Saṃhāra-krama (The Sequence of Cosmic Dissolution) — Yājñavalkya’s Discourse
तद्वदात्मसमाधानं युक्त्वा योगेन तत्त्ववित् । दुर्गमें स्थानमाप्नोति हित्वा देहमिमं नूप,कुन्तीकुमार! नृपश्रेष्ठ! जैसे सावधान नाविक समुद्रमें पड़ी हुई नौकाको शीघ्र ही किनारेपर लगा देता है, उसी प्रकार योगके अनुसार तत्त्वको जाननेवाला पुरुष समाधिके द्वारा मनको परमात्मामें लगाकर इस देहका त्याग करनेके अनन्तर दुर्गम स्थान (परमधाम) को प्राप्त होता है
tadvad ātma-samādhānaṁ yuktvā yogena tattvavit | durgame sthānam āpnoti hitvā deham imaṁ nūpa, kuntī-kumāra! nṛpa-śreṣṭha! |
Бхишма сказал: «Так же и знающий истину, сопрягши себя с устойчивым погружением посредством йоги, достигает труднодостижимого состояния. Оставив это тело, о царь,—о сын Кунти, лучший из правителей,—он приходит в высшую обитель, почти недоступную».
भीष्म उवाच