Verse 1
अड-४#-रू- द्विषष्ट्याधिकशततमो< ध्याय: भीमसेनका भोजन-सामग्री लेकर बकासुरके पास जाना और स्वयं भोजन करना तथा युद्ध करके उसे मार गिराना युधिछिर उवाच उपपन्नमिदं मातस्त्वया यद् बुद्धिपूर्वकम् । आर्तस्य ब्राह्मणस्यैतदनुक्रोशादिदं कृतम्,युधिष्ठिर बोले--माँ! आपने समझ-बूझकर जो कुछ निश्चय किया है, वह सब उचित है। आपने संकटमें पड़े हुए ब्राह्मणपर दया करके ही ऐसा विचार किया है
युधिष्ठिर उवाच—मातः, त्वया बुद्धिपूर्वकं यद् उपपन्नं निश्चयं कृतं, तत् सर्वथा युक्तम्। आर्तस्य ब्राह्मणस्य अनुकम्पया एवैतत् कृतम्।
Verse 2
ध्रुवमेष्यति भीमो5यं निहत्य पुरुषादकम् | सर्वथा ब्राह्मणस्यार्थे यदनुक्रोशवत्यसि,निश्चय ही भीमसेन उस राक्षसको मारकर लौट आयेंगे; क्योंकि आप सर्वथा ब्राह्मणकी रक्षाके लिये ही उसपर इतनी दयालु हुई हैं
ध्रुवं एष भीमोऽयं पुरुषादकं निहत्य प्रत्येष्यति। यतः त्वं सर्वथा ब्राह्मणस्य हितरक्षणे अनुकम्पावती।
Verse 3
यथा व्विदं न विन्देयुर्नरा नगरवासिन: । तथायं ब्राह्मणो वाच्य: परिग्राह्श्च यत्नत:,आपको यत्नपूर्वक ब्राह्मणपर अनुग्रह तो करना ही चाहिये; किंतु ब्राह्मगणसे यह कह देना चाहिये कि वे इस प्रकार मौन रहें कि नगरनिवासियोंको यह बात मालूम न होने पाये
यथा इदं नगरवासिनो न विदेयुः तथा व्यवस्था क्रियताम्। अयं ब्राह्मणो यत्नतः वाच्यः, परिग्राह्यश्च यथाविधि।
Verse 4
वैशम्पायन उवाच (युधिष्ठिरेण सम्मन्त्रय ब्राह्मुणार्थमरिंदम । कुन्ती प्रविश्य तान् सर्वान् सान्त्ववयामास भारत ।।) ततो रात्र्यां व्यतीतायामन्नमादाय पाण्डव: । भीमसेनो ययौ तत्र यत्रासौ पुरुषादक:ः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ब्राह्मण (की रक्षा)-के निमित्त युधिष्ठिरसे इस प्रकार सलाह करके कुन्तीदेवीने भीतर जाकर समस्त ब्राह्मण-परिवारको सान्त्वना दी। तदनन्तर रात बीतनेपर पाण्डुनन्दन भीमसेन भोजनसामग्री लेकर उस स्थानपर गये, जहाँ वह नरभक्षी राक्षस रहता था। बक राक्षसके वनमें पहुँचकर महाबली पाण्डुकुमार भीमसेन उसके लिये लाये हुए अन्नको स्वयं खाते हुए राक्षसका नाम ले-लेकर उसे पुकारने लगे
वैशम्पायन उवाच—भारत, युधिष्ठिरेण सह सम्मन्त्र्य ब्राह्मणार्थम्, कुन्ती प्रविश्य तान् सर्वान् ब्राह्मणान् सान्त्वयामास। ततः रात्र्यां व्यतीतायाम् अन्नमादाय पाण्डवो भीमसेनो ययौ तत्र यत्रासौ पुरुषादकः।
Verse 5
आसाद्य तु वनं तस्य रक्षस: पाण्डवो बली । आजुहाव ततो नाम्ना तदन्नमुपपादयन्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ब्राह्मण (की रक्षा)-के निमित्त युधिष्ठिरसे इस प्रकार सलाह करके कुन्तीदेवीने भीतर जाकर समस्त ब्राह्मण-परिवारको सान्त्वना दी। तदनन्तर रात बीतनेपर पाण्डुनन्दन भीमसेन भोजनसामग्री लेकर उस स्थानपर गये, जहाँ वह नरभक्षी राक्षस रहता था। बक राक्षसके वनमें पहुँचकर महाबली पाण्डुकुमार भीमसेन उसके लिये लाये हुए अन्नको स्वयं खाते हुए राक्षसका नाम ले-लेकर उसे पुकारने लगे
आसाद्य तु वनं तस्य रक्षसः पाण्डवो बली । आजुहाव ततो नाम्ना तदन्नमुपपादयन् ॥
Verse 6
ततः स राक्षस: क्रुद्धो भीमस्य वचनात् तदा | आजगाम सुसंक्रुद्धो यत्र भीमो व्यवस्थित:,भीमके इस प्रकार पुकारनेसे वह राक्षस कुपित हो उठा और अत्यन्त क्रोधमें भरकर जहाँ भीमसेन बैठकर भोजन कर रहे थे, वहाँ आया
ततः स राक्षसः क्रुद्धो भीमस्य वचनात् तदा । आजगाम सुसंक्रुद्धो यत्र भीमो व्यवस्थितः ॥
Verse 7
महाकायो महावेगो दारयन्निव मेदिनीम् | लोहिताक्ष: करालश्न लोहितश्मश्रुमूर्थज:,उसका शरीर बहुत बड़ा था। वह इतने महान् वेगसे चलता था, मानो पृथ्वीको विदीर्ण कर देगा। उसकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं। आकृति बड़ी विकराल जान पड़ती थी। उसके दाढ़ी, मूँछ और सिरके बाल लाल रंगके थे
महाकायो महावेगो दारयन्निव मेदिनीम् । लोहिताक्षः करालास्यः लोहितश्मश्रुमूर्धजः ॥
Verse 8
आकर्णाद् भिन्नवक्त्रश्न शड्कुर्णो बिभीषण: । त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा संदश्य दशनच्छदम्,मुँहका फैलाव कानोंके समीपतक था, कान भी शंकुके समान लंबे और नुकीले थे। बड़ा भयानक था वह राक्षस। उसने भौंहें ऐसी टेढ़ी कर रखी थीं कि वहाँ तीन रेखाएँ उभड़ आयी थीं और वह दाँतोंसे ओठ चबा रहा था
आकर्णाद् भिन्नवक्त्रः शङ्कुकर्णो बिभीषणः । त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा संदश्य दशनच्छदम् ॥
Verse 9
भुज्जानमन्नं तं दृष्टवा भीमसेनं स राक्षस: । विवृत्य नयने क्रुद्ध इंदं वचनमत्रवीत्,भीमसेनको वह अन्न खाते देख राक्षसका क्रोध बहुत बढ़ गया और उसने आँखें तरेरकर कहा--
भुञ्जानमन्नं तं दृष्ट्वा भीमसेनं स राक्षसः । विवृत्य नयने क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥
Verse 10
को<यमन्नमिदं भुद्धतक्ते मदर्थमुपकल्पितम् । पश्यतो मम दुर्बुद्धिर्यियासुर्यमसादनम्,“यमलोकमें जानेकी इच्छा रखनेवाला यह कौन दुर्बुद्धि मनुष्य है, जो मेरी आँखोंके सामने मेरे ही लिये तैयार करके लाये हुए इस अन्नको स्वयं खा रहा है?”
वैशम्पायन उवाच— कोऽयमन्नमिदं बुद्धदत्ते मदर्थमुपकल्पितम् । पश्यतो मम दुर्बुद्धिर् यियासुर्यमसादनम् ॥
Verse 11
भीमसेनस्तत: श्रुत्वा प्रहसन्निव भारत । राक्षसं तमनादृत्य भुड्क्त एव पराड्मुख:,भारत! उसकी बात सुनकर भीमसेन मानो जोर-जोरसे हँसने लगे और उस राक्षसकी अवहेलना करते हुए मुँह फेरकर खाते ही रह गये
भीमसेनस्ततः श्रुत्वा प्रहसन्निव भारत । राक्षसं तमनादृत्य भुङ्क्त एव पराङ्मुखः ॥
Verse 12
रवं स भैरवं कृत्वा समुद्यम्य करावुभौ । अभ्यद्रवद् भीमसेनं जिघांसु: पुरुषादक:,अब तो वह नरभक्षी राक्षस भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे भयंकर गर्जना करता हुआ दोनों हाथ ऊपर उठाकर उनकी ओर दौड़ा
रवं स भैरवं कृत्वा समुद्यम्य करावुभौ । अभ्यद्रवद्भीमसेनं जिघांसुः पुरुषादकः ॥
Verse 13
तथापि परिभूयैन प्रेक्षमाणो वृकोदर: । राक्षसं भुझुक्त एवान्नं पाण्डव: परवीरहा,तो भी शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेन उस राक्षसकी ओर देखते हुए उसका तिरस्कार करके उस अन्नको खाते ही रहे। तब उसने अत्यन्त अमर्षमें भरकर कुन्तीनन्दन भीमसेनके पीछे खड़े हो अपने दोनों हाथोंसे उनकी पीठपर प्रहार किया
तथापि परिभूयैनं प्रेक्षमाणो वृकोदरः । राक्षसं भुङ्क्त एवाऽन्नं पाण्डवः परवीरहा ॥
Verse 14
अमर्षेण तु सम्पूर्ण: कुन्तीपुत्रं वृकोदरम् जघान पृष्ठे पाणिभ्यामुभाभ्यां पृष्ठत: स्थित:,तो भी शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेन उस राक्षसकी ओर देखते हुए उसका तिरस्कार करके उस अन्नको खाते ही रहे। तब उसने अत्यन्त अमर्षमें भरकर कुन्तीनन्दन भीमसेनके पीछे खड़े हो अपने दोनों हाथोंसे उनकी पीठपर प्रहार किया
अमर्षेण तु सम्पूर्णः कुन्तीपुत्रं वृकोदरम् । जघान पृष्ठे पाणिभ्यामुभाभ्यां पृष्ठतः स्थितः ॥
Verse 15
तथा बलवता भीम: पाणिशभ्यां भूशमाहतः । नैवावलोकयामास राक्षसं भुड्क्त एव सः,इस प्रकार बलवान राक्षसके दोनों हाथोंसे भयानक चोट खाकर भी भीमसेनने उसकी ओर देखातक नहीं, वे भोजन करनेमें ही संलग्न रहे
वैशम्पायन उवाच—तथा बलवता भीमः पाणिभ्यां भूशमाहतः । नैवावलोकयामास राक्षसं भुङ्क्त एव सः ॥
Verse 16
ततः स भूय: संक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षस: । ताडयिष्यंस्तदा भीम॑ पुनरभ्यद्रवद् बली,तब उस बलवान राक्षसने पुनः अत्यन्त कुपित हो एक वृक्ष उखाड़कर भीमसेनको मारनेके लिये फिर उनपर धावा किया
ततः स भूयः संक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षसः । ताडयिष्यंस्तदा भीमं पुनरभ्यद्रवद् बली ॥
Verse 17
ततो भीम: शनैर्भुक्त्वा तदन्नं पुरुषर्षभ: । वार्युपस्पृश्य संहृष्टस्तस्थी युधि महाबल:,तदनन्तर नरश्रेष्ठ महाबली भीमसेनने धीरे-धीरे वह सब अन्न खाकर, आचमन करके मुँह-हाथ धो लिये, फिर वे अत्यन्त प्रसन्न हो युद्धके लिये डट गये
ततो भीमः शनैर्भुक्त्वा तदन्नं पुरुषर्षभः । वार्युपस्पृश्य संहृष्टस्तस्थौ युधि महाबलः ॥
Verse 18
क्षिप्तं क्रुद्धेन त॑ वृक्ष॑ प्रतिजग्राह वीर्यवान् । सव्येन पाणिना भीम: प्रहसन्निव भारत,जनमेजय! कुपित राक्षसके द्वारा चलाये हुए उस वृक्षको पराक्रमी भीमसेनने बायें हाथसे हँसते हुए-से पकड़ लिया
क्षिप्तं क्रुद्धेन तं वृक्षं प्रतिजग्राह वीर्यवान् । सव्येन पाणिना भीमः प्रहसन्निव भारत ॥
Verse 19
ततः स पुनरुद्यम्य वृक्षान् बहुविधान् बली । प्राहिणोद् भीमसेनाय तस्मै भीमश्न पाण्डव:,तब उस बलवान् निशाचरने पुनः बहुत-से वृक्षोंको उखाड़ा और भीमसेनपर चला दिया। पाण्डुनन्दन भीमने भी उसपर अनेक वृक्षोंद्वारा प्रहार किया
ततः स पुनरुद्यम्य वृक्षान् बहुविधान् बली । प्राहिणोद् भीमसेनाय तस्मै भीमश्न पाण्डवः ॥
Verse 20
तद् वृक्षयुद्धम भवन्महीरुहविनाशनम् । घोररूपं महाराज नरराक्षसराजयो:,महाराज! नरराज तथा राक्षसराजका वह भयंकर वृक्षयुद्ध उस वनके समस्त वृक्षोंके विनाशका कारण बन गया
तद् वृक्षयुद्धं भवन्महीरुहविनाशनम् । घोररूपं महाराज नरराक्षसराजयोः ॥
Verse 21
नाम विश्राव्य तु बकः समभिद्रुत्य पाण्डवम् । भुजाभ्यां परिजग्राह भीमसेनं महाबलम्,तदनन्तर बकासुरने अपना नाम सुनाकर महाबली पाण्डुनन्दन भीमसेनकी ओर दौड़कर दोनों बाँहोंसे उन्हें पकड़ लिया
नाम विश्राव्य तु बकः समभिद्रुत्य पाण्डवम् । भुजाभ्यां परिजग्राह भीमसेनं महाबलम् ॥
Verse 22
भीमसेनो<डपि तद् रक्ष: परिरभ्य महाभुज: । विस्फुरन्तं महाबाहुं विचकर्ष बलादू बली,महाबाहु बलवान् भीमसेनने भी उस विशाल भुजाओंवाले राक्षसको दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया और बलपूर्वक उसे इधर-उधर खींचने लगे। उस समय बकासुर उनके बाहुपाशसे छूटनेके लिये छटपटा रहा था
भीमसेनोऽपि तद् रक्षः परिरभ्य महाभुजः । विस्फुरन्तं महाबाहुं विचकर्ष बलाद् बली ॥
Verse 23
स कृष्यमाणो भीमेन कर्षमाणश्न पाण्डवम् | समयुज्यत तीव्रेण क्लमेन पुरुषादक:,भीमसेन उस राक्षसको खींचते थे तथा राक्षस भीमसेनको खींच रहा था। इस खींचा- खींचीमें वह नरभक्षी राक्षस बहुत थक गया
स कृष्यमाणो भीमेन कर्षमाणश्च पाण्डवम् । समयुज्यत तीव्रेण क्लमेन पुरुषादकः ॥
Verse 24
तयोरवेंगेन महता पृथिवी समकम्पत । पादपांश्न महाकायांश्वूर्णयामासतुस्तदा,उन दोनोंके महान् वेगसे धरती जोरसे काँपने लगी। उन दोनोंने उस समय बड़े-बड़े वृक्षोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले
तयोरवेगेन महता पृथिवी समकम्पत । पादपांश्च महाकायान् चूर्णयामासतुस् तदा ॥
Verse 25
हीयमान तु तद् रक्ष: समीक्ष्य पुरुषादकम् । निष्पिष्य भूमौ जानुभ्यां समाजघ्ने वृकोदर:,उस नरभक्षी राक्षसको कमजोर पड़ते देख भीमसेन उसे पृथ्वीपर पटककर रगड़ने और दोनों घुटनोंसे मारने लगे
हीयमानं तु तद्रक्षः समीक्ष्य पुरुषादकम् । निष्पिष्य भूमौ जानुभ्यां समाजघ्ने वृकोदरः ॥
Verse 26
ततो<स्य जानुना पृष्ठठगवपीड्य बलादिव । बाहुना परिजग्राह दक्षिणेन शिरोधराम्,तदनन्तर उन्होंने अपने एक घुटनेसे बल-पूर्वक राक्षसकी पीठ दबाकर दाहिने हाथसे उसकी गर्दन पकड़ ली और बायें हाथसे कमरका लँगोट पकड़कर उस राक्षसको दुहरा मोड़ दिया। उस समय वह बड़ी भयानक आवाज में चीत्कार कर रहा था
ततोऽस्य जानुना पृष्ठं गाढमपीड्य बलादिव । बाहुना परिजग्राह दक्षिणेन शिरोधराम् ॥
Verse 27
सव्येन च कटीदेशे गृह वाससि पाण्डव: । तद् रक्षो द्विगुणं चक्रे रुवन्तं भैरवं रवम्,तदनन्तर उन्होंने अपने एक घुटनेसे बल-पूर्वक राक्षसकी पीठ दबाकर दाहिने हाथसे उसकी गर्दन पकड़ ली और बायें हाथसे कमरका लँगोट पकड़कर उस राक्षसको दुहरा मोड़ दिया। उस समय वह बड़ी भयानक आवाज में चीत्कार कर रहा था
सव्येन च कटीदेशे गृहीत्वा वाससि पाण्डवः । तद्रक्षो द्विगुणं चक्रे रुवन्तं भैरवं रवम् ॥
Verse 28
ततो<स्य रुधिरं वकत्रात् प्रादुरासीद् विशाम्पते | भज्यमानस्य भीमेन तस्य घोरस्य रक्षस:,राजन! भीमसेनके द्वारा उस घोर राक्षसकी जब कमर तोड़ी जा रही थी, उस समय उसके मुखसे (बहुत-सा) खून गिरा
ततोऽस्य रुधिरं वक्त्रात् प्रादुरासीद् विशाम्पते । भज्यमानस्य भीमेन तस्य घोरस्य रक्षसः ॥
Verse 162
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकभीमसेनयुद्धे द्विषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकभीमसेनयुद्धे द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥
The implicit dharma-tension is between personal absorption in pleasure and the king’s administrative duty: Saṃvaraṇa’s prolonged withdrawal correlates with societal distress, prompting corrective intervention.
Legitimate prosperity is depicted as dependent on disciplined authority: alliances should be sanctioned through proper counsel and rite, and rulership requires sustained presence and responsibility toward the realm.
No explicit phalaśruti formula appears here; the meta-function is genealogical and etiological—explaining Kuru’s origin and reinforcing the narrative logic that order (including rainfall) follows restored righteous governance.