Ayodhya KandaPrakarana 821 Verses

Prakarana 8

यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ का द्वार है: राजसुख के शिखर पर खड़े होकर भी राम-धर्म के लिए स्वेच्छा से वनगमन स्वीकारते हैं। साधक के भीतर यही रूपांतरण घटता है—‘मेरा अधिकार’ से ‘ईश्वर-आज्ञा’ की ओर, तथा गृह-आश्रय से नाम-आश्रय की ओर। अयोध्या यहाँ ‘अहं-गृह’ का प्रतीक भी है; राम का निष्क्रमण वैराग्य नहीं, धर्म-निष्ठा और लोक-कल्याण-हित करुणा है।

ਅਯੋਧਿਆ ਕਾਂਡ ਦਾ ਰਸ-ਵਿਨ੍ਯਾਸ ਕਰੁਣਾ ਅਤੇ ਸ਼ਾਂਤ ਦਾ ਸੰਯੋਗ ਹੈ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਦਾਸ੍ਯ-ਭਗਤੀ ਦੀ ਧਾਰ ਸਭ ਤੋਂ ਤੀਵ੍ਰ ਵਹਿੰਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਖੰਡ (ਦੋਹਾ 70–79) ਵਿੱਚ ਲਕ੍ਸ਼ਮਣ ਦਾ ਪ੍ਰੇਮ-ਵਿਕਲ ਆਵੇਗ, ਰਾਮ ਦੀ ਨੀਤੀ-ਨਿਸ਼ਠਾ, ਸੁਮਿਤ੍ਰਾ ਦਾ ਵੈਰਾਗ੍ਯ-ਦੀਪਕ ਉਪਦੇਸ਼, ਅਤੇ ਕੈਕਈ ਦਾ ਕਠੋਰ ਹਸਤਕ੍ਸ਼ੇਪ—ਇਹ ਸਭ ਮਿਲ ਕੇ ‘ਧਰਮ-ਸੰਕਟ’ ਨੂੰ ‘ਧਰਮ-ਸਥਿਰਤਾ’ ਵਿੱਚ ਰੂਪਾਂਤਰਿਤ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਤੁਲਸੀ ਇੱਥੇ ਗ੍ਰਿਹਸਥ-ਵ੍ਯਵਸਥਾ ਦਾ ਨਿਸ਼ੇਧ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ; ਉਹ ਉਸ ਨੂੰ ਰਾਮ-ਆਸ਼੍ਰਿਤ ਬਣਾ ਕੇ ਸ਼ੁੱਧ ਕਰਦੇ ਹਨ—‘ਅਵਧ ਤਹਾਂ ਜਹਾਂ ਰਾਮ ਨਿਵਾਸੂ’ ਵਰਗੇ ਵਾਕ ਨਾਲ ਅਯੋਧਿਆ ਦਾ ਆਧ੍ਯਾਤਮੀਕਰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਰਚਨਾਤਮਕ ਸੰਰਚਨਾ ਵਿੱਚ ਚੌਪਾਈ ਦੀ ਪ੍ਰਵਾਹਸ਼ੀਲ ਕਥਾ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਦੋਹਾ/ਸੋਰਠਾ ਦਾ ‘ਸਥੈਰ੍ਯ-ਬਿੰਦੂ’ ਆਉਂਦਾ ਹੈ—ਮਾਨੋ ਸਾਧਕ ਦੀ ਚੰਚਲ ਵ੍ਰਿੱਤੀ ਨੂੰ ਨੀਤੀ-ਸਿਧਾਂਤ ਵਿੱਚ ਥਿਰ ਕਰ ਦਿੰਦਾ ਹੋਵੇ। ਇਸ ਕਾਂਡ-ਸਤ੍ਹਾ ਉੱਤੇ ਮਾਨਸ ਦੀ ਥਿਓਲੋਜੀ ਇਹ ਦਿਖਾਂਦੀ ਹੈ ਕਿ ਸਗੁਣ ਰਾਮ (ਰਾਜਕੁਮਾਰ) ਹੀ ਨਿਰਗੁਣ-ਧਰਮ ਦੇ ਅਧਿਸ਼ਠਾਤਾ ਹਨ—ਮਰਯਾਦਾ ਦੇ ਅੰਦਰ ਹੀ ਮੁਕਤੀ ਦਾ ਮਾਰਗ ਖੁਲਦਾ ਹੈ।

Verses

Verse 143 (चौपाई)

समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।। कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।। कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े।। सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा।। मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा।। राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें।। बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।। तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू।।

Verse 144 (दोहा/सोरठा)

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।

Verse 145 (चौपाई)

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।। भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।। मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा।। गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।। रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू।। जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।। रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।। सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें।।

Verse 146 (दोहा/सोरठा)

उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ। नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।

Verse 147 (चौपाई)

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।। नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी।। मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला।। गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू।। जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।। मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।। धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।। मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।

Verse 148 (दोहा/सोरठा)

करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत। समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।

Verse 149 (चौपाई)

मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।। मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी।। हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए। जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।। पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी।। गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा।। लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू।। मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही।।

Verse 150 (दोहा/सोरठा)

समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ। नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ।।73।।

Verse 151 (चौपाई)

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।। तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।। अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।। जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं।। गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।। रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै।। पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें।। अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।।

Verse 152 (दोहा/सोरठा)

भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ। जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ।।74।।

Verse 153 (चौपाई)

पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।। नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।। तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।। सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।। राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।। सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।। तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू।। जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू।।

Verse 154 (छंद)

उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं। पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।। तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई। रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।

Verse 155 (दोहा/सोरठा)

मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ। बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।

Verse 156 (चौपाई)

गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।। बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए।। कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी।। तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने।। कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं।। भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।। सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।। सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी।।

Verse 157 (दोहा/सोरठा)

सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ। बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।76।।

Verse 158 (चौपाई)

सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।। नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।। पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।। तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।। सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ।। सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।। सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी।। करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।।

Verse 159 (दोहा/सोरठा)

औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु। अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।

Verse 160 (चौपाई)

रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।। लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने।। तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।। कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।। सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा।। औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।। सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।। तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।।

Verse 161 (दोहा/सोरठा)

-सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि। सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि।।78।।

Verse 162 (चौपाई)

सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।। मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।। नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।। सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।। अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा।। भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।। लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।। रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।

Verse 163 (दोहा/सोरठा)

सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत। बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत।।79।।

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