अक्षहृदय-विद्या-प्रदानम्
Transmission of Akṣa-hṛdaya; Kali’s Exit and the Bibhītaka Refuge
यथा न नृपतिर्भीम: प्रतिपद्येत मे मतम् तथा त्वया प्रकर्तव्यं मम चेत् प्रियमिच्छसि,“माँ! पिताजीको यह बात कदापि मालूम न होनी चाहिये। मैं तुम्हारे ही सामने विप्रवर सुदेवको इस कार्यमें लगाऊँगी। तुम ऐसी चेष्टा करो, जिससे पिताजीको मेरा विचार ज्ञात न हो। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहती हो तो तुम्हें इसके लिये सचेष्ट रहना होगा
«Если хочешь сделать мне угодное, поступи так, чтобы царь, мой отец, не распознал моего намерения.»
बृहदश्च उवाच