चतुर्थमस्यानुचरं ख्यातं कुमुदमालिनम् । उस समय भगवान् ब्रह्माने संतुष्ट होकर कार्तिकेयको वायुके समान वेगशाली, इच्छानुसार शक्तिधारी, बलवान् और सिद्ध चार महान् अनुचर प्रदान किये, जिनमें पहला नन्दिसेन, दूसरा लोहिताक्ष, तीसरा परम प्रिय घंटाकर्ण और उनका चौथा अनुचर कुमुदमालीके नामसे विख्यात था ।। तत्र स्थाणुर्महातेजा महापारिषदं प्रभु:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान् रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए राजेन्द्र! फिर वहाँ महातेजस्वी भगवान् शंकरने स्कन्दको एक महान् असुर समर्पित किया, जो सैकड़ों मायाओंको धारण करनेवाला, इच्छानुसार बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ था
caturtham asyānucaraṃ khyātaṃ kumudamālinam |
Вайшампаяна сказал: «Его четвёртым спутником был прославленный Кумудамалин». В этом эпизоде боги — довольные и благосклонные — даруют Карттикее могучих соратников, подчёркивая, что божественная сила — не только личная мощь, но и упорядоченная поддержка космических сил и верное служение. Повествование утверждает: власть праведна тогда, когда она даруется ради защиты мира и обуздания разрушительных существ.
वैशम्पायन उवाच
Power is shown as ethically grounded when it is conferred for dharmic purposes—protection, restraint of chaos, and service to cosmic order—rather than for personal domination.
The text identifies Kumudamālin as the fourth attendant of Kārttikeya, within a broader scene where gods and great beings gather around Skanda and confer formidable allies and powers upon him.