मनुरुवाच — इन्द्रिय-मनः-ज्ञान-क्रमः
Manu on the hierarchy of senses, mind, and knowledge
जापकानां फलावाप्तिं श्रोतुमिच्छामि भारत । किंफलं जपतामुक्तं क्व वा तिष्ठन्ति जापका:,भरतनन्दन! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि जप करनेवालोंको फलकी प्राप्ति कैसे होती है? जापकोंके जपका फल क्या बताया गया है अथवा जप करनेवाले पुरुष किन लोकोंमें स्थान पाते हैं? भीष्मजीने कहा--राजन्! तुम सावधान होकर जापकोंकी गतिका वर्णन सुनो। प्रभो! पुरुषप्रवर! अब मैं यह बता रहा हूँ कि वे किस तरह नाना प्रकारके नरकोंमें पड़ते हैं" २ ।। यथोक्तपूर्व पूर्व यो नानुतिषछतति जापक: । एकदेशक्रियश्चात्र निरयं स च गच्छति जो जापक जैसा पहले बताया गया है, उसी तरह नियमोंका ठीक-ठीक पालन नहीं करता, एकदेशका ही अनुष्ठान करता है अर्थात् किसी एक ही नियमका पालन करता है, वह नरकमें पड़ता है
yudhiṣṭhira uvāca | jāpākānāṃ phalāvāptiṃ śrotum icchāmi bhārata | kiṃphalaṃ japatām uktaṃ kva vā tiṣṭhanti jāpakāḥ || bhīṣma uvāca | rājan sāvadhānaḥ śṛṇu jāpākānāṃ gatiṃ prabho | yathoktapūrvaṃ yaḥ pūrvaṃ na anutiṣṭhati jāpakaḥ | ekadeśakriyaś cātra nirayaṃ sa ca gacchati ||
Юдхиштхира сказал: «О Бхарата, я желаю услышать, как совершающие джапу обретают её плод. Какой плод провозглашён для повторяющих священную формулу, и в каких мирах пребывают практикующие джапу?» Бхишма ответил: «О царь, слушай внимательно, пока я описываю участь практикующих джапу. Тот, кого называют джапакой, но не соблюдает предписанную прежде дисциплину, исполняя лишь частичное обетование, — идёт в ад.»
युधिछिर उवाच