Kṛṣṇa-vīrya-kathana
Dhṛtarāṣṭra’s appraisal of Vāsudeva’s deeds
य इमां पृथिवीं कृत्स्नां चर्मवत् समवेष्टयत् । महता रथघोषेण मुख्यारिघ्नो महारथ:,जैसे चमड़ेको अंगोमें लपेट लिया जाता है, उसी प्रकार जिन्होंने अपने रथके महान् घोषद्वारा इस सारी पृथ्वीको व्याप्त कर लिया था, जो प्रधान-प्रधान शत्रुओंका वध करनेवाले और महारथी वीर थे, जिन्होंने प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करते हुए सुन्दर अन्न, पान तथा प्रचुर दक्षिणासे युक्त एवं विघ्नरहित दस अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया और कितने ही सर्वमेध-यज्ञ सम्पन्न किये, वे राजा उशीनरके वीर पुत्र सर्वत्र विख्यात हैं, गंगाजीके स्रोतमें जितने सिकताकण बहते हैं, उतनी ही अर्थात् असंख्य गौएँ उशीनरकुमारने अपने यज्ञमें ब्राह्मणोंको दी थीं
ya imāṁ pṛthivīṁ kṛtsnāṁ carmavat samaveṣṭayat | mahatā rathaghoṣeṇa mukhyārighno mahārathaḥ ||
ਵੈਸ਼ੰਪਾਯਨ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਜਿਸ ਮਹਾਰਥੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਰਥ ਦੇ ਮਹਾਨ ਘੋਸ਼ ਨਾਲ, ਜਿਵੇਂ ਚਮੜਾ ਲਪੇਟ ਲੈਂਦਾ ਹੈ, ਇਸ ਸਾਰੀ ਧਰਤੀ ਨੂੰ ਘੇਰ ਲਿਆ ਸੀ—ਉਹ ਮੁੱਖ ਵੈਰੀਆਂ ਦਾ ਸੰਘਾਰਕ ਕੌਣ ਸੀ?
वैशम्पायन उवाच