ययातिदौहित्रपुण्यसमुच्चयः | Yayāti and the Grandsons’ Consolidation of Merit
अतीव मदमसत्तस्त्वं न कंचिन्नावमन्यसे । मानेन भ्रष्ट: स्वर्गस्ते ना्हस्त्वं पार्थिवात्मज,*राजपुत्र! तुम अत्यन्त मदमत्त हो और कोई भी ऐसा महान पुरुष यहाँ नहीं है, जिसका तुम तिरस्कार न करते हो। इस मानके कारण ही तुम अपने स्थानसे गिर रहे हो। अब तुम यहाँ रहनेके योग्य नहीं हो
«Ты чрезмерно опьянён гордыней и никого не почитаешь. Из‑за этого самомнения ты лишаешься небес. Теперь ты недостоин пребывать здесь, царевич!»
नारद उवाच