
Vyaktāvyakta-Viveka and Nivṛtti as Paramā Gati (Manifest–Unmanifest Discrimination and the Supreme Path of Withdrawal)
Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Vyaktāvyakta–Pravṛtti–Nivṛtti Discourse Unit
A guru-voice instructs that higher dharma is not grasped without knowing a ‘catuṣṭaya’ (a fourfold analytic), anchored in discriminating vyakta (manifest, tied to mortality) from avyakta (unmanifest, characterized as deathless). The discourse defines pravṛtti-dharma as a mode associated with return (punarāvṛtti), while nivṛtti-dharma is presented as the highest destination (paramā gati). Two subtle, beginningless and endless principles—avyakta and puruṣa—are treated as difficult to apprehend, and the kṣetrajña is characterized as the witness of prakṛti and its transformations, not constituted by guṇas. The chapter then explains how embodied identity is linguistically and karmically constructed through conjunction, action, and the instruments of action, while the self is ‘covered’ by sattva, rajas, and tamas. Practical disciplines follow: tapas defined as purifying action that diminishes rajas and tamas, including bodily austerities (brahmacarya, ahiṃsā) and mental disciplines (restraint of speech and mind, equanimity). Regulation of food and gradual, non-distressing practice are recommended to support knowledge, especially toward life’s end. The text concludes with binding metaphors: craving as an endless fiber/thread that stitches saṃsāra, and liberation as the state of being free from thirst through correct knowledge of prakṛti, vikāra, and the eternal puruṣa, attributed to Nārāyaṇa’s compassionate instruction for the welfare of beings.
Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि ‘सनातन’ और मोक्ष-तत्त्व को समझाने हेतु वे एक प्राचीन इतिहास—गुरु और शिष्य के संवाद—का उपाख्यान सुनाते हैं। → शिष्य ब्रह्म-गुह्य अध्यात्म का रहस्य पूछता है; गुरु इन्द्रियों और मन के सूक्ष्म रूपान्तरण, पंचमहाभूत-गुणों के साथ इन्द्रियों के सम्बन्ध, तथा जगत् के आधार-तत्त्व का क्रमशः निरूपण करते हैं—जिससे साधक के भीतर ‘मैं कौन हूँ’ का प्रश्न तीव्र होता जाता है। → गुरु निर्णायक रूप से बताते हैं कि मन ही भिन्न-भिन्न क्रियाओं में रसना/वाणी आदि इन्द्रियों का रूप धारण करता है; जिह्वा-जल, गन्ध-पृथ्वी, श्रोत्र-आकाश, चक्षु-अग्नि, स्पर्श-वायु—इन गुण-संबंधों के पार जो रजोगुण-रहित परमात्म-आश्रय है वही समस्त चराचर का आधार है, और जीव कर्मानुसार देह त्यागकर अन्य देह ग्रहण करता है। → उपदेश का फल यह स्थापित होता है कि त्रैलोक्य चक्रवत् परिवर्तित है; देह-इन्द्रिय-मन के परिवर्तनशील संघात से परे आत्म-तत्त्व का आश्रय लेना ही मोक्षमार्ग है, और शिष्य को इस श्रवण का अधिकारी मानकर गुरु कल्याणमय परम-तत्त्व (वार्ष्णेय-माहात्म्य/परमात्म-आश्रय) की ओर बुद्धि स्थिर करने को प्रेरित करते हैं। → परम कल्याणमय तत्त्व/वार्ष्णेय-माहात्म्य का संकेत देकर अध्याय समाप्त होता है—अगले प्रसंग में उसके विस्तृत प्रतिपादन की अपेक्षा बनी रहती है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८६३ “लोक मिलाकर कुल १२२६ “लोक हैं) भस्न्ैमा सन () अं िमाने + इस श्लोकमें वर्णित भावके अनुसार सनातन शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये--नादनेन सहितः सनादन:। दकारस्थाने तकारो छान्दस:। जो नादके साथ हो, वह 'सनादन” कहलाता है। सनादनके दकारके स्थानमें तकार हो जानेसे “सनातन” बनता है। ३. आश्रावय, २. अस्तु श्रौषट्, ३. यज, ४. ये यजामहे, ५. वषट्। दशाधिकद्वधिशततमो< ध्याय: गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन युधिछिर उवाच योगं मे परमं तात मोक्षस्य वद भारत | तमहं तत्त्वतो ज्ञातुमिच्छामि वदतां वर,युधिष्ठिरने कहा--वक्ताओंमें श्रेष्ठ तात भरतनन्दन! आप मुझे मोक्षके साधनभूत परम योगका उपदेश कीजिये। मैं उसे यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ
Yudhiṣṭhira said: “O revered one, O Bhārata—teach me the supreme discipline that leads to liberation. I wish to understand it in its true nature; O best among speakers, please explain.”
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं मोक्षसंयुक्त शिष्यस्य गुरुणा सह,भीष्मजी बोले--राजन्! इस विषयमें एक शिष्यका गुरुके साथ जो मोक्षसम्बन्धी संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है
Bhishma said: “O King, in this matter too an ancient precedent is cited: a venerable old account describing a dialogue on liberation that took place between a disciple and his teacher.”
Verse 3
वश्चिद् ब्राह्मणमासीनमाचार्यमृषिसत्तमम् | तेजोराशिं महात्मानं सत्यसंध॑ जितेन्द्रियम्,किसी समयकी बात है, एक दिद्वान् ब्राह्मण श्रेष्ठ आसनपर विराजमान थे। वे आचार्यकोटिके पण्डित और श्रेष्ठतम महर्षि थे। देखनेमें महान् तेजकी राशि जान पड़ते थे। बड़े महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे। एक दिन उनकी सेवामें कोई परम मेधावी कल्याणकामी एवं समाहितचित्त शिष्य आया (जो चिरकालतक उनकी शुश्रूषा कर चुका था), वह उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़ सामने खड़ा हो इस प्रकार बोला --
Bhishma said: Once there was a learned brāhmaṇa seated in a place of honor—an ācārya, the foremost among sages. He appeared like a mass of radiance: a great-souled man, steadfast in truth, and master of his senses. (The narrative sets up an ethical exemplar—one whose authority rests on learning, self-control, and fidelity to truth—before introducing the disciple who approaches him in reverence.)
Verse 4
शिष्य: परममेधावी श्रेयो<र्थी सुसमाहित: । चरणावुपसंगृहा[ स्थित: प्राउजलिरब्रवीत्,किसी समयकी बात है, एक दिद्वान् ब्राह्मण श्रेष्ठ आसनपर विराजमान थे। वे आचार्यकोटिके पण्डित और श्रेष्ठतम महर्षि थे। देखनेमें महान् तेजकी राशि जान पड़ते थे। बड़े महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे। एक दिन उनकी सेवामें कोई परम मेधावी कल्याणकामी एवं समाहितचित्त शिष्य आया (जो चिरकालतक उनकी शुश्रूषा कर चुका था), वह उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़ सामने खड़ा हो इस प्रकार बोला --
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਅਸਾਧਾਰਣ ਬੁੱਧੀ ਵਾਲਾ, ਪਰਮ ਸ਼੍ਰੇਯ ਦੀ ਇੱਛਾ ਰੱਖਣ ਵਾਲਾ ਅਤੇ ਮਨੋਂ ਸਥਿਰ ਇੱਕ ਸ਼ਿਸ਼੍ਯ ਆਪਣੇ ਗੁਰੂ ਕੋਲ ਆਇਆ। ਉਸ ਨੇ ਭਕਤੀ ਨਾਲ ਗੁਰੂ ਦੇ ਦੋਵੇਂ ਚਰਨ ਫੜ ਕੇ ਪ੍ਰਣਾਮ ਕੀਤਾ, ਫਿਰ ਹੱਥ ਜੋੜ ਕੇ ਸਾਹਮਣੇ ਖੜ੍ਹਾ ਹੋ ਕੇ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬੋਲਿਆ—
Verse 5
उपासनात् प्रसन्नोडसि यदि वै भगवन् मम । संशयो मे महान् कश्रित् तन्मे व्याख्यातुमरहसि । कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत् सम्यग्ब्रूहि यत्परम्,“भगवन्! यदि आप मेरी सेवासे प्रसन्न हैं तो मेरे मनमें जो एक बड़ा भारी संदेह है, उसे दूर करनेकी कृपा करें--ेरे प्रश्नकी विशद व्याख्या करें। मैं इस संसारमें कहाँसे आया हूँ और आप भी कहाँसे आये हैं? यह भलीभाँति समझाकर बताइये। इसके सिवा जो परम तत्त्व है, उसका भी विवेचन कीजिये
“ਭਗਵਨ! ਜੇ ਮੇਰੀ ਸੇਵਾ ਨਾਲ ਤੁਸੀਂ ਪ੍ਰਸੰਨ ਹੋ, ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਮਨ ਵਿੱਚ ਉੱਠੇ ਇਕ ਮਹਾਨ ਸੰਦੇਹ ਨੂੰ ਦੂਰ ਕਰੋ। ਕਿਰਪਾ ਕਰਕੇ ਇਸ ਦੀ ਸਪਸ਼ਟ ਵਿਆਖਿਆ ਕਰੋ—ਮੈਂ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਕਿੱਥੋਂ ਆਇਆ ਹਾਂ ਅਤੇ ਤੁਸੀਂ ਕਿੱਥੋਂ ਆਏ ਹੋ? ਇਹ ਠੀਕ-ਠੀਕ ਦੱਸੋ; ਅਤੇ ਜੋ ਪਰਮ ਤੱਤ ਹੈ, ਉਸ ਦਾ ਵੀ ਨਿਰੂਪਣ ਕਰੋ।”
Verse 6
कथं च सर्वभूतेषु समेषु द्विजसत्तम | सम्यग्वृत्ता निवर्तन्ते विपरीता: क्षयोदया:,द्विजश्रेष्ठ) पृथ्वी आदि सम्पूर्ण महाभूत सर्वत्र समान हैं; सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर उन्हींसे निर्मित हुए हैं तो भी उनमें क्षय और वृद्धि--ये दोनों विपरीतभाव क्यों होते हैं?
“ਹੇ ਦ੍ਵਿਜਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ! ਜਦੋਂ ਧਰਤੀ ਆਦਿ ਮਹਾਭੂਤ ਹਰ ਥਾਂ ਇੱਕੋ ਜਿਹੇ ਹਨ ਅਤੇ ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਸਰੀਰ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਹੀ ਤੱਤਾਂ ਤੋਂ ਬਣੇ ਹਨ, ਤਾਂ ਫਿਰ ਜੀਵਾਂ ਵਿੱਚ ਘਟਾਉ ਅਤੇ ਵਾਧਾ—ਇਹ ਵਿਰੋਧੀ ਹਾਲਤਾਂ—ਕਿਉਂ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ? ਅਤੇ ਕਿਹੜੇ ਨਿਯਮ ਅਨੁਸਾਰ ਇਹ ਉਤਪੰਨ ਹੋ ਕੇ ਲੁਪਤ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ?”
Verse 7
वेदेषु चापि यद् वाक््यं लौकिकं व्यापकं च यत् । एतद् विद्वन् यथातत्त्वं सर्व व्याख्यातुमहसि,“वेदों और स्मृतियोंमें भी जो लौकिक और व्यापक धर्मोका वर्णन है, उनमें भी विषमता है। अतः विद्वन्! इन सबकी आप यथार्थरूपसे व्याख्या करें!
“ਵੇਦਾਂ ਦੇ ਵਾਕ ਅਤੇ ਸਮ੍ਰਿਤੀਆਂ ਵਿੱਚ ਜੋ ਲੋਕਿਕ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਲਾਗੂ ਧਰਮ-ਉਪਦੇਸ਼ ਹਨ—ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਮੈਨੂੰ ਅਸੰਗਤਤਾ ਦਿੱਸਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ, ਹੇ ਵਿਦਵਾਨ, ਤੁਸੀਂ ਤੱਤ ਅਨੁਸਾਰ ਇਹ ਸਭ ਕੁਝ ਵਿਆਖਿਆ ਕਰੋ, ਤਾਂ ਜੋ ਅਸਲ ਭਾਵ ਸਮਝ ਆ ਸਕੇ।”
Verse 8
गुरुउ्वाच शृणु शिष्य महाप्राज्ञ ब्रह्मगुह्ममिदं परम् । अध्यात्मं सर्वविद्यानामागमानां च यद्धसु,गुरुने कहा--वत्स! सुनो। महामते! तुमने जो बात पूछी है, वह वेदोंका उत्तम एवं गूढ़ रहस्य है। यही अध्यात्मतत्त्व है तथा यही समस्त विद्याओं और शास्त्रोंका सर्वस्व है जैसे ऋतु-परिवर्तनके साथ ही भिन्न-भिन्न ऋतुओंके नाना प्रकारके वे-ही-वे लक्षण प्रकट होते रहते हैं, वैसे ही प्रत्येक कल्पके आरम्भमें पूर्व कल्पोंके अनुसार तदनुरूप भावोंकी अभिव्यक्ति होती रहती है ।। अथ यद्यद् यदा भाति कालयोगाद्ू युगादिषु | तत् तदुत्पद्यते ज्ञानं लोकयात्राविधानजम्
ਗੁਰੂ ਨੇ ਆਖਿਆ—“ਵਤਸ, ਸੁਣ। ਮਹਾਪ੍ਰਾਜ্ঞ ਸ਼ਿਸ਼੍ਯ! ਤੂੰ ਜੋ ਪੁੱਛਿਆ ਹੈ, ਉਹ ਬ੍ਰਹਮ ਦਾ ਪਰਮ ਅਤੇ ਗੂੜ੍ਹ ਰਾਜ਼ ਹੈ। ਇਹੀ ਅਧਿਆਤਮ-ਤੱਤ ਹੈ; ਇਹੀ ਸਭ ਵਿਦਿਆਵਾਂ ਅਤੇ ਆਗਮ-ਸ਼ਾਸਤਰਾਂ ਦਾ ਸਾਰ ਹੈ। ਅਤੇ ਯੁਗਾਂ ਦੇ ਆਰੰਭ ਵਿੱਚ ਕਾਲ-ਯੋਗ ਨਾਲ ਜੋ ਜੋ ਜਿਵੇਂ ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਉਹ ਉਹ ਗਿਆਨ ਵੀ ਮੁੜ ਮੁੜ ਉਤਪੰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ—ਲੋਕ-ਯਾਤਰਾ ਦੇ ਵਿਧਾਨ ਤੋਂ, ਜੀਵਾਂ ਦੀ ਲੋੜ ਮੁਤਾਬਕ।”
Verse 9
वासुदेव: परमिदं विश्व॒स्य ब्रह्मणो मुखम् । सत्यं ज्ञानमथो यज्ञस्तितिक्षा दम आर्जवम्,सम्पूर्ण वेदका मुख जो प्रणव है वह तथा सत्य, ज्ञान, यज्ञ, तितिक्षा, इन्द्रिय-संयम, सरलता और परम तत्त्व--यह सब कुछ वासुदेव ही है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਵਾਸੁਦੇਵ ਹੀ ਇਸ ਵਿਸ਼ਵ ਦਾ ਪਰਮ ਆਧਾਰ ਅਤੇ ਬ੍ਰਹਮ ਦਾ ‘ਮੁਖ’ (ਸਰਵੋਚ ਪ੍ਰਗਟਾਵਾ) ਹੈ। ਸੱਚਾਈ, ਗਿਆਨ, ਯੱਗ, ਤਿਤਿਕਸ਼ਾ (ਸਹਿਨਸ਼ੀਲਤਾ), ਦਮ (ਇੰਦ੍ਰੀ-ਸੰਯਮ) ਅਤੇ ਆਰਜਵ (ਸਰਲਤਾ)—ਇਹ ਸਾਰੇ ਗੁਣ ਅਤੇ ਜਿਸ ਪਰਮ ਤੱਤ ਵੱਲ ਇਹ ਸੰਕੇਤ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਵਾਸੁਦੇਵ ਆਪ ਹੀ ਹੈ।
Verse 10
पुरुषं सनातन विष्णुं यं त॑ वेदविदो विदु: । स्वर्गप्रलयकर्तारमव्यक्तं ब्रह्म शाश्वतम्,वेदज्ञजन उसीको सनातन पुरुष और विष्णु भी मानते हैं। वही संसारकी सृष्टि और प्रलय करनेवाला अव्यक्त एवं सनातन ब्रह्म है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਵੇਦ ਦੇ ਜਾਣਕਾਰ ਉਸਨੂੰ ਸਨਾਤਨ ਪੁਰਖ—ਵਿਸ਼ਨੂ—ਮੰਨਦੇ ਹਨ। ਉਹੀ ਜਗਤ ਦੀ ਸ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਅਤੇ ਪ੍ਰਲਯ ਕਰਨ ਵਾਲਾ, ਅਵ੍ਯਕਤ ਅਤੇ ਸ਼ਾਸ਼ਵਤ ਬ੍ਰਹਮ ਹੈ।
Verse 11
तदिदं ब्रह्म वाष्णेयमितिहासं शृणुष्व मे । ब्राह्मणो ब्राह्मुणै: श्राव्यो राजन्य: क्षत्रियैस्तथा,वही ब्रह्म वृष्णिकुलमें श्रीकृष्णरूपमें अवतीर्ण हुआ, इस कथाको तुम मुझसे सुनो। ब्राह्मण ब्राह्मणको, क्षत्रिय क्षत्रियको, वैश्य वैश्यको तथा शूद्र महामनस्वी शूद्रको, अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णुका माहात्म्य सुनावे
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੁਣ ਮੇਰੇ ਕੋਲੋਂ ਵ੍ਰਿਸ਼ਣੀ ਵੰਸ਼ ਨਾਲ ਸੰਬੰਧਿਤ ਇਹ ਬ੍ਰਹਮ-ਇਤਿਹਾਸ ਸੁਣੋ। ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨੂੰ ਬ੍ਰਾਹਮਣਾਂ ਵਿਚ, ਅਤੇ ਰਾਜਨ੍ਯ (ਖ਼ਤਰੀ) ਨੂੰ ਖ਼ਤਰੀਆਂ ਵਿਚ ਇਸ ਦਾ ਪਾਠ ਕਰਵਾਉਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।
Verse 12
वैश्यो वैश्यैस्तथा श्राव्य: शूद्र: शूद्रैमहामना: । माहात्म्यं देवदेवस्य विष्णोरमिततेजस:,वही ब्रह्म वृष्णिकुलमें श्रीकृष्णरूपमें अवतीर्ण हुआ, इस कथाको तुम मुझसे सुनो। ब्राह्मण ब्राह्मणको, क्षत्रिय क्षत्रियको, वैश्य वैश्यको तथा शूद्र महामनस्वी शूद्रको, अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णुका माहात्म्य सुनावे
ਵੈਸ਼੍ਯ ਨੂੰ ਵੈਸ਼੍ਯਾਂ ਵੱਲੋਂ, ਅਤੇ ਮਹਾਨ ਮਨ ਵਾਲੇ ਸ਼ੂਦਰ ਨੂੰ ਸ਼ੂਦਰਾਂ ਵੱਲੋਂ ਇਹ ਉਪਦੇਸ਼ ਸੁਣਾਇਆ ਜਾਵੇ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੇਵਾਂ ਦੇ ਦੇਵ, ਅਪਾਰ ਤੇਜ ਵਾਲੇ ਵਿਸ਼ਨੂ ਦੀ ਮਹਿਮਾ ਵਰਣਿਤ ਹੋਵੇ।
Verse 13
अ्हस्त्वमसि कल्याण वार्ष्णेयं शृणु यत्परम् । कालचक्रमनाद्यन्तं भावाभावस्वलक्षणम्
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੇ ਕਲਿਆਣਮਈ ਵਾਰ੍ਸ਼ਣੇਯ, ਤੂੰ ਬੇਸਹਾਰਾ ਨਹੀਂ। ਹੁਣ ਪਰਮ ਉਪਦੇਸ਼ ਸੁਣ—ਕਾਲ ਦਾ ਚੱਕਰ, ਜਿਸ ਦਾ ਨਾ ਆਰੰਭ ਹੈ ਨਾ ਅੰਤ, ਅਤੇ ਜਿਸ ਦੀ ਪਹਿਚਾਣ ਹੈ ਭਾਵ ਅਤੇ ਅਭਾਵ ਦਾ ਉਤਪੱਤਿ-ਲਯ।
Verse 14
यत्तदक्षरमव्यक्तममृतं ब्रह्म शाश्वतम् | वदन्ति पुरुषव्याप्र केशवं पुरुषर्षभम्,पुरुषसिंह! पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको ही अक्षर, अव्यक्त, अमृत एवं सनातन परब्रह्म कहते हैं
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੇ ਪੁਰਖ-ਸਿੰਹ! ਜਿਸ ਅਖੰਡ (ਅਕਸ਼ਰ), ਅਵ੍ਯਕਤ, ਅਮਰ ਅਤੇ ਸ਼ਾਸ਼ਵਤ ਪਰਬ੍ਰਹਮ ਦਾ ਵਰਣਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਉਹੀ ਕੇਸ਼ਵ ਹੈ—ਸ਼੍ਰੀਕ੍ਰਿਸ਼ਨ, ਪੁਰਖਾਂ ਵਿਚ ਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ, ਪੁਰਖ-ਸਿੰਹ, ਪੁਰਖੋੱਤਮ।
Verse 15
पितृन देवानृषींश्वैव तथा वै यक्षराक्षसान् | नागासुरमनुष्यांश्ष सृूजते परमोडव्यय:,ये अविनाशी परमात्मा श्रीकृष्ण ही पितर, देवता, ऋषि, यक्ष, राक्षस, नाग, असुर और मनुष्य आदिकी रचना करते हैं
ਉਹ ਪਰਮ, ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਪ੍ਰਭੂ ਪਿਤਰਾਂ, ਦੇਵਤਿਆਂ, ਰਿਸ਼ੀਆਂ ਅਤੇ ਯਕਸ਼-ਰਾਕਸ਼ਸਾਂ ਨੂੰ; ਅਤੇ ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਾਗਾਂ, ਅਸੁਰਾਂ ਤੇ ਮਨੁੱਖਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਰਚਦਾ ਹੈ।
Verse 16
तथैव वेदशास्त्राणि लोकधर्माश्च शाश्वतान् । प्रलयं प्रकृति प्राप्प युगादौ सृजते पुन:,इसी प्रकार प्रलयकाल बीतनेपर कल्पके आरम्भमें प्रकृतिका आश्रय ले भगवान् श्रीकृष्ण ही ये वेद-शास्त्र और सनातन लोक-धर्मोंको पुनः प्रकट करते हैं
ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਵੇਦ-ਸ਼ਾਸਤਰ ਅਤੇ ਸ਼ਾਸ਼ਵਤ ਲੋਕ-ਧਰਮ ਵੀ—ਪ੍ਰਲਯ ਵੇਲੇ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ ਵਿੱਚ ਲੀਨ ਹੋ ਕੇ—ਯੁਗ ਦੇ ਆਰੰਭ ਵਿੱਚ ਮੁੜ ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦੇ ਹਨ।
Verse 17
यथर्र्तावृतुलिड्रानि नानारूपाणि पर्यये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु
ਜਿਵੇਂ ਰੁੱਤਾਂ ਦੇ ਚਿੰਨ੍ਹ ਆਪਣੇ ਚੱਕਰ ਵਿੱਚ ਅਨੇਕ ਰੂਪ ਧਾਰ ਕੇ ਵੀ ਮੁੜ ਮੁੜ ਉਹੀ ਦੇ ਉਹੀ ਦਿਸਦੇ ਹਨ, ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਯੁਗਾਂ ਦੇ ਆਰੰਭ ਵਿੱਚ ਅਸਤਿਤ੍ਵ ਦੀਆਂ ਅਵਸਥਾਵਾਂ ਵੀ ਫਿਰ ਫਿਰ ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ।
Verse 18
काल-क्रमसे युगादिमें जब-जब जो-जो वस्तु भासित होती है, लोक-व्यवहारवश तब- तब उसी-उसी विषयका ज्ञान प्रकट होता रहता है
ਕਾਲ-ਕ੍ਰਮ ਅਨੁਸਾਰ ਯੁਗ ਦੇ ਆਰੰਭ ਵਿੱਚ ਜਦੋਂ-ਜਦੋਂ ਜੋ-ਜੋ ਵਸਤੂ ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਤਦੋਂ-ਤਦੋਂ ਲੋਕ-ਵਿਹਾਰ ਦੇ ਕਾਰਨ ਉਸੇ-ਉਸੇ ਵਿਸ਼ੇ ਦਾ ਗਿਆਨ ਵੀ ਮੁੜ ਮੁੜ ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ।
Verse 19
युगान्ते5न्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षय: । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता: स्वयम्भुवा,कल्पके अन्तमें लुप्त हुए वेदों और इतिहासोंको कल्पके आरम्भमें स्वयम्भू ब्रह्माके आदेशसे महर्षियोंने तपस्याद्वारा सबसे पहले उपलब्ध किया था
ਯੁਗ ਦੇ ਅੰਤ ਵਿੱਚ ਜਦੋਂ ਵੇਦ ਅਤੇ ਇਤਿਹਾਸ ਲੁਕ ਗਏ ਸਨ, ਤਦੋਂ ਸਵਯੰਭੂ ਬ੍ਰਹਮਾ ਦੀ ਆਗਿਆ ਲੈ ਕੇ ਮਹਰਿਸ਼ੀਆਂ ਨੇ ਨਵੇਂ ਕਲਪ ਦੇ ਆਰੰਭ ਵਿੱਚ ਤਪੱਸਿਆ ਦੇ ਬਲ ਨਾਲ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਮੁੜ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤਾ।
Verse 20
वेदविद् वेद भगवान् वेदाड़नि बृहस्पति: । भार्गवो नीतिशास्त्रं तु जगाद जगतो हितम्,उस समय स्वयं भगवान् ब्रह्माको वेदोंका, बृहस्पतिजीको वेदांगोंका और शुक्राचार्यको नीति-शास्त्रका ज्ञान हुआ तथा उन लोगोंने जगत्के हितके लिये उन सब विषयोंका उपदेश किया
ਉਸ ਵੇਲੇ ਵੇਦ-ਵਿਦ ਭਗਵਾਨ ਬ੍ਰਹਮਾ ਨੇ ਵੇਦਾਂ ਦਾ, ਬ੍ਰਿਹਸਪਤੀ ਨੇ ਵੇਦਾਂਗਾਂ ਦਾ ਅਤੇ ਭਾਰਗਵ (ਸ਼ੁਕ੍ਰਾਚਾਰਯ) ਨੇ ਨੀਤੀ-ਸ਼ਾਸਤਰ ਦਾ ਉਪਦੇਸ਼ ਕੀਤਾ—ਇਹ ਸਭ ਜਗਤ ਦੇ ਹਿਤ ਲਈ ਸੀ।
Verse 21
गान्धर्व नारदो वेद भरद्वाजो धर्नुग्रहम् । देवर्षिचरितं गार्ग्य: कृष्णात्रेयश्विकित्सितम्,नारदजीको गान्धर्व वेदका, भरद्वाजको धरनुर्वेदका, महर्षि गार्ग्यको देवर्षियोंके चरित्रका तथा कृष्णात्रेयको चिकित्साशास्त्रका ज्ञान हुआ
ਨਾਰਦ ਨੇ ਗਾਂਧਰਵ ਵੇਦ, ਭਰਦਵਾਜ ਨੇ ਧਨੁਰਵੇਦ, ਗਾਰਗ੍ਯ ਰਿਸ਼ੀ ਨੇ ਦੇਵਰਿਸ਼ੀਆਂ ਦੇ ਚਰਿਤ੍ਰ, ਅਤੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਣਾਤ੍ਰੇਯ ਨੇ ਚਿਕਿਤਸਾ-ਸ਼ਾਸਤਰ ਦਾ ਗਿਆਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤਾ।
Verse 22
न्यायतन्त्राण्यनेकानि तैस्तैरुक्तानि वादिभि: । हेत्वागमसदाचारैर्यदुक्ते तदुपास्यताम्,तर्कशील दिद्वानोंने तर्कशास्त्रके अनेक ग्रन्थोंका प्रणणयन किया। उन महर्षियोंने युक्तियुक्त शास्त्र और सदाचारके द्वारा जिस ब्रह्मका उपदेश किया है, उसीकी तुम भी उपासना करो
ਵਾਦੀਆਂ ਨੇ ਨਿਆਇ-ਤર્ક ਦੇ ਅਨੇਕ ਤੰਤਰ ਪ੍ਰਸਤਾਵਿਤ ਕੀਤੇ ਹਨ; ਪਰ ਹੇਤੁ, ਆਗਮ ਅਤੇ ਸਦਾਚਾਰ ਰਾਹੀਂ ਮਹਰਿਸ਼ੀਆਂ ਨੇ ਜਿਸ ਪਰਮ ਤੱਤ ਦਾ ਉਪਦੇਸ਼ ਕੀਤਾ ਹੈ—ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਉਸੇ ਨੂੰ ਉਪਾਸ੍ਯ ਮੰਨ ਕੇ ਧਾਰੋ।
Verse 23
अनाट्य॑ तत्परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः । एकस्तदू वेद भगवान् धाता नारायण: प्रभु:,वह परब्रह्म अनादि और सबसे परे है। उसे न देवता जानते हैं न ऋषि। उसे तो एकमात्र जगत्पालक नारायण ही जानते हैं
ਉਹ ਪਰਬ੍ਰਹਮ ਅਨਾਦਿ ਅਤੇ ਸਭ ਤੋਂ ਪਰੇ ਹੈ; ਉਸ ਨੂੰ ਨਾ ਦੇਵਤੇ ਜਾਣਦੇ ਹਨ, ਨਾ ਰਿਸ਼ੀ। ਜਗਤ ਦੇ ਧਾਤਾ-ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਰਾਇਣ ਹੀ ਇਕਮਾਤ੍ਰ ਉਸ ਨੂੰ ਯਥਾਰਥ ਜਾਣਦੇ ਹਨ।
Verse 24
नारायणादृषिगणास्तथा मुख्या: सुरासुरा: । राजर्षय: पुराणाश्न परमं दुःखभेषजम्,नारायणसे ही ऋषियों, मुख्य-मुख्य देवताओं, असुरों तथा प्राचीन राजर्षियोंने उस ब्रह्मको जाना है; वह ब्रह्म-ज्ञान ही समस्त दुःखोंका परम औषध है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਨਾਰਾਇਣ ਤੋਂ ਹੀ ਰਿਸ਼ੀ-ਗਣ, ਦੇਵਾਂ ਅਤੇ ਅਸੁਰਾਂ ਵਿਚੋਂ ਜੋ ਪ੍ਰਧਾਨ ਹਨ, ਅਤੇ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਰਾਜਰਿਸ਼ੀਆਂ ਨੇ ਉਸ ਪਰਮ ਦੁੱਖ-ਭੇਸ਼ਜ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ ਹੈ। ਉਹੀ ਪਰਮ ਬ੍ਰਹਮ-ਜ੍ਞਾਨ ਸਭ ਦੁੱਖਾਂ ਦਾ ਅੰਤਿਮ ਔਖਧ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ।
Verse 25
पुरुषाधिछितान् भावान् प्रकृति: सूयते यदा । हेतुयुक्तमत: पूर्व जगत् सम्परिवर्तते,पुरुषद्वारा संकल्पमें लाये गये विविध पदार्थोकी रचना प्रकृति ही करती है। इस प्रकृतिसे सर्वप्रथम कारणसहित जगत् उत्पन्न होता है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਦੋਂ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ ਪੁਰੁਸ਼ ਦੇ ਅਧਿਸ਼ਠਾਨ ਹੇਠਾਂ ਰਹਿੰਦੀਆਂ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਅਵਸਥਾਵਾਂ ਅਤੇ ਰੂਪਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਦੀ ਹੈ, ਤਦ ਪੁਰੁਸ਼ ਦੇ ਸੰਕਲਪ ਰਾਹੀਂ ਕਲਪਿਤ ਅਨੇਕ ਪਦਾਰਥਾਂ ਦੀ ਰਚਨਾ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ ਹੀ ਕਰਦੀ ਹੈ। ਇਸੀ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ ਤੋਂ ਕਾਰਣ-ਕ੍ਰਮ ਸਮੇਤ ਪਹਿਲਾਂ ਜਗਤ ਉਤਪੰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ; ਫਿਰ ਵਿਸ਼ਵ ਚੱਕਰਵਤ ਪਰਿਵਰਤਿਤ ਹੁੰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ।
Verse 26
दीपादन्ये यथा दीपा: प्रवर्तन्ते सहस्रश: । प्रकृति: सूयते तद्धदानन्त्यान् नापचीयते
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਿਵੇਂ ਇੱਕ ਦੀਵੇ ਤੋਂ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਦੀਵੇ ਜਲ ਉੱਠਦੇ ਹਨ, ਤਿਵੇਂ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ ਨਿਰੰਤਰ ਅਨੇਕ ਰੂਪ ਉਤਪੰਨ ਕਰਦੀ ਹੈ; ਪਰ ਇਸ ਅਨੰਤ ਬਹੁਤਾਈ ਨੂੰ ਜਨਮ ਦੇਂਦਿਆਂ ਵੀ ਉਹ ਘਟਦੀ ਨਹੀਂ।
Verse 27
जैसे एक दीपकसे दूसरे सहस्रों दीप जला लिये जाते हैं और पहले दीपकको कोई हानि नहीं होती, उसी प्रकार एक प्रकृति ही असंख्य पदार्थोंको उत्पन्न करती है और अनन्त होनेके कारण उसका क्षय नहीं होता ।। अव्यक्तकर्मजा बुद्धिरहंकारं प्रसूयते । आकाशं चाप्यहंकाराद् वायुराकाशसम्भव:,अव्यक्त प्रकृतिमें क्षोभ होनेपर जिस बुद्धि (महत्तत्त्व) की उत्पत्ति होती है, वह बुद्धि अहंकारको जन्म देती है। अहंकारसे आकाश और आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਿਵੇਂ ਇੱਕ ਦੀਵੇ ਤੋਂ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਦੀਵੇ ਜਲਾ ਲਏ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਪਹਿਲੇ ਦੀਵੇ ਨੂੰ ਕੋਈ ਹਾਨੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ, ਤਿਵੇਂ ਇੱਕ ਹੀ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ ਅਣਗਿਣਤ ਤੱਤ ਉਤਪੰਨ ਕਰਦੀ ਹੈ; ਅਤੇ ਅਨੰਤ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਉਹ ਘਟਦੀ ਨਹੀਂ। ਜਦੋਂ ਅਵ੍ਯਕਤ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ ਵਿੱਚ ਖਲਬਲੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਤਦ ਬੁੱਧੀ (ਮਹੱਤੱਤਵ) ਉਤਪੰਨ ਹੁੰਦੀ ਹੈ; ਉਸ ਬੁੱਧੀ ਤੋਂ ਅਹੰਕਾਰ ਜਨਮ ਲੈਂਦਾ ਹੈ। ਅਹੰਕਾਰ ਤੋਂ ਆਕਾਸ਼ ਅਤੇ ਆਕਾਸ਼ ਤੋਂ ਵਾਯੂ ਉਤਪੰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।
Verse 28
वायोस्तेजस्ततश्चाप अद्भ्योडथ वसुधोद्गता । मूलप्रकृतयो हराष्टी जगदेतास्ववस्थितम्,वायुसे अग्निकी, अग्निसे जलकी और जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार ये आठ मूल-प्रकृतियाँ बतायी गयी हैं। इन्हींमें सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है
ਵਾਯੂ ਤੋਂ ਤੇਜ (ਅਗਨੀ), ਤੇਜ ਤੋਂ ਆਪः (ਜਲ), ਅਤੇ ਜਲ ਤੋਂ ਵਸੁਧਾ (ਪ੍ਰਿਥਵੀ) ਉਤਪੰਨ ਹੋਈ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅੱਠ ਮੂਲ-ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀਆਂ ਦੱਸੀਆਂ ਗਈਆਂ ਹਨ; ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਹੀ ਸਾਰਾ ਜਗਤ ਟਿਕਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ।
Verse 29
ज्ञानेन्द्रियाण्यत: पठच पज््च कर्मेन्द्रियाण्यपि । विषया: पञ्च चैकं॑ च विकारे षोडशं मन:,पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच विषय और एक मन--ये सोलह विकार कहे गये हैं। (इनमें मन तो अहंकारका विकार है और अन्य पन्द्रह अपने-अपने कारणरूप सूक्ष्म महाभूतोंके विकार हैं)
ਇਸ ਤੋਂ ਅਗੇ ਪੰਜ ਗਿਆਨ-ਇੰਦ੍ਰੀਆਂ ਅਤੇ ਪੰਜ ਕਰਮ-ਇੰਦ੍ਰੀਆਂ ਹਨ। ਪੰਜ ਵਿਸ਼ੇ ਅਤੇ ਇੱਕ ਮਨ—ਇਹ ਸੋਲ੍ਹਾਂ ਵਿਕਾਰ ਕਹੇ ਗਏ ਹਨ। ਜੋ ਦੇਹ-ਅਨੁਭਵ ਦੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਅੰਗਾਂ ਨੂੰ ਯਥਾਰਥ ਜਾਣ ਲੈਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਬਦਲਦੇ ਗ੍ਰਹਿਣ-ਕਰਮ ਦੇ ਸਾਧਨਾਂ ਤੋਂ ਵੱਖ ਕਰ ਕੇ ਸੰਯਮ ਅਤੇ ਸਦਾਚਾਰ ਵਿੱਚ ਟਿਕਦਾ ਹੈ।
Verse 30
श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिद्ना प्राणं ज्ञानेन्द्रियाण्यथ । पादौ पायुरुपस्थश्न हस्तौ वाक्कर्मणी अपि,श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्ला और नासिका--ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ (लिंग) और वाक्ू--ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं
ਕੰਨ, ਚਮੜੀ, ਅੱਖਾਂ, ਜੀਭ ਅਤੇ ਨੱਕ—ਇਹ ਪੰਜ ਗਿਆਨ-ਇੰਦ੍ਰੀਆਂ ਹਨ। ਹੱਥ, ਪੈਰ, ਗੁਦਾ, ਉਪਸਥ ਅਤੇ ਬਾਣੀ—ਇਹ ਪੰਜ ਕਰਮ-ਇੰਦ੍ਰੀਆਂ ਹਨ।
Verse 31
शब्द: स्पर्शक्ष रूपं च रसो गन्धस्तथैव च । विज्ञेयं व्यापकं चित्तं तेषु सर्वगतं मन:,शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--ये पाँच विषय हैं तथा इनमें व्यापक जो चित्त है, उसीको मन समझना चाहिये। मन सर्वगत कहा गया है
ਸ਼ਬਦ, ਸਪਰਸ਼, ਰੂਪ, ਰਸ ਅਤੇ ਗੰਧ—ਇਹ ਪੰਜ ਵਿਸ਼ੇ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਜੋ ਚਿੱਤ ਵਿਆਪਕ ਹੈ, ਉਸੇ ਨੂੰ ਮਨ ਜਾਣੋ; ਮਨ ਨੂੰ ਸਰਬਗਤ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਸਭ ਇੰਦ੍ਰੀ-ਖੇਤਰਾਂ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਵਿਰਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।
Verse 32
रसज्ञाने तु जिद्देयं व्याहृते वाक् तथोच्यते । इन्द्रियैविविधैर्युक्त सर्व व्यक्त मनस्तथा
ਰਸ ਦੇ ਗਿਆਨ ਵੇਲੇ ਉਹੀ ਮਨ ਜੀਭ-ਰੂਪ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ; ਅਤੇ ਜਦੋਂ ਉਹ ਉਚਾਰਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਹੀ ਵਾਕ (ਬਾਣੀ) ਕਹਲਾਂਦਾ ਹੈ। ਵੱਖ-ਵੱਖ ਇੰਦ੍ਰੀਆਂ ਨਾਲ ਜੁੜ ਕੇ ਜੋ ਕੁਝ ਵੀ ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਮਨ ਦੇ ਸੰਯੋਗ ਨਾਲ ਹੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।
Verse 33
रस-ज्ञानके समय मन ही यह रसना (जिह्ला)-रूप हो जाता है तथा बोलनेके समय वह मन ही वागिन्द्रिय कहलाता है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंके साथ मिलकर उन सबके रूपमें मन ही व्यका होता है ।। विद्यात् तु षोडशैतानि दैवतानि विभागश: । देहेषु ज्ञानकर्तारमुपासीनमुपासते,दस इन्द्रिय, पञजच महाभूत और एक मन--ये सोलह तत्त्व इस शरीरमें विभागपूर्वक रहते हैं। इनको देवतारूप जानना चाहिये। शरीरके भीतर जो ज्ञान प्रकट करनेवाला परमात्माके निकटस्थ जीवात्मा है, उसकी ये सोलहों देवता उपासना करते हैं
ਰਸ ਦੇ ਗਿਆਨ ਵੇਲੇ ਮਨ ਹੀ ਜੀਭ-ਰੂਪ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਬੋਲਣ ਵੇਲੇ ਉਹੀ ਮਨ ਵਾਗ-ਇੰਦ੍ਰੀ ਕਹਲਾਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਇੰਦ੍ਰੀਆਂ ਨਾਲ ਮਿਲ ਕੇ ਮਨ ਹੀ ਉਹਨਾਂ ਸਭ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਅਤੇ ਜਾਣੋ—ਇਹ ਸੋਲ੍ਹਾਂ ਤੱਤ ਭਾਗਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਦੇਵਤਾ-ਰੂਪ ਹਨ; ਉਹ ਦੇਹ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ-ਆਪਣੇ ਅੰਗਾਂ ਵਿੱਚ ਟਿਕੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਦੇਹ ਅੰਦਰ ਗਿਆਨ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਨ ਵਾਲੇ—ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਿਕਟ—ਅੰਦਰਲੇ ਜ্ঞਾਤਾ ਜੀਵਾਤਮਾ ਦੀ ਉਪਾਸਨਾ ਕਰਦੇ ਹਨ।
Verse 34
तद्धत् सोमगुणा जिद्ना गन्धस्तु पृथिवीगुण: । श्रोत्रं नभोगुणं चैव चक्षुरग्नेर्गुणस्तथा । स्पर्श वायुगुणं विद्यात् सर्वभूतेषु सर्वदा,जिह्ना जलका कार्य है, प्राणेन्द्रिय पृथ्वीका कार्य है, श्रवणेन्द्रिय आकाशका और नेत्रेन्द्रिय अग्निका कार्य है तथा सम्पूर्ण भूतोंमें त्वचा नामकी इन्द्रियको सदा वायुका कार्य समझना चाहिये
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਿਹਵਾ ਨੂੰ ਸੋਮ-ਗੁਣ (ਰਸ) ਨਾਲ ਯੁਕਤ ਸਮਝੋ; ਗੰਧ ਧਰਤੀ ਦਾ ਗੁਣ ਹੈ। ਸੁਣਨਾ ਆਕਾਸ਼ ਦਾ ਗੁਣ ਹੈ ਅਤੇ ਵੇਖਣਾ ਅੱਗ ਦਾ ਗੁਣ ਹੈ। ਅਤੇ ਛੂਹ ਸਦਾ ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਵਿੱਚ ਵਾਯੂ ਦਾ ਗੁਣ ਜਾਣੋ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇੰਦ੍ਰੀਆਂ ਭੂਤ-ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਆਸਰੇ ਆਪਣਾ-ਆਪਣਾ ਕੰਮ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ।
Verse 35
मन: सत्त्वगुणं प्राहु: सत्त्वमव्यक्तजं तथा । सर्वभूतात्मभूतस्थं तस्माद् बुद्धोत बुद्धिमान्,मनको महत्तत्त्वका कार्य कहा है और महत्तत्त्वको अव्यक्त प्रकृतिका कार्य कहा है। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह समस्त भूतोंके आत्मारूप परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें स्थित जाने
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਮਨ ਨੂੰ ਸੱਤਵ-ਗੁਣਮਯ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ ਅਤੇ ਸੱਤਵ ਨੂੰ ਵੀ ਅਵ੍ਯਕਤ (ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ) ਤੋਂ ਉਤਪੰਨ ਦੱਸਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਜਾਗ੍ਰਤ ਤੇ ਵਿਵੇਕੀ ਪੁਰਖ ਨੂੰ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਸਭ ਭੂਤਾਂ ਦੇ ਆਤਮਾ-ਸਰੂਪ ਪਰਮੇਸ਼ਵਰ ਨੂੰ ਸਭ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਵਿੱਚ ਵੱਸਦਾ ਜਾਣੇ।
Verse 36
एते भावा जगत् सर्व वहन्ति सचराचरम् | श्रिता विरजसं देव॑ यमाहु: प्रकृतेः परम्
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਇਹ ਭਾਵ ਅਤੇ ਤੱਤ ਸਾਰੇ ਜਗਤ—ਚਰ ਤੇ ਅਚਰ—ਨੂੰ ਧਾਰਨ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਸਭ ਉਸ ਨਿਰਮਲ, ਰਜੋ-ਰਹਿਤ ਦੇਵ ਦੇ ਆਸਰੇ ਹਨ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਗਿਆਨੀ ਜਨ ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ ਤੋਂ ਪਰੇ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ।
Verse 37
इस प्रकार ये सम्पूर्ण पदार्थ समस्त चराचर जगत्का भार वहन करते हैं। ये सब जो प्रकृतिसे अतीत रजोगुणरहित हैं, उस परमदेव परमात्माके आश्रित हैं ।। नदद्वारं पुरं पुण्यमेतैर्भावै: समन्वितम् । व्याप्य शेते महानात्मा तस्मात् पुरुष उच्यते,इन्हीं चौबीस पदार्थोंसे सम्पन्न इस नौ द्वारोंवाले पवित्र पुर (शरीर)-को व्याप्त करके इसमें इन सबसे जो महान् है वह आत्मा शयन करता है; इसलिये उसे “पुरुष” कहते हैं
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਇਹ ਨੌਂ ਦਰਵਾਜ਼ਿਆਂ ਵਾਲਾ ਪਵਿੱਤਰ ‘ਪੁਰ’ (ਸ਼ਰੀਰ) ਇਨ੍ਹਾਂ ਤੱਤਾਂ ਨਾਲ ਸੰਯੁਕਤ ਹੈ। ਇਸ ਨੂੰ ਅੰਦਰੋਂ ਵਿਆਪ ਕੇ ਮਹਾਨ ਆਤਮਾ ਇਸ ਵਿੱਚ ਵੱਸਦਾ ਹੈ; ਇਸ ਲਈ ਉਹ ‘ਪੁਰੁਸ਼’ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ—ਜੋ ਪੁਰ ਵਿੱਚ ਨਿਵਾਸ ਕਰੇ।
Verse 38
अजर: सो<मरश्वैव व्यक्ताव्यक्तोपदेशवान् | व्यापक: सगुण: सूक्ष्म: सर्वभूतगुणाश्रय:,वह पुरुष जरा-मरणसे रहित, व्यापक, समस्त स्थूल-सूक्ष्म तत्त्वोंका प्रेरक, सर्वज्ञत्व आदि गुणोंसे युक्त, सूक्ष्म तथा सम्पूर्ण भूतों और उनके गुणोंका आश्रय है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਉਹ ਪਰਮ ਪੁਰੁਸ਼ ਅਜਰ ਤੇ ਅਮਰ ਹੈ। ਉਹ ਵਿਅਕਤ ਅਤੇ ਅਵ੍ਯਕਤ—ਦੋਹਾਂ ਦਾ ਉਪਦੇਸ਼ ਦੇਣ ਵਾਲਾ; ਸਰਬ-ਵਿਆਪਕ; ਗੁਣਾਂ ਨਾਲ ਯੁਕਤ ਹੋ ਕੇ ਵੀ ਸੂਖਮ; ਅਤੇ ਸਭ ਭੂਤਾਂ ਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਗੁਣਾਂ ਦਾ ਆਸਰਾ ਹੈ।
Verse 39
यथा दीप: प्रकाशात्मा हस्वो वा यदि वा महान् | ज्ञानात्मानं तथा विद्यात् पुरुष सर्वजन्तुषु,जैसे दीपक छोटा हो या बड़ा, प्रकाशस्वरूप ही है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंमें स्थित जीवात्मा ज्ञानस्वरूप है, ऐसा समझे
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਿਵੇਂ ਦੀਵਾ ਛੋਟਾ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਵੱਡਾ, ਉਹ ਆਪਣੇ ਸੁਭਾਵ ਕਰਕੇ ਹੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼-ਸਰੂਪ ਹੈ; ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਸਭ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਵਿੱਚ ਵੱਸਦੀ ਅੰਤਰਾਤਮਾ ਗਿਆਨ-ਸਰੂਪ (ਚੇਤਨਾ) ਹੈ—ਇਉਂ ਸਮਝਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।
Verse 40
श्रोत्रं वेदयते वेद्यं स शृणोति स पश्यति । कारणं तस्य देहो5यं स कर्ता सर्वकर्मणाम्,वही श्रवणेन्द्रियको उसके ज्ञेयभूत शब्दका बोध कराता है। तात्पर्य यह कि श्रवण और नेत्रोंद्राय वही सुनता और देखता है। यह शरीर उसके शब्द आदि विषयोंके अनुभवमें निमित्त है। वह जीवात्मा ही समस्त कर्मोका कर्ता है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਕੰਨ ਜਾਨਣਯੋਗ ਸ਼ਬਦ ਦਾ ਬੋਧ ਕਰਾਂਦਾ ਹੈ; ਪਰ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਸੁਣਦਾ ਉਹ ਅੰਤਰਾਤਮਾ ਹੀ ਹੈ, ਵੇਖਦਾ ਵੀ ਉਹੀ ਹੈ। ਇਹ ਦੇਹ ਸ਼ਬਦ ਆਦਿ ਵਿਸ਼ਿਆਂ ਦੇ ਅਨੁਭਵ ਲਈ ਕੇਵਲ ਨਿਮਿੱਤ-ਕਾਰਣ ਹੈ। ਉਹੀ ਜੀਵਾਤਮਾ ਸਭ ਕਰਮਾਂ ਦਾ ਕਰਤਾ ਹੈ।
Verse 41
अग्निदरिंगतो यद्वद् भिन्ने दारौ न दृश्यते । तथैवात्मा शरीरस्थो योगेनैवानुदृश्यते,जिस प्रकार अग्नि काष्ठमें व्याप्त रहनेपर भी काष्ठके चीरनेपर भी उसमें दिखायी नहीं देती, उसी प्रकार आत्मा शरीरमें रहता है, परंतु दिखायी नहीं देता--योगसे ही उसका दर्शन होता है। जैसे मन्थन आदि उपायोंद्वारा काष्ठको मथकर उनमें अग्निको प्रत्यक्ष किया जाता है, उसी प्रकार योगके द्वारा शरीरस्थ आत्माका साक्षात्कार किया जा सकता है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਿਵੇਂ ਅੱਗ ਲੱਕੜ ਵਿੱਚ ਵਿਆਪਕ ਹੋ ਕੇ ਵੀ ਲੱਕੜ ਚੀਰਨ ਨਾਲ ਦਿਸਦੀ ਨਹੀਂ, ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਆਤਮਾ ਦੇਹ ਵਿੱਚ ਵੱਸਦਾ ਹੋਇਆ ਵੀ ਪ੍ਰਤੱਖ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ; ਯੋਗ ਰਾਹੀਂ ਹੀ ਉਸ ਦਾ ਅਨੁਭਵ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।
Verse 42
अग्निर्यथा हुपायेन मथित्वा दारु दृश्यते । तथैवात्मा शरीरस्थो योगेनैवात्र दृश्यते,जिस प्रकार अग्नि काष्ठमें व्याप्त रहनेपर भी काष्ठके चीरनेपर भी उसमें दिखायी नहीं देती, उसी प्रकार आत्मा शरीरमें रहता है, परंतु दिखायी नहीं देता--योगसे ही उसका दर्शन होता है। जैसे मन्थन आदि उपायोंद्वारा काष्ठको मथकर उनमें अग्निको प्रत्यक्ष किया जाता है, उसी प्रकार योगके द्वारा शरीरस्थ आत्माका साक्षात्कार किया जा सकता है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਿਵੇਂ ਢੁੱਕਵੇਂ ਢੰਗ ਨਾਲ ਲੱਕੜ ਨੂੰ ਮਥਣ ਨਾਲ ਉਸ ਵਿੱਚ ਵੱਸਦੀ ਅੱਗ ਪ੍ਰਗਟ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਦੇਹ ਵਿੱਚ ਵੱਸਦਾ ਆਤਮਾ ਇੱਥੇ ਕੇਵਲ ਯੋਗ ਰਾਹੀਂ ਹੀ ਪ੍ਰਤੱਖ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।
Verse 43
नदीष्वापो यथा युक्ता यथा सूर्ये मरीचय: । संततत्वाद् यथा यान्ति तथा देहा: शरीरिणाम्,जैसे नदियोंमें जल रहता ही है और सूर्यमें किरणें भी रहती ही हैं तथा वे जल और किरणें नदी और सूर्यसे नित्य सम्बद्ध होनेके कारण उनके साथ-साथ जाती हैं, उसी प्रकार देहधारियोंके सूक्ष्म शरीर भी जीवात्माके साथ ही रहते हैं और उसे साथ लेकर ही आते- जाते हैं
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਿਵੇਂ ਨਦੀਆਂ ਨਾਲ ਪਾਣੀ ਅਤੇ ਸੂਰਜ ਨਾਲ ਕਿਰਣਾਂ ਅਟੁੱਟ ਤੌਰ ਤੇ ਜੁੜੀਆਂ ਰਹਿੰਦੀਆਂ ਹਨ ਅਤੇ ਉਸ ਲਗਾਤਾਰ ਸੰਬੰਧ ਕਰਕੇ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਚਲਦੀਆਂ ਹਨ; ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਦੇਹਧਾਰੀਆਂ ਦੇ ਸੁਖਮ ਦੇਹ ਜੀਵਾਤਮਾ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਰਹਿ ਕੇ ਉਸ ਦੇ ਆਉਣ-ਜਾਣ ਵਿੱਚ ਸਾਥ ਨਿਭਾਉਂਦੇ ਹਨ।
Verse 44
स्वप्नयोगे यथैवात्मा पज्चेन्द्रियसमायुत: । देहमुत्सज्य वै याति तथैवात्मोपलभ्यते,जैसे स्वप्नमें पाँच ज्ञानेन्द्रियोंसहित जीवात्मा इस शरीरको छोड़कर अन्यत्र चला जाता है, वैसे ही मृत्युके बाद भी वह इस शरीरको छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण कर लेता है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਿਵੇਂ ਸੁਪਨੇ ਦੀ ਅਵਸਥਾ ਵਿੱਚ ਪੰਜ ਇੰਦ੍ਰੀਆਂ ਸਮੇਤ ਆਤਮਾ ਇਸ ਦੇਹ ਨੂੰ ਛੱਡ ਕੇ ਮਾਨੋ ਹੋਰ ਥਾਂ ਚਲੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਮੌਤ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਆਤਮਾ ਇਸ ਸਰੀਰ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ ਦੂਜਾ ਸਰੀਰ ਧਾਰਨ ਕਰਦੀ ਹੈ—ਇਉਂ ਸਮਝਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।
Verse 45
कर्मणा बाध्यते रूपं कर्मणा चोपलभ्यते । कर्मणा नीयते<न्यत्र स्वकृतेन बलीयसा,कर्मके द्वारा ही इस देहका बाध होता है; कर्मसे ही अन्य देहकी उपलब्धि होती है तथा अपने किये हुए प्रबल कर्मके द्वारा ही वह अन्य शरीरमें ले जाया जाता है
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਕਰਮ ਨਾਲ ਹੀ ਦੇਹ ਦਾ ਰੂਪ ਬੱਝਦਾ ਤੇ ਘੜਦਾ ਹੈ; ਕਰਮ ਨਾਲ ਹੀ ਦੂਜਾ ਸਰੀਰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਹੀ ਪ੍ਰਬਲ ਕੀਤੇ ਕਰਮਾਂ ਦੇ ਬਲ ਨਾਲ ਜੀਵ ਹੋਰ ਥਾਂ—ਉਸ ਦੂਜੇ ਸਰੀਰ ਵਿੱਚ—ਲਿਜਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।
Verse 46
स तु देहाद् यथा देहं त्यक्त्वान्यं प्रतिपद्यते । तथान्यं सम्प्रवक्ष्यामि भूतग्रामं स्वकर्मजम्,वह जीवात्मा जिस प्रकार एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण करता है तथा अपने कर्मोसे उत्पन्न हुआ प्राणिसमुदाय जिस प्रकार अन्य देह धारण करता है, वह सब मैं तुम्हें बतलाता हूँ
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਿਵੇਂ ਦੇਹਧਾਰੀ ਆਤਮਾ ਇੱਕ ਸਰੀਰ ਛੱਡ ਕੇ ਦੂਜਾ ਸਰੀਰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦੀ ਹੈ, ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਸਮਝਾਵਾਂਗਾ ਕਿ ਆਪਣੇ ਕਰਮਾਂ ਤੋਂ ਉਤਪੰਨ ਜੀਵਾਂ ਦਾ ਸਮੂਹ ਕਿਵੇਂ ਹੋਰ ਦੇਹ ਧਾਰਨ ਕਰਦਾ ਹੈ।
Verse 136
त्रैलोक्यं सर्वभूतेशे चक्रवत्परिवर्तते । तुम भी यह सब सुननेके योग्य अधिकारी हो; अतः भगवान् श्रीकृष्णका जो कल्याणमय उत्कृष्ट माहात्म्य है, उसे सुनो। यह जो सृष्टि-प्रलयरूप अनादि, अनन्त कालचक्र है, वह श्रीकृष्णका ही स्वरूप है। सर्वभूतेश्वर श्रीकृष्णमें ये तीनों लोक चक्रकी भाँति घूम रहे हैं
ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਤੂੰ ਇਹ ਸਭ ਸੁਣਨ ਦੇ ਯੋਗ ਹੈਂ; ਇਸ ਲਈ ਭਗਵਾਨ ਸ਼੍ਰੀਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਦੀ ਮੰਗਲਮਈ, ਸਰਵੋਤਕ੍ਰਿਸ਼ਟ ਮਹਿਮਾ ਸੁਣ। ਸ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਅਤੇ ਪ੍ਰਲਯ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਗਟ ਇਹ ਅਨਾਦਿ-ਅਨੰਤ ਕਾਲਚੱਕਰ ਉਸੇ ਦਾ ਸਵਰੂਪ ਹੈ; ਅਤੇ ਸਰਵਭੂਤੇਸ਼ਵਰ ਸ਼੍ਰੀਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਵਿੱਚ ਇਹ ਤਿੰਨੇ ਲੋਕ ਚੱਕਰ ਵਾਂਗ ਨਿਰੰਤਰ ਘੁੰਮਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ।
Verse 230
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेया ध्यात्मक थने दशाधिकद्वधिशततमो<ध्याय:
ਇਸ ਪ੍ਰਕਾਰ ਸ਼੍ਰੀਮਹਾਭਾਰਤ ਦੇ ਸ਼ਾਂਤਿਪਰਵ ਦੇ ਮੋક્ષਧਰਮਪਰਵ ਵਿੱਚ, ਵਾਰ্ষਣੇਯ-ਸੰਬੰਧੀ ਅਧਿਆਤਮ-ਸਥਾਨ ਅੰਦਰ, ਦੋ ਸੌ ਦਸਵਾਂ ਅਧਿਆਇ ਸਮਾਪਤ ਹੋਇਆ।
The chapter foregrounds the choice between pravṛtti (continuing action-identity that tends toward recurrence) and nivṛtti (withdrawal from craving and misidentification), presenting the latter as the ethically and soteriologically superior trajectory.
Correct discrimination—knowing prakṛti and its modifications, and recognizing puruṣa/kṣetrajña as the non-guṇic witness—combined with disciplined tapas and dispassion, removes confusion at life’s end and supports liberation.
Yes: it states that knowing the fourfold analytic and maintaining accurate self-understanding prevents delusion at the end of life, and it frames Nārāyaṇa’s instruction as ‘amṛta’ given compassionately for the welfare of beings.