Aśvatthāmā’s Stuti of Rudra and Śiva’s Empowerment (सौप्तिकपर्व, अध्याय ७)
तथैवाशिरसो राजन्नृक्षवक्त्राश्च॒ भारत । प्रदीप्तनेत्रजिद्वाश्न॒ ज्वालावर्णास्तथैव च,किन्हींके हाथोंमें ही कान थे। कितने ही हजार-हजार नेत्र और लंबे पेटवाले थे। कितनोंके शरीर मांसरहित, हड्ियोंके ढाँचे मात्र थे। भरतनन्दन! कोई कौओंके समान मुखवाले थे तो कोई बाजके समान। राजन! किन्हीं-किन्हींके तो सिर ही नहीं थे। भारत! कोई-कोई भालूके समान मुखवाले थे। उन सबके नेत्र और जिह्लाएँ तेजसे प्रज्वलित हो रही थीं। अंगोंकी कान्ति आगकी ज्वालाके समान जान पड़ती थी
tathaivāśiraso rājann ṛkṣavaktrāś ca bhārata | pradīptanetrājihvāś ca jvālāvarṇās tathaiva ca ||
Санджая сказал: «Так же, о царь — о Бхарата, — явились существа без голов, а иные — с лицами, подобными медвежьим. Их глаза и языки пылали свирепым сиянием, а цвет их тел казался самим цветом пламени».
संजय उवाच