ययातिः शर्मिष्ठायाः ऋतुप्रार्थनां धर्मसंवादं च शृणोति
Yayāti and Śarmiṣṭhā: request in ṛtu and discourse on truth and dharma
सौहारदे चानुरागे च वेत्थ मे भक्तिमुत्तमाम् । न मामहसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसम्,सौहार्द और अनुरागके अवसरपर मेरी उत्तम भक्तिका परिचय आपको मिल चुका है। आप धर्मके ज्ञाता हैं। मैं आपके प्रति भक्ति रखनेवाली निरपराध अबला हूँ। आपको मेरा त्याग करना उचित नहीं है
«И в дружбе, и в любви ты узнал мою высшую преданность. О знающий дхарму, тебе не следует оставлять меня — преданную и безвинную.»
कच उवाच