Ayodhya KandaPrakarana 920 Verses

Prakarana 9

यह सोपान ‘वैराग्य-प्रवेश’ का द्वार है: राजधर्म/गृहस्थ-व्यवस्था के बीच राम का वनगमन दिखाता है कि मुक्ति-मार्ग में ‘प्रिय’ (सुख, राज्य, लोक-प्रतिष्ठा) का त्याग नहीं, बल्कि ‘धर्म-निष्ठ’ समर्पण प्रधान है। अयोध्या काण्ड में करुण-रस के माध्यम से आसक्ति की जड़ें उजागर होती हैं और भक्त को शिक्षा मिलती है कि प्रेम (प्रेम-भक्ति) शोक में भी भगवान की ओर ले जाने वाली शक्ति है। यह चरण साधक को ‘लोक-बंधन’ से ‘ईश्वर-शरण’ की ओर मोड़ता है—जहाँ राम-चरित स्वयं साधना का अनुशासन बन जाता है।

ଅଯୋଧ୍ୟା କାଣ୍ଡର ପ୍ରଧାନ ରସ କରୁଣ, କିନ୍ତୁ ଏହି କରୁଣା ‘ନିରାଶା’ ନୁହେଁ—ଏହା ବୈରାଗ୍ୟର ସଂସ୍କାର। ପ୍ରସ୍ତୁତ ଅଂଶରେ ରାମଙ୍କ ଲୋକ-ସମୁଦାୟକୁ ବୁଝାଇବା, ଗୁରୁ-ବନ୍ଦନା, ଏବଂ ନଗର-ଜନଙ୍କ ବେକଳ ପ୍ରେମ—ଏ ତିନିଟି ମିଶି ‘ଧର୍ମ ବନାମ ଆସକ୍ତି’ର ତୀବ୍ର ନାଟକୀୟତା ଗଢ଼େ। ତୁଳସୀଙ୍କ ଧର୍ମ-ଦୃଷ୍ଟିରେ ରାମଙ୍କ ବନଗମନ କେବଳ ରାଜନୈତିକ ଘଟଣା ନୁହେଁ, ସାଧକ ଭିତରେ ‘ଅହଂ-ରାଜ୍ୟ’ ଛାଡ଼ିବାର ଦୀକ୍ଷା। ନଗରର ଅନ୍ଧକାର-ରୂପକ (କାଳରାତ୍ରି, ମଶାନ, ଭୂତା) ଦେଖାଏ—ଭଗବାନ-ବିୟୋଗରେ ସଂସାରର ସୌନ୍ଦର୍ୟ କ୍ଷୀଣ ହୋଇଯାଏ; ଅନ୍ୟପଟେ ଗଙ୍ଗା-ଦର୍ଶନ ଓ ନିଷାଦ-ମୈତ୍ରୀ (ଗୁହ) ଭକ୍ତିର ସାମାଜିକ-ସମାବେଶୀ ସ୍ୱରୂପକୁ ପୁଷ୍ଟ କରେ। ଏହିପରି ଏହି କାଣ୍ଡ ମାନସ-ରଚନାରେ ମଧ୍ୟ-ସେତୁ: ବାଳକାଣ୍ଡର ‘ଉତ୍ପତ୍ତି-ଭକ୍ତି’ରୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ି ଏହା ‘ତ୍ୟାଗ-ଭକ୍ତି’ ଓ ‘ଶରଣାଗତି’ର ସିଢ଼ି ହୁଏ, ଯେଉଁଠାରେ ସଗୁଣ ଲୀଳା ଭିତରେ ନିର୍ଗୁଣ ସତ୍ୟ (ତ୍ୟାଗ, ସମତା, କରୁଣା) ପ୍ରକାଶିତ।

Verses

Verse 164 (चौपाई)

निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।। कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।। गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।। जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।। दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी।। सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई।। बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी।। सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी।।

Verse 165 (दोहा/सोरठा)

मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन। सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।

Verse 166 (चौपाई)

एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा। गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई।। राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू।। कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू।। गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे।। रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं। एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।। पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।।

Verse 167 (दोहा/सोरठा)

-सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि। रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि।।81।।

Verse 168 (चौपाई)

जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।। तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।। जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई।। सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू।। पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी।। एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा।। नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा।। अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ।।

Verse 169 (दोहा/सोरठा)

-पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ। गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।82।।

Verse 170 (चौपाई)

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।। चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई।। चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा।। कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं।। लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी।। घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।। घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।। बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं।।

Verse 171 (दोहा/सोरठा)

हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर। पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।83।।

Verse 172 (चौपाई)

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।। नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।। बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही।। सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।। सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं।। जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।। चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।। राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।।

Verse 173 (दोहा/सोरठा)

बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ। तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।84।।

Verse 174 (चौपाई)

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।। करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई।। कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए।। किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे।। सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।। लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई।। जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती।। खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता।।

Verse 175 (दोहा/सोरठा)

राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।। सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।

Verse 176 (चौपाई)

जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।। रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं।। मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।। एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू।। निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना।। जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा।। एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा।। बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।।

Verse 177 (दोहा/सोरठा)

राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि। मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।86।।

Verse 178 (चौपाई)

सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।। उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।। लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।। गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।। कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।। सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।। मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।। सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।

Verse 179 (दोहा/सोरठा)

सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु। चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।87।।

Verse 180 (चौपाई)

यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।। लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिंयँ हरषु अपारा।। करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।। सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।। नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें।। देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा।। कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ।। कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।।

Verse 181 (दोहा/सोरठा)

बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु। ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।

Verse 182 (चौपाई)

राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।। ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।। एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा।। तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना।। लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा।। पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।। गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।। सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी।।

Verse 183 (दोहा/सोरठा)

सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ। सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ।।89।।

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