अध्याय १ — न्यग्रोधवनोपवेशनम् तथा द्रौणिनिश्चयः
Night at the Banyan and Drauṇi’s Resolve
संजय! पहले समस्त भूमण्डलपर मेरी आज्ञा चलती थी और मैं सबका शिरमौर था; ऐसा होकर अब मैं दूसरोंका दास बनकर कैसे रहूँगा। मैंने स्वयं ही अपने जीवनकी अन्तिम अवस्थाको दुःखमय बना दिया है! ।। कथं भीमस्य वाक्यानि श्रोतुं शक्ष्यामि संजय । येन पुत्रशतं पूर्णमेकेन निहतं मम,ओह! जिसने अकेले ही मेरे पूरे-के-पूरे सौ पुत्रोंका वध कर डाला, उस भीमसेनकी बातोंको मैं कैसे सुन सकूँगा?
kathaṁ bhīmasya vākyāni śrotuṁ śakṣyāmi sañjaya | yena putraśataṁ pūrṇam ekena nihataṁ mama ||
О Санджая! Прежде моя воля владычествовала над всем земным кругом, и я был венцом над всеми; как же мне теперь жить рабом у других? Собственными руками я сделал последнюю пору своей жизни исполненной скорби. И как, о Санджая, смогу я слушать речи Бхимасены — того, кто один перебил всех моих ста сыновей?
संजय उवाच