Vṛtra’s Cosmic Threat, Viṣṇu’s Upāya, and the Conditional Vulnerability
Udyoga-parva 10
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल ६५ “लोक हैं।] ऑपन-आक्ाा बा हर: दशमो< ध्याय: इन्द्रसहित देवताओंका भगवान् विष्णुकी शरणमें जाना और इन्द्रका उनके अज्ञानुसार वृत्रासुरसे संधि करके के अवसर पाकर उसे मारना एवं ब्रह्महत्याके भयसे जलमें छिपना इन्द्र उवाच सर्व व्याप्तमिदं देवा वृत्रेण जगदव्ययम् । न हास्य सदृशं किंचित् प्रतिघाताय यद् भवेत्,इन्द्र बोले--देवताओ! वृत्रासुरने इस सम्पूर्ण जगत्को आक्रान्त कर लिया है। इसके योग्य कोई ऐसा अस्त्र-शस्त्र नहीं है, जो इसका विनाश कर सके
indra uvāca | sarva-vyāptam idaṃ devā vṛtreṇa jagad avyayam | na hāsya sadṛśaṃ kiṃcit pratighātāya yad bhavet ||
ਇੰਦ੍ਰ ਨੇ ਕਿਹਾ—ਹੇ ਦੇਵੋ, ਵ੍ਰਿਤ੍ਰ ਨੇ ਇਸ ਸਾਰੇ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਜਗਤ ਨੂੰ ਆਕ੍ਰਾਂਤ ਕਰ ਲਿਆ ਹੈ। ਉਸ ਦੇ ਸਮਾਨ ਕੋਈ ਨਹੀਂ; ਕੋਈ ਐਸਾ ਅਸਤ੍ਰ ਜਾਂ ਪ੍ਰਤਿਘਾਤ ਨਹੀਂ ਜੋ ਉਸ ਨੂੰ ਮਾਰ ਗਿਰਾ ਸਕੇ।
इन्द्र उवाच