Akṣara–Kṣara Viveka: Vasiṣṭha–Karāla-Janaka Saṃvāda (अक्षर-क्षर विवेकः)
सतोये<न्यत् तु यत् तोयं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते । वृद्धे वृद्धिमवाप्रोति सलिले सलिलं यथा,राजन्! उसी जलयुक्त पक्के घड़ेमें यदि दूसरा जल डाला जाय तो पात्रमें रखा हुआ पहलेका जल और नया डाला हुआ जल-दोनों मिलकर बढ़ जाते हैं और इस प्रकार वह घड़ा अधिक जलसे सम्पन्न हो जाता है। उसी तरह यहाँ विवेकपूर्वक किये हुए जो पुण्य कर्म संचित हैं, उन्हींके समान जो नये पुण्य कर्म किये जाते हैं--वे दोनों मिलकर अधिक पुण्यतम कर्म हो जाते हैं (और उनके द्वारा वह पुरुष महान पुण्यात्मा हो जाता है)
satoye'nyat tu yat toyaṃ tasminneva prasicyate | vṛddhe vṛddhim avāpnoti salile salilaṃ yathā rājann |
Disse Parāśara: “Ó rei, assim como, quando se derrama mais água num recipiente que já contém água, a água de dentro aumenta ao unir-se à que foi acrescentada, do mesmo modo os méritos acumulados anteriormente crescem quando se praticam novas ações meritórias no mesmo espírito. A virtude antiga e a virtude recém-praticada unem-se e, por seu aumento conjunto, a pessoa torna-se cada vez mais rica em mérito.”
पराशर उवाच
Merit grows cumulatively: earlier virtuous actions are not replaced by later ones; rather, new good deeds merge with stored merit and increase it, like water added to water.
Parāśara addresses a king and uses a simple physical analogy—pouring water into an already water-filled vessel—to explain how continued righteous conduct amplifies one’s accumulated virtue.