Adhyaya 237
Shanti ParvaAdhyaya 23726 Verses

Adhyaya 237

भिक्षुलक्षणम्—एकचर्याः, अहिंसा, कैवल्याश्रमः (Marks of the Mendicant: Solitary Wandering, Non-Injury, and the Kaivalya-Discipline)

Upa-parva: Mokṣadharma Parva (Liberation-Discipline Subsection)

This adhyāya is cast as an instructional exchange in which Śuka’s prompt about correct conduct in the vānaprastha setting leads Vyāsa to describe the next, more interiorized stage of discipline oriented to the “supreme station.” The chapter outlines the parivrājaka ideal: solitary movement (ekacaryā), absence of household fire and fixed dwelling, reliance on alms, and a controlled, minimal diet. External markers—begging bowl, sleeping at tree-roots, poor clothing, and non-dependence—are paired with internal markers: emotional non-reactivity (neither anger nor elation), neutrality toward praise and blame, and careful speech that avoids harm, especially toward brāhmaṇas. A central doctrinal pivot is ahiṃsā: it is presented as the comprehensive ground in which other dharmic aims are ‘contained,’ producing mutual fearlessness between the practitioner and beings. The chapter further employs metaphors (e.g., other footprints subsumed by the elephant’s) to portray ahiṃsā as an overriding ethical category. Concluding verses elevate the renunciant as one who is unattached like space, free from enmity, and steady in self-offering (internalized ritual imagery), thereby linking conduct, inner sacrifice, and liberation-oriented knowledge.

Chapter Arc: एकान्त, समतल और पवित्र स्थान में आसन—ध्यानयोग का बाह्य विधान नहीं, भीतर उतरने का द्वार बनकर खुलता है; इसी से शुक का प्रश्न जन्म-मृत्यु के पार ले जाने वाले ‘ज्ञान’ पर टिक जाता है। → शुक पूछते हैं—वह ज्ञान/विद्या क्या है जो द्वैत (प्रवृत्ति-निवृत्ति, जन्म-मृत्यु, कर्ता-कर्म) से पार कर दे? व्यास प्रतिवाद करते हैं कि ‘स्वभाव’ को ही जगत् का कारण मानना अपूर्ण है; जड़ स्वभाव अपने-आप बुद्धि, व्यवस्था और प्रयोजन-युक्त कर्मों की रचना नहीं कर सकता। → व्यास का निर्णायक तर्क: खेती, संग्रह, यान-आसन, गृह-निर्माण जैसे सुव्यवस्थित कर्म ‘प्रज्ञावान चेतन’ के बिना नहीं घटते—अतः केवल जड़-स्वभाव को कारण मानने वाले ‘तृण-इषीका’ (तिनका-सी) शुद्धि पाकर भी सार नहीं पाते; कारण-तत्त्व चेतन/पुरुष की ओर संकेत करता है। → व्यास ज्ञान की कसौटी बताते हैं: जो भीतर-बाहर व्याप्त अधियज्ञ (परमात्मा) और अधिदैव (पुरुष) का साक्षात्कार कर लेते हैं, वही वास्तव में ‘देव’ और ‘द्विज’ हैं; वे जन्म, मृत्यु और कर्म की सीमा को लाँघकर चतुर्विध भूत-समुदाय के स्वयम्भू ईश्वर को जान लेते हैं। → शुक के प्रश्न का द्वार खुला रह जाता है—इस साक्षात्कार की साधना-प्रक्रिया और प्रवृत्ति-निवृत्ति का सूक्ष्म समन्वय आगे कैसे प्रतिपादित होगा?

Shlokas

Verse 1

#दघ>2८5-> (9) बीज - ध्यानयोगके साधकको ऐसे स्थानपर आसन लगाना चाहिये, जो समतल और पवित्र हो। निर्जन वन, गुफा या ऐसा ही कोई एकान्त स्थान ही ध्यानके लिये उपयोगी होता है। ऐसे स्थानपर आसन लगानेको देशयोग कहते हैं। आहार-विहार, चेष्टा, सोना और जागना--ये सब परिमित और नियमानुकूल होने चाहिये। यही कर्मनामक योग है। परमात्मा एवं उसकी प्राप्तिके साधनोंमें तीव्र अनुराग रखना अनुरागयोग कहलाता है। केवल आवश्यक सामग्रीको ही रखना अर्थयोग है। ध्यानोपयोगी आसनसे बैठना उपाययोग है। संसारके विषयों और सगे-सम्बन्धियोंसे आसक्ति तथा ममता हटा लेनेको अपाययोग कहते हैं। गुरु और वेदशास्त्रके वचनोंपर विश्वास रखनेका नाम निश्चययोग है। चक्षुको नासिकाके अग्रभागपर स्थिर करना चक्षुर्योग है। शुद्ध और सात्त्विक भोजनका नाम है आहारयोग। विषयोंकी ओर होनेवाली मन- इन्द्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्तिको रोकना संहारयोग कहलाता है। मनको संकल्प-विकल्पसे रहित करके एकाग्र करना मनोयोग है। जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि होनेके समय महान्‌ दुःख और दोषोंका वैराग्यपूर्वक दर्शन करना दर्शनयोग है। जिसे योगके द्वारा सिद्धि प्राप्त करनी हो, उसे इन बारह योगोंका अवश्य अवलम्बन करना चाहिये। > पातज्जलयोगदर्शनमें “देशबन्धश्षित्तस्य धारणा” अर्थात्‌ एकदेशमें चित्तको एकाग्र करना धारणा बतलाया गया है। साधक सर्वप्रथम पृथ्वीतत्त्वमें चित्तको लगावे। इस धारणासे उसका पृथ्वीतत्त्वपर अधिकार हो जाता है। फिर पृथ्वीतत्त्वको जलतत्त्वमें विलीन करके जलतत्त्वकी धारणा करे। इससे साधक जलतत्त्वका ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता है। फिर जलतत्त्वको अग्नितत्त्वमें विलीन करके अग्नितत्त्वकी धारणा करे। इससे अग्नितत्त्वपर अधिकार हो जाता है। तदनन्तर अग्निको वायुमें विलीन करके चित्तको वायुतत्त्वमें एकाग्र करे। इससे साधक वायुतत्त्वपर प्रभुत्व प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार क्रमश: वायुको आकाशमें और आकाशको मनमें तथा मनको बुद्धिमें लय करके उस-उस तत्त्वकी धारणा करे। इस प्रकार धारणाके ये सात स्तर हैं। अन्तमें बुद्धिको अव्यक्त ब्रह्ममें विलीन कर देना चाहिये। - सांख्य-कारिकामें बतलाया है-- मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतयः सप्त | षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुष: ।। (सां० का० ३) मूल प्रकृति--अव्याकृत माया, महत्तत्त्व आदि प्रकृतिके सात विकार--महत्तत्त्व, अहंकार और पज्चतम्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध), सोलह विकार--पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्‌ू, हाथ, पैर, गुदा और शिक्ष) तथा मन और पजञ्चमहाभूत (आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी) एवं पुरुष, जो न प्रकृति है और न प्रकृतिका विकार ही--इस प्रकार सांख्यके अनुसार ये पचीस तत्त्व हैं। पातञ्जलयोगदर्शनमें इनका इस प्रकार उल्लेख मिलता है-- विशेषाविशेषलिंगमात्रालिंगानि गुणपर्वाणि | (योग० साधनपाद १९) “विशेष--पञ्चमहाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और मन, अविशेष-- पञ्चतन्मात्रा और अहंकार, लिंगमात्र--महत्तत्त्व, अलिंग--मूलप्रकृति; इस प्रकार ये चौबीस तत्त्व एवं पचीसवाँ द्रष्टा (पुरुष) है। सप्तत्रिशदधिकद्धिशततमो< ध्याय: सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठठाके तारतम्यका वर्णन व्यास उवाच अथ ज्ञानप्लवं धीरो गृहीत्वा शान्तिमात्मन: । उन्मज्जंश्व निमज्जंश्व ज्ञानमेवाभिसंश्रयेत्‌,व्यासजी कहते हैं--वत्स! धीर पुरुषको चाहिये कि वह विवेकरूप नौकाका अवलम्बन लेकर भव-सागरमें डूबता-उतराता हुआ अर्थात्‌ प्रत्येक परिस्थितिमें अपनी परम शान्तिके लिये वास्तविक ज्ञानके आश्रित हो जाय

ਵਿਆਸ ਨੇ ਕਿਹਾ—ਤਦ ਧੀਰ ਪੁਰਖ ਆਪਣੀ ਆਤਮ-ਸ਼ਾਂਤੀ ਲਈ ਗਿਆਨ-ਰੂਪੀ ਬੇੜੀ ਨੂੰ ਫੜ ਕੇ, ਸੰਸਾਰ-ਸਾਗਰ ਵਿੱਚ ਕਦੇ ਉੱਪਰ ਚੜ੍ਹਦਾ ਕਦੇ ਡੁੱਬਦਾ ਹੋਇਆ ਵੀ, ਕੇਵਲ ਗਿਆਨ ਦਾ ਹੀ ਆਸਰਾ ਲਵੇ।

Verse 2

शुक उवाच कि तज्ज्ञानमथो विद्या यथा निस्तरते द्वयम्‌ प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तिरेति वा वद,शुकदेवजीने पूछा--पिताजी! जिसके द्वारा मनुष्य जन्म और मृत्यु दोनोंके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है, वह ज्ञान अथवा विद्या क्‍या है? वह प्रवृत्तिरूप धर्म है या निवृत्तिरूप? यह मुझे बताइये

ਸ਼ੁਕ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਪਿਤਾਜੀ! ਉਹ ਕਿਹੜਾ ਗਿਆਨ ਜਾਂ ਵਿਦਿਆ ਹੈ ਜਿਸ ਨਾਲ ਮਨੁੱਖ ਜਨਮ ਅਤੇ ਮੌਤ ਦੇ ਦੋਹਰੇ ਬੰਧਨ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਂਦਾ ਹੈ? ਦੱਸੋ—ਕੀ ਉਹ ਪ੍ਰਵ੍ਰਿੱਤੀ-ਲੱਛਣ ਧਰਮ ਹੈ ਜਾਂ ਨਿਵ੍ਰਿੱਤੀ (ਵਿਰਕਤੀ/ਤਿਆਗ) ਦਾ ਮਾਰਗ?

Verse 3

व्यास उवाच यस्तु पश्यन्‌ स्वभावेन विनाभावमचेतन: । पुष्यते च पुनः सर्वान्‌ प्रज्ञया मुक्तहेतुकान्‌,व्यासजीने कहा--जो यह समझता है कि यह जगत्‌ स्वभावसे ही उत्पन्न है, इसका कोई चेतन मूल कारण नहीं है, वह अज्ञानी मनुष्य व्यर्थ तर्कयुक्त बुद्धिद्वारा हेतुरहित वचनोंका बारंबार पोषण करता रहता है

ਵਿਆਸ ਨੇ ਕਿਹਾ—ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਜਗਤ ਨੂੰ ਵੇਖ ਕੇ ਇਹ ਨਤੀਜਾ ਕੱਢ ਲੈਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਸਭ ਕੁਝ ਕੇਵਲ ਸੁਭਾਵ ਤੋਂ ਹੀ ਉਤਪੰਨ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਕੋਈ ਚੇਤਨ ਤੱਤ ਨਹੀਂ—ਉਹ ਅਵਿਵੇਕੀ ਹੈ; ਉਹ ਆਪਣੀ ਤਰਕ-ਚਤੁਰ ਬੁੱਧੀ ਨਾਲ ਵਾਰ ਵਾਰ ਕਾਰਣ-ਰਹਿਤ ਦਾਵਿਆਂ ਨੂੰ ਹੀ ਪਾਲਦਾ-ਪੋਸਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ।

Verse 4

येषां चैकान्तभावेन स्वभावात्‌ कारणं मतम्‌ | पूत्वा तृणमिषीकां वा ते लभन्ते न किंचन,जिनकी यह मान्यता है कि निश्चित रूपसे वस्तुगत स्वभाव ही जगत्‌का कारण है-- स्वभावसे भिन्न अन्य कोई कारण नहीं है, (किंतु इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध न होनेमात्र हेतुसे उनका यह मानना कि ईश्वर-जैसा कोई जगत्‌का कारण है ही नहीं, युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि) मूँजके भीतर स्थित दिखायी न देनेवाली सींक क्या मूँजको चीर डालनेपर उन्हें उपलब्ध नहीं होती? अपितु अवश्य होती है (उसी प्रकार समस्त जगत्‌में व्याप्त परमात्मा यद्यपि इन्द्रियोंद्वारा दिखायी नहीं देता तो भी उसकी उपलब्धि दिव्य-ज्ञानके द्वारा अवश्य होती है)

ਵਿਆਸ ਨੇ ਕਿਹਾ—ਜੋ ਲੋਕ ਇਕਾਂਤ ਹਠ ਨਾਲ ਇਹ ਮੰਨਦੇ ਹਨ ਕਿ ‘ਸੁਭਾਵ ਹੀ ਕਾਰਣ ਹੈ; ਸੁਭਾਵ ਤੋਂ ਪਰੇ ਹੋਰ ਕੋਈ ਕਾਰਣ ਨਹੀਂ’, ਉਹ ਕੇਵਲ ਇਸ ਲਈ ਕਿ ਉਹ ਇੰਦ੍ਰੀਆਂ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਦਿੱਸਦਾ, ਪ੍ਰਭੂ ਵਰਗੇ ਉੱਚ ਕਾਰਣ ਦਾ ਇਨਕਾਰ ਕਰਦੇ ਹਨ—ਇਹ ਯੁਕਤ ਨਹੀਂ। ਜਿਵੇਂ ਮੁੰਜ ਘਾਹ ਨੂੰ ਚੀਰਣ ਨਾਲ ਅੰਦਰ ਦੀ ਬਰੀਕ ਰੇਸ਼ਾ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਮਿਲ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਤਿਵੇਂ ਸਾਰੇ ਜਗਤ ਵਿੱਚ ਵਿਆਪਕ ਪਰਮਾਤਮਾ ਇੰਦ੍ਰੀਆਂ ਨੂੰ ਨਾ ਦਿੱਸੇ ਤਾਂ ਵੀ ਦਿਵ੍ਯ ਗਿਆਨ ਨਾਲ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਜਾਣਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

Verse 5

ये चैनं॑ पक्षमाश्रित्य निवर्तन्त्यल्पमेधस: । स्वभावं कारणं ज्ञात्वा न श्रेय: प्राप्तुवन्ति ते,जो मन्दबुद्धि मानव इस नास्तिक मतका अवलम्बन करके स्वभावहीको कारण जानकर परमेश्वरकी उपासनासे निवृत्त हो जाते हैं, वे कल्याणके भागी नहीं होते

ਵਿਆਸ ਨੇ ਕਿਹਾ—ਅਲਪ-ਬੁੱਧੀ ਲੋਕ ਇਸ ਪੱਖ ਦਾ ਆਸਰਾ ਲੈ ਕੇ ‘ਸੁਭਾਵ ਹੀ ਕਾਰਣ ਹੈ’ ਮੰਨ ਕੇ ਪਰਮੇਸ਼ਵਰ ਦੀ ਉਪਾਸਨਾ ਤੋਂ ਮੁੜ ਜਾਂਦੇ ਹਨ; ਉਹ ਸੱਚਾ ਸ਼੍ਰੇਯ ਪ੍ਰਾਪਤ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ।

Verse 6

स्वभावो हि विनाशाय मोहकर्म मनोभव: । निरुक्तमेतयोरेतत्‌ स्‍्वभावपरिभावयो:,नास्तिक लोग जो स्वभाववादका आश्रय लेकर ईश्वर और अदृष्टकी सत्ताको स्वीकार नहीं करते हैं, यह उनका मोहजनित कार्य है, स्वभाववाद मूढ़ोंकी कल्पना-मात्र है। यह मानवोंको परमार्थसे वंचित करके उनका विनाश करनेके लिये ही उपस्थित किया गया है। स्वभाव और परिभावके तत्त्वका यह आगे बताया जानेवाला विवेचन सुनो

ਵਿਆਸ ਨੇ ਕਿਹਾ—‘ਕੇਵਲ ਸੁਭਾਵ’ ਦਾ ਸਿਧਾਂਤ ਵਿਨਾਸ਼ ਵੱਲ ਲੈ ਜਾਂਦਾ ਹੈ; ਇਹ ਮੋਹ ਤੋਂ ਜੰਮਿਆ, ਮਨ ਤੋਂ ਉੱਠਿਆ ਕਰਮ ਹੈ। ਸੁਭਾਵ ਅਤੇ ਪਰਿਭਾਵ—ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੋਹਾਂ ਬਾਰੇ ਇਤਨਾ ਕਿਹਾ ਗਿਆ। ਹੁਣ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਤੱਤ ਦਾ ਅੱਗੇ ਦਾ ਵਿਵੇਚਨ ਸੁਣੋ।

Verse 7

कृष्यादीनीह कर्माणि सस्यसंहरणानि च । प्रज्ञावद्धिः प्रक्लृप्तानि यानासनगृहाणि च,देखा जाता है कि जगतमें बुद्धिसम्पन्न चेतन प्राणियोंद्वारा ही भूमिको जोतने आदिके कार्य, अनाजके बीजोंका संग्रह तथा सवारी, आसन और गृहनिर्माण--ये सब कार्य सदासे किये जाते हैं। यदि स्वभावसे ये कार्य हो जाते तो कोई इनमें प्रवृत्त ही न होता

ਵਿਆਸ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਇਸ ਜਗਤ ਵਿੱਚ ਹਲ ਜੋਤਣ ਆਦਿ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਦੇ ਕੰਮ, ਅਨਾਜ ਦਾ ਇਕੱਠ ਤੇ ਸੰਭਾਲ, ਅਤੇ ਵਾਹਨ, ਆਸਨ ਤੇ ਘਰਾਂ ਦੀ ਬਣਤਰ—ਇਹ ਸਭ ਬੁੱਧੀਮਾਨ ਚੇਤਨ ਜੀਵਾਂ ਵੱਲੋਂ ਹੀ ਯੋਜਨਾ ਨਾਲ ਕੀਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਜੇ ਇਹ ਕੰਮ ਕੇਵਲ ਸੁਭਾਵ ਕਰਕੇ ਆਪੇ ਹੀ ਹੋ ਜਾਂਦੇ, ਤਾਂ ਕੋਈ ਵੀ ਜਾਣਬੁੱਝ ਕੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਲੱਗਦਾ।

Verse 8

आक्रीडानां गृहाणां च गदानामगदस्य च । प्रज्ञावन्त: प्रयोक्तारो ज्ञानवद्धिरनुछिता:,बेटा! चेतन प्राणी क्रीडाके लिये स्थान और रहनेके लिये घर बनाते हैं। वे ही रोगोंको पहचानकर उनपर ठीक-ठीक दवाका प्रयोग करते हैं। बुद्धिमान पुरुषोंद्वारा ही इन सब कार्योंका यथावत्‌ अनुष्ठान होता है (स्वभावसे--अपने-आप नहीं)

ਵਿਆਸ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਪੁੱਤਰ! ਖੇਡਣ ਲਈ ਥਾਵਾਂ ਅਤੇ ਰਹਿਣ ਲਈ ਘਰ ਚੇਤਨ ਜੀਵ ਹੀ ਬਣਾਉਂਦੇ ਹਨ। ਉਹੀ ਰੋਗਾਂ ਨੂੰ ਪਛਾਣ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਉੱਤੇ ਠੀਕ-ਠੀਕ ਦਵਾਈ ਵਰਤਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਸਭ ਕੰਮ ਸੁਭਾਵ ਕਰਕੇ ਆਪੇ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ; ਗਿਆਨਵਾਨ ਤੇ ਵਿਵੇਕੀ ਮਨੁੱਖ ਹੀ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਢੰਗ ਨਾਲ ਕਰਦੇ ਹਨ।

Verse 9

प्रज्ञा संयोजयत्यर्थ: प्रज्ञा श्रेयोडघिगच्छति । राजानो भुज्जते राज्यं प्रज्ञया तुल्यलक्षणा:,बुद्धि ही धनकी प्राप्ति कराती है। बुद्धिसे ही मनुष्य कल्याणको प्राप्त होता है। एक-से लक्षणोंवाले राजाओंमें भी जो बुद्धिमें बढ़े-चढ़े होते हैं, वे ही राज्यका उपभोग और दूसरोंपर शासन करते हैं

ਵਿਆਸ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਬੁੱਧੀ ਹੀ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਅਰਥ-ਸਾਧਨਾਂ ਨਾਲ ਜੋੜਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਨਾਲ ਹੀ ਉਹ ਪਰਮ ਕਲਿਆਣ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਬਾਹਰੀ ਲੱਛਣਾਂ ਵਿੱਚ ਇਕੋ ਜਿਹੇ ਰਾਜਿਆਂ ਵਿੱਚ ਵੀ, ਜੋ ਵਿਵੇਕ ਵਿੱਚ ਉੱਚੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਉਹੀ ਸੱਚਮੁੱਚ ਰਾਜ ਦਾ ਭੋਗ ਕਰਦੇ ਅਤੇ ਹੋਰਾਂ ਉੱਤੇ ਸ਼ਾਸਨ ਕਰਦੇ ਹਨ।

Verse 10

परावरं तु भूतानां ज्ञानेनिवोपलभ्यते । विद्यया तात सृष्टानां विद्यैवेह परा गति:,तात! प्राणियोंके स्थूल-सूक्ष्म या छोटे-बड़ेका भेद बुद्धिसे ही जाना जाता है। इस जगतमें सब प्राणियोंकी सृष्टि विद्यासे हुई है और उनकी परम गति विद्या ही है

ਜੀਵਾਂ ਵਿੱਚ ਉੱਚ-ਨੀਚ, ਸੁਖਮ-ਸਥੂਲ ਜਾਂ ਛੋਟਾ-ਵੱਡਾ ਦਾ ਭੇਦ ਕੇਵਲ ਗਿਆਨ ਨਾਲ ਹੀ ਸਮਝ ਆਉਂਦਾ ਹੈ। ਪੁੱਤਰ! ਇਸ ਜਗਤ ਵਿੱਚ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਰਚਨਾ ਵਿਦਿਆ-ਜਾਣ ਨਾਲ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਲਈ ਵਿਦਿਆ ਹੀ ਪਰਮ ਗਤੀ ਅਤੇ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਆਸਰਾ ਹੈ।

Verse 11

भूतानां जन्म सर्वेषां विविधानां चतुर्विधम्‌ | जरायुजाण्डजोद्धिज्जस्वेदजं चोपलक्षयेत्‌,संसारमें जो नाना प्रकारके जरायुज, अण्डज, स्वदेज और उद्धिज्ज-ये चतुर्विध प्राणी हैं, उन सबके जन्मकी ओर भी लक्ष्य करना चाहिये

ਵਿਆਸ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ—ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਜੀਵਾਂ ਦਾ ਜਨਮ ਚਾਰ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦਾ ਹੈ: ਜਰਾਯੁਜ, ਅੰਡਜ, ਸਵੇਦਜ ਅਤੇ ਉਦਭਿਜ਼ਜ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਭ ਦੇ ਜਨਮ-ਭੇਦ ਵੱਲ ਵੀ ਧਿਆਨ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।

Verse 12

स्थावरेभ्यो विशिष्टानि जड़मान्युपधारयेत्‌ । उपपन्नं हि यच्चेष्टा विशिष्येत विशेष्यया,स्थावर प्राणियोंसे जंगम प्राणियोंको श्रेष्ठ समझना चाहिये। यह बात युक्तिसंगत भी है, क्योंकि उनमें विशेषरूपसे चेष्टा देखी जाती है, इस विशेषताके कारण जंगम प्राणियोंकी विशिष्टता स्वत: सिद्ध है

ਥਾਵਰਾਂ ਨਾਲੋਂ ਜੰਗਮ ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ ਉੱਚਾ ਸਮਝਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਗੱਲ ਯੁਕਤਿਸੰਗਤ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਉਦੇਸ਼-ਯੁਕਤ ਚੇਸ਼ਟਾ ਸਪਸ਼ਟ ਦਿਸਦੀ ਹੈ; ਅਤੇ ਉਸੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਲੱਛਣ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਉੱਚਤਾ ਆਪ ਹੀ ਸਿੱਧ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

Verse 13

आहुर्वे बहुपादानि जड़मानि द्वयानि तु । बहुपाद्धयो विशिष्टानि द्विपदानि बहून्यपि

ਉਹ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਬਹੁ-ਪੈਰੀ ਜੀਵ ਮੰਦ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਦੋ-ਪੈਰੀ ਵੀ (ਕਈ ਵਾਰ) ਐਸੇ ਹੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਪਰ ਬਹੁ-ਪੈਰੀਆਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਕੁਝ ਉੱਤਮ ਹਨ, ਅਤੇ ਦੋ-ਪੈਰੀਆਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਅਨੇਕਾਂ ਕਿਸਮਾਂ ਤੇ ਦਰਜੇ ਹਨ।

Verse 14

जंगम जीवोंमें भी बहुत पैरवाले और दो पैरवाले--ये दो तरहके प्राणी होते हैं। इनमें बहुत पैरवालोंकी अपेक्षा दो पैरवाले अनेक प्राणी श्रेष्ठ बताये गये हैं ।। द्विपदानि द्वयान्याहु: पार्थिवानीतराणि च । पार्थिवानि विशिष्टानि तानि ह्ान्नानि भुज्जते,दो पैरवाले जंगम प्राणी भी दो प्रकारके कहे गये हैं--पार्थिव (मुनष्य) और अपार्थिव (पक्षी)। अपार्थिवोंसे पार्थिव श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे अन्न भोजन करते हैं

ਜੰਗਮ ਜੀਵਾਂ ਵਿੱਚ ਦੋ ਭੇਦ ਕਹੇ ਗਏ ਹਨ—ਬਹੁ-ਪੈਰੀ ਅਤੇ ਦੋ-ਪੈਰੀ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਬਹੁ-ਪੈਰੀਆਂ ਨਾਲੋਂ ਦੋ-ਪੈਰੀਆਂ ਨੂੰ ਅਕਸਰ ਉੱਤਮ ਮੰਨਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਫਿਰ ਦੋ-ਪੈਰੀ ਵੀ ਦੋ ਕਿਸਮਾਂ ਦੇ ਹਨ—ਪਾਰਥਿਵ (ਮਨੁੱਖ) ਅਤੇ ਇਤਰ (ਪੰਛੀ ਆਦਿ)। ਇਤਰਾਂ ਨਾਲੋਂ ਪਾਰਥਿਵ ਉੱਤਮ ਹਨ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਅੰਨ ਦਾ ਭੋਜਨ ਕਰਦੇ ਹਨ।

Verse 15

पार्थिवानि द्वयान्याहुर्मध्यमान्यधमानि तु । मध्यमानि विशिष्टानि जातिधर्मोपधारणात्‌,पार्थिव (मनुष्य) भी दो प्रकारके बताये गये हैं--मध्यम और अधम। उनमें मध्यम मनुष्य अधमकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे जाति-धर्मको धारण करते हैं

ਪਾਰਥਿਵ (ਮਨੁੱਖ) ਵੀ ਦੋ ਕਿਸਮਾਂ ਦੇ ਕਹੇ ਗਏ ਹਨ—ਮੱਧਮ ਅਤੇ ਅਧਮ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਮੱਧਮ ਮਨੁੱਖ ਅਧਮ ਨਾਲੋਂ ਉੱਤਮ ਹਨ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਜਾਤੀ-ਧਰਮ ਨੂੰ ਧਾਰਨ ਕਰਦੇ ਹਨ।

Verse 16

मध्यमानि द्वयान्याहुर्धर्मज्ञानीतराणि च । धर्मज्ञानि विशिष्टानि कार्याकार्योपधारणात्‌,मध्यम मनुष्य दो प्रकारके कहे गये हैं--धर्मज्ञ और धर्मसे अनभिज्ञ। इनमें धर्मज्ञ ही श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे कर्तव्य और अकर्त्तव्यका विवेक रखते और कर्त्तव्यका पालन करते हैं

ਮੱਧਮ ਮਨੁੱਖ ਵੀ ਦੋ ਕਿਸਮਾਂ ਦੇ ਕਹੇ ਗਏ ਹਨ—ਧਰਮ-ਜਾਣੂ ਅਤੇ ਧਰਮ ਤੋਂ ਅਣਜਾਣ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਧਰਮ-ਜਾਣੂ ਹੀ ਉੱਤਮ ਹਨ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਕਰਤੱਬ ਅਤੇ ਅਕਰਤੱਬ ਦਾ ਵਿਵੇਕ ਰੱਖਦੇ ਹਨ।

Verse 17

धर्मज्ञानि द्वयान्याहुवेंदज्ञानीतराणि च । वेदज्ञानि विशिष्टानि वेदो होषु प्रतिष्ठित:,धर्मज्ञोंके भी दो भेद कहे गये हैं--वेदज्ञ और अवेदज्ञ। इनमें वेदज्ञ श्रेष्ठ हैं; क्योंकि उन्हींमें वेद प्रतिष्ठित है

ਵਿਆਸ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਧਰਮ ਨੂੰ ਜਾਣਨ ਵਾਲੇ ਦੋ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਕਹੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ—ਵੇਦ-ਜਾਣੂ ਅਤੇ ਅਵੇਦ-ਜਾਣੂ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਵੇਦ-ਜਾਣੂ ਹੀ ਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ ਹਨ, ਕਿਉਂਕਿ ਵੇਦ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਹੀ ਦ੍ਰਿੜ੍ਹ ਤੌਰ ਤੇ ਪ੍ਰਤਿਸ਼ਠਿਤ ਹੈ।

Verse 18

वेदज्ञानि द्वयान्याहु: प्रवक्तूणीतराणि च । प्रवक्तृणि विशिष्टानि सर्वधर्मोपधारणात्‌,वेदज्ञ भी दो प्रकारके बताये गये हैं--प्रवक्ता और अप्रवक्ता। इनमें प्रवक्ता (प्रवचन करनेवाले) श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे वेदमें बताये हुए सम्पूर्ण धर्मोको धारण करनेवाले होते हैं

ਵਿਆਸ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਵੇਦ-ਜਾਣੂ ਵੀ ਦੋ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਹਨ—ਪ੍ਰਵਕਤਾ (ਉਪਦੇਸ਼ਕ) ਅਤੇ ਅਪ੍ਰਵਕਤਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਵਕਤਾ ਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ ਹਨ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਵੇਦ ਵਿੱਚ ਦੱਸੇ ਗਏ ਸਮੂਹ ਧਰਮਾਂ ਨੂੰ ਧਾਰਨ ਕਰਦੇ ਹਨ।

Verse 19

विज्ञायन्ते हि यैवेंदा: सधर्मा: सक्रियाफला: । सधर्मा निखिला वेदा: ४28 भ्यो विनि:सृता:,एवं उन्हींके द्वारा धर्म, कर्म और फलोंसहित वेदोंका ज्ञान दूसरोंको होता है। धर्मसहित सम्पूर्ण वेद प्रवक्ताओंके ही मुखसे प्रकट होते हैं

ਵਿਆਸ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਇਨ੍ਹਾਂ ਉਪਦੇਸ਼ਕਾਂ ਦੇ ਰਾਹੀਂ ਹੀ ਵੇਦ ਧਰਮ ਸਮੇਤ, ਕਰਤਵ੍ਯ ਕਰਮ ਸਮੇਤ ਅਤੇ ਕਰਮ-ਫਲ ਸਮੇਤ ਸਮਝੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਧਰਮ ਨਾਲ ਅਟੁੱਟ ਸਮੂਹ ਵੇਦ ਪ੍ਰਵਕਤਿਆਂ ਦੇ ਮੁਖ ਤੋਂ ਹੀ ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦੇ ਹਨ; ਇਸੇ ਕਰਕੇ ਹੋਰ ਲੋਕ ਵੀ ਵੇਦ-ਉਪਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਉਸ ਦੇ ਨੈਤਿਕ ਅਤੇ ਵਿਹਾਰਿਕ ਅਰਥ ਸਮੇਤ ਜਾਣ ਲੈਂਦੇ ਹਨ।

Verse 20

प्रवक्तृणि द्वयान्याहुरात्मज्ञानीतराणि च । आत्मज्ञानि विशिष्टानि जन्माजन्मोपधारणात्‌,प्रवक्ता भी दो प्रकारके कहे गये हैं--आत्मज्ञ और अनात्मज्ञ। इनमें आत्मज्ञ पुरुष ही श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे जन्म और मृत्युके तत्त्वको समझते हैं

ਵਿਆਸ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਪ੍ਰਵਕਤਾ ਵੀ ਦੋ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਕਹੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ—ਆਤਮ-ਜਾਣੂ ਅਤੇ ਅਨਾਤਮ-ਜਾਣੂ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਆਤਮ-ਜਾਣੂ ਹੀ ਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ ਹਨ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਜਨਮ-ਮਰਨ ਅਤੇ ਪੁਨਰਜਨਮ ਦੀ ਤੱਤ-ਗਿਆਨ ਨੂੰ ਸਮਝਦੇ ਹਨ।

Verse 21

धर्मद्वयं हि यो वेद स सर्वज्ञ: स सर्ववित्‌ । स त्यागी सत्यसंकल्प: सत्य: शुचिरथेश्वर:,जो प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप दो प्रकारके धर्मको जानता है, वही सर्वज्ञ, सर्ववेत्ता, त्यागी, सत्यसंकल्प, सत्यवादी, पवित्र और समर्थ होता है

ਵਿਆਸ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜੋ ਪ੍ਰਵ੍ਰਿੱਤੀ ਅਤੇ ਨਿਵ੍ਰਿੱਤੀ ਰੂਪ ਦੋਹਾਂ ਧਰਮਾਂ ਨੂੰ ਯਥਾਰਥ ਜਾਣ ਲੈਂਦਾ ਹੈ, ਉਹੀ ਸਰਵਜ੍ਞ ਅਤੇ ਸਰਵਵਿਤ ਬਣਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਤਿਆਗੀ, ਸੱਚੇ ਸੰਕਲਪ ਵਾਲਾ, ਬੋਲ ਅਤੇ ਆਚਰਨ ਵਿੱਚ ਸੱਚਾ, ਅੰਦਰੋਂ ਪਵਿੱਤਰ ਅਤੇ ਸਮਰੱਥ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

Verse 22

ब्रह्माज्ञानप्रतिष्ठं हि त॑ देवा ब्राह्मणं विदु: । शब्दब्रह्मणि निष्णातं परे च कृतनिश्चयम्‌

ਜੋ ਬ੍ਰਹਮ-ਗਿਆਨ ਵਿੱਚ ਦ੍ਰਿੜ੍ਹ ਪ੍ਰਤਿਸ਼ਠਿਤ ਹੈ, ਦੇਵਤਾ ਉਸੇ ਨੂੰ ਹੀ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਮੰਨਦੇ ਹਨ—ਜੋ ਸ਼ਬਦ-ਬ੍ਰਹਮ (ਵੇਦ) ਵਿੱਚ ਨਿਪੁੰਨ ਹੋਵੇ ਅਤੇ ਪਰਮ ਬ੍ਰਹਮ ਵਿੱਚ ਭੀ ਪੱਕਾ ਨਿਸ਼ਚਯ ਕਰ ਚੁੱਕਾ ਹੋਵੇ।

Verse 23

जो शब्दब्रह्म (वेद) में पारंगत होकर परब्रह्मके तत्त्वका निश्चय कर चुका है और सदा ब्रह्मज्ञानमें ही स्थित रहता है, उसे ही देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ।। अन्तःस्थं च बहिछं च साधियज्ञाधिदैवतम्‌ । ज्ञानान्विता हि पश्यन्ति ते देवास्तात ते द्विजा:

ਗਿਆਨ ਨਾਲ ਯੁਕਤ ਉਹ ਜਨ ਅੰਦਰ ਅਤੇ ਬਾਹਰ ਵੱਸਦੇ ਦਿਵ੍ਯ ਤੱਤ ਨੂੰ—ਅਧਿਯਜ੍ਞ ਅਤੇ ਅਧਿਦੈਵ ਸਮੇਤ—ਦੇਖਦੇ ਹਨ। ਹੇ ਤਾਤ! ਉਹੀ ਦੇਵ ਹਨ, ਉਹੀ ਦ੍ਵਿਜ ਹਨ।

Verse 24

बेटा! जो लोग ज्ञानवान्‌ होकर बाहर और भीतर व्याप्त अधियज्ञ (परमात्मा) और अधिदैव (पुरुष) का साक्षात्कार कर लेते हैं, वे ही देवता और वे ही द्विज हैं |। तेषु विश्वमिदं भूतं सर्व च जगदाहितम्‌ । तेषां माहात्म्यभावस्य सदृशं नास्ति किंचन,उन्हींमें यह सारा विश्व, सम्पूर्ण जगत्‌ प्रतिष्ठित है। उनके माहात्म्यकी कहीं कोई तुलना नहीं है

ਹੇ ਪੁੱਤਰ! ਜੋ ਗਿਆਨਵਾਨ ਹੋ ਕੇ ਅੰਦਰ ਅਤੇ ਬਾਹਰ ਵਿਆਪਕ ਅਧਿਯਜ੍ਞ (ਪਰਮਾਤਮਾ) ਅਤੇ ਅਧਿਦੈਵ (ਪੁਰੁਸ਼) ਦਾ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਹਨ, ਉਹੀ ਦੇਵ ਹਨ ਅਤੇ ਉਹੀ ਸੱਚੇ ਦ੍ਵਿਜ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਹੀ ਇਹ ਸਾਰਾ ਵਿਸ਼ਵ ਅਤੇ ਸਮੂਹ ਜਗਤ ਟਿਕਿਆ ਹੈ; ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਮਹਿਮਾ ਦੀ ਤੁਲਨਾ ਕਿਤੇ ਨਹੀਂ।

Verse 25

आदइ्यन्ते निधन चैव कर्म चातीत्य सर्वशः । चतुर्विधस्य भूतस्य सर्वस्येशा: स्वयम्भुव:,वे जन्म, मृत्यु और कर्मकी सीमाको भलीभाँति लाँधकर समस्त चतुर्विध प्राणियोंके अधीश्वर एवं स्वयम्भू होते हैं

ਉਹ ਜਨਮ, ਮੌਤ ਅਤੇ ਕਰਮ—ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਭ ਦੀਆਂ ਹੱਦਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਲੰਘ ਕੇ—ਸਮੂਹ ਚਤੁਰਵਿਧ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਦੇ ਅਧੀਸ਼ਵਰ, ਸ੍ਵਯੰਭੂ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ।

Verse 237

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने सप्तत्रिंशदधिकद्धिशततमो<ध्याय:

ਇਤਿ ਸ਼੍ਰੀਮਹਾਭਾਰਤ ਦੇ ਸ਼ਾਂਤਿਪਰਵ ਦੇ ਮੋક્ષਧਰਮਪਰਵ ਵਿੱਚ, ਸ਼ੁਕਾਨੁਪ੍ਰਸ਼ਨ ਪ੍ਰਸੰਗ ਅਧੀਨ, ਦੋ ਸੌ ਸੈਂਤੀਵਾਂ ਅਧਿਆਇ ਸਮਾਪਤ।

Frequently Asked Questions

The tension between remaining in structured āśrama life and advancing toward renunciant freedom: how to reduce dependence, speech-harm, and reactive emotions while still sustaining the body through minimal means.

Adopt solitary, non-possessive discipline with strict self-restraint, and treat ahiṃsā as the governing ethic—producing equanimity, non-enmity, and a stable orientation toward liberation (kaivalya).

Rather than a formal phalaśruti, benefit is framed doctrinally: the practitioner who embodies ahiṃsā and fearlessness attains an “unsurpassed path/state,” characterized by freedom from fear, diminished conflict, and liberation-oriented steadiness.