Sarasvatī–Tārkṣya Saṃvāda: Agnihotra-vidhi, Dāna-phala, and Mokṣa-prasaṅga (सरस्वती–तार्क्ष्यसंवादः)
कुतो वा सुखदु:खेषु नृणां ब्रह्म॒विदां वर । इह वा कृतमन्वेति परदेहेडथ वा पुन:,“मैं सोचता हूँ, शुभ और अशुभ कर्म करनेवाला जो पुरुष है, वह अपने उन कर्मोंका फल कैसे भोगता है तथा ईश्वर उन कर्मफलोंका रचयिता कैसे होता है? ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर! सुख और दु:खकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोमें मनुष्योंकी प्रवृत्ति कैसे होती है? मनुष्यका किया कर्म इस लोकमें ही उसका अनुसरण करता है अथवा पारलौकिक शरीरमें भी
kuto vā sukhaduḥkheṣu nṛṇāṃ brahmavidāṃ vara | iha vā kṛtam anv eti paradehe ’tha vā punaḥ ||
Вайшампаяна сказал: «О лучший из ведающих Брахмана, из какого источника возникают для людей радость и страдание? Следует ли деяние, совершённое здесь, за человеком лишь в этом мире, или преследует его вновь и в ином теле?»
वैशम्पायन उवाच