Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
समागमश्न सखिभिर्महांश्षैव धनागम: । पुत्रेण च परिष्वज्भ: संनिपातश्न मैथुने,भारत! मित्रोंसे समागम, अधिक धनकी प्राप्ति, पुत्रका आलिंगन, मैथुनमें संलग्न होना, समयपर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्गके लोगोंमें उन्नति, अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति और जनसमाजमें सम्मान--ये आठ हर्षके सार दिखायी देते हैं और ये ही अपने लौकिक सुखके भी साधन होते हैं
samāgamaś ca sakhabhir mahāṁś caiva dhanāgamaḥ | putreṇa ca pariṣvaṅgaḥ sannipātaś ca maithune bhārata |
ਮਿੱਤਰਾਂ ਨਾਲ ਮਿਲਾਪ, ਬਹੁਤ ਧਨ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ, ਪੁੱਤਰ ਦਾ ਆਲਿੰਗਨ, ਅਤੇ ਮੈਥੁਨ-ਸੰਯੋਗ—ਇਹ (ਹਰਖ ਦਾ ਸਾਰ) ਹਨ।
विदुर उवाच