
रावणान्तःपुरे शयनदर्शनम् (Hanumān Observes Rāvaṇa’s Inner Apartments and Sleeping Court)
सुन्दरकाण्ड
ଏହି ସର୍ଗରେ ହନୁମାନ ଗୁପ୍ତ ନିରୀକ୍ଷକ ଭାବେ ଚଳି ରାବଣଙ୍କ ଅନ୍ତଃପୁରର ଅତ୍ୟନ୍ତ ଐଶ୍ୱର୍ୟମୟ ଶୟନକକ୍ଷକୁ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତି। ସେଠାରେ ସ୍ଫଟିକ ଓ ମଣିଖଚିତ ଶୟ୍ୟା, ସୁବର୍ଣ୍ଣ ସାମଗ୍ରୀ, ମାଳା, ଦୀପ, ସୁଗନ୍ଧ, ଚନ୍ଦନଲେପନ ଆଦିରେ ସଜା ରାଜଭୋଗର ଆଡମ୍ବର—ଯେନ ଆଚାରସଦୃଶ ଉପଚାର—ବର୍ଣ୍ଣିତ ହୁଏ। ତାପରେ ସେ ରାକ୍ଷସରାଜ ରାବଣଙ୍କୁ ନିଦ୍ରାସ୍ଥ ଦେଖନ୍ତି—ମେଘସମ, ସନ୍ଧ୍ୟାରକ୍ତ ଆକାଶରେ ବିଦ୍ୟୁତ୍ ସଦୃଶ, ମନ୍ଦର ପର୍ବତ ସମ, ଏବଂ ଗଙ୍ଗାତଟରେ ଗଜ ପରି—ଏମିତି ଉପମାମାନେ ତାଙ୍କର ଶକ୍ତି, ଭୋଗାସକ୍ତି ଓ ଦେହରେ ଯୁଦ୍ଧଚିହ୍ନକୁ ପ୍ରକାଶ କରେ। ତାଙ୍କର ସର୍ପସଦୃଶ ଶ୍ୱାସ-ପ୍ରଶ୍ୱାସ ଶୁଣି ହନୁମାନ କ୍ଷଣମାତ୍ର ଭୟଭୀତ ହୁଅନ୍ତି, କିନ୍ତୁ ସତ୍ୱରେ ସଂଯମ ଫେରାଇ ଅଧିକ ସତର୍କ ରହନ୍ତି। ପରେ ଅନ୍ତଃପୁରର ନାରୀମାନେ—ନର୍ତ୍ତକୀ, ଗାୟିକା ଓ ପରିଚାରିକା—ବାଦ୍ୟ ଓ ଆଭୂଷଣ ସହ ଉତ୍ସବକ୍ଲାନ୍ତିରେ ଶୋଇଥିବା ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖାଯାଏ। ମନ୍ଦୋଦରୀଙ୍କୁ ଦେଖି ତାଙ୍କର ରୂପ-ଶୃଙ୍ଗାରରେ ସୀତା ବୋଲି ଭ୍ରମ କରି ହନୁମାନ କ୍ଷଣିକ ଆନନ୍ଦ ପାଆନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ଧର୍ମବୁଦ୍ଧିରେ ପରୀକ୍ଷା କରି ସେ ସୀତା ନୁହେଁ ବୋଲି ନିଶ୍ଚୟ କରନ୍ତି। ଏଭଳି ରାଜଭୋଗର ଅତିରେକ ସହ ଅନ୍ୱେଷକର ନୈତିକ ବିବେକକୁ ସମ୍ମୁଖୀନ କରି, ସୁନ୍ଦରକାଣ୍ଡର ଗୁପ୍ତ ଅନ୍ୱେଷଣ-ମୋଟିଫକୁ ଏହି ସର୍ଗ ଆଗେଇ ନେଇଯାଏ।
Verse 1
तत्र दिव्योपमं मुख्यं स्फाटिकं रत्नभूषितम्।अवेक्षमाणो हनुमान् ददर्श शयनासनम्।।।।दान्तकाञ्चनचित्राङ्गैर्वैडूर्यैश्च वरासनैः।महार्हास्तरणोपेतैरुपपन्नं महाधनैः।।।।
ସେଠାରେ ହନୁମାନ ଚାରିଦିଗ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ଏକ ମୁଖ୍ୟ, ଦିବ୍ୟୋପମ ଶୟନାସନ ଦେଖିଲେ—ସ୍ଫଟିକର ତିଆରି, ରତ୍ନଭୂଷିତ; ଦନ୍ତ ଓ କାଞ୍ଚନର ଚିତ୍ରାଙ୍ଗ ସହିତ, ବୈଡୂର୍ୟରେ ଜଡିତ ଉତ୍ତମ ଆସନ; ଅତ୍ୟମୂଲ୍ୟ ତରଣୀ-ଆବରଣରେ ସୁସଜ୍ଜିତ, ମହାଧନକୁ ଯୋଗ୍ୟ।
Verse 2
तत्र दिव्योपमं मुख्यं स्फाटिकं रत्नभूषितम्।अवेक्षमाणो हनुमान् ददर्श शयनासनम्।।5.10.1।।दान्तकाञ्चनचित्राङ्गैर्वैडूर्यैश्च वरासनैः।महार्हास्तरणोपेतैरुपपन्नं महाधनैः।।5.10.2।।
ସେଠାରେ ହନୁମାନ ମହାଧନକୁ ଯୋଗ୍ୟ ଏକ ଉତ୍ତମ ଶୟନ ଦେଖିଲେ—ଦାନ୍ତ ଓ କାଞ୍ଚନରେ ଚିତ୍ରିତ ଆସନ, ବୈଡୂର୍ୟମଣି ଜଡିତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆସନସହ; ମହାର୍ହ ତରଣ ଓ ଆବରଣରେ ସୁସଜ୍ଜିତ।
Verse 3
तस्य चैकतमे देशे सोऽग्य्रमालाविभूषितम्।ददर्श पाण्डुरं छत्रं ताराधिपतिसन्निभम्।।।।
ସେଇ କକ୍ଷର ଏକ ଅଂଶରେ ହନୁମାନ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମାଳାରେ ଅଲଙ୍କୃତ, ତାରାଧିପତି ଚନ୍ଦ୍ର ସଦୃଶ ଦୀପ୍ତିମାନ ଶ୍ୱେତ ଛତ୍ର ଦେଖିଲେ।
Verse 4
जातरूपपरिक्षिप्तं चित्रभानुसमप्रभम्।अशोकमालाविततं ददर्श परमासनम्।।।।वालव्यजनहस्ताभिर्वीज्यमानं समन्ततः।गन्धैश्च विविधैर्जुष्टं वरधूपेन धूपितम्।।।।परमास्तरणास्तीर्णमाविकाजिनसंवृतम्।दामभिर्वरमाल्यानां समन्तादुपशोभितम्।।।।
ସେ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ଆବୃତ, ସୂର୍ଯ୍ୟସମ ଦୀପ୍ତିମାନ ଏବଂ ଅଶୋକପୁଷ୍ପମାଳାରେ ବିସ୍ତୃତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶୟନାସନକୁ ଦେଖିଲେ। ଚାମରଧାରିଣୀ ନାରୀମାନେ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ପଖା ହଲାଉଥିଲେ; ନାନା ସୁଗନ୍ଧରେ ସୁଶୋଭିତ ଓ ଉତ୍ତମ ଧୂପରେ ଧୂପିତ ଥିଲା। ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶୟ୍ୟାବସ୍ତ୍ର ପିଛାଇ, ମୃଦୁ ଉଲ୍ଲ ଚର୍ମରେ ଆବୃତ ଏବଂ ଚାରିପାଖେ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ପୁଷ୍ପମାଳାର ଦାମରେ ଅଲଙ୍କୃତ ଥିଲା।
Verse 5
जातरूपपरिक्षिप्तं चित्रभानुसमप्रभम्।अशोकमालाविततं ददर्श परमासनम्।।5.10.4।।वालव्यजनहस्ताभिर्वीज्यमानं समन्ततः।गन्धैश्च विविधैर्जुष्टं वरधूपेन धूपितम्।।5.10.5।।परमास्तरणास्तीर्णमाविकाजिनसंवृतम्।दामभिर्वरमाल्यानां समन्तादुपशोभितम्।।5.10.6।।
ଚାମର-ବ୍ୟଜନ ଧରିଥିବା ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ତାହାକୁ ପଖା କରୁଥିଲେ; ନାନା ପ୍ରକାର ସୁଗନ୍ଧରେ ତାହା ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା ଏବଂ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧୂପଧୂମରେ ସୁବାସିତ ହୋଇଥିଲା।
Verse 6
जातरूपपरिक्षिप्तं चित्रभानुसमप्रभम्।अशोकमालाविततं ददर्श परमासनम्।।5.10.4।।वालव्यजनहस्ताभिर्वीज्यमानं समन्ततः।गन्धैश्च विविधैर्जुष्टं वरधूपेन धूपितम्।।5.10.5।।परमास्तरणास्तीर्णमाविकाजिनसंवृतम्।दामभिर्वरमाल्यानां समन्तादुपशोभितम्।।5.10.6।।
ସେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆସ୍ତରଣରେ ପାତିଥିବା, ମୃଦୁ ଉଲ୍ଲର ଆବରଣରେ ଢାକା, ଏବଂ ଚାରିଦିଗରେ ଉତ୍ତମ ପୁଷ୍ପମାଳାର ଦାମରେ ଶୋଭିତ ଏକ ଦିବ୍ୟ ଶୟ୍ୟା ଦେଖିଲେ।
Verse 7
तस्मिन् जीमूतसंकाशं प्रदीप्तोत्तमकुण्डलम्।लोहिताक्षं महाबाहुं महारजतवाससम्।।।।लोहितेनानुलिप्ताङ्गं चन्दनेन सुगन्धिना।सन्ध्यारक्तमिवाकाशे तोयदं सतटिद्गणम्।।।।वृतमाभरणैर्दिव्यैः सुरूपं कामरूपिणम्।सवृक्षवनगुल्माढ्यं प्रसुप्तमिव मन्दरम्।।।।क्रीडित्वोपरतं रात्रौ वराभरणभूषितम्।प्रियं राक्षसकन्यानां राक्षसानां सुखावहम्।।।।पीत्वाऽप्युपरतं चापि ददर्श स महाकपिः।भास्वरे शयने वीरं प्रसुप्तं राक्षसाधिपम्।।।।
ସେଇ ଶୟ୍ୟା ଉପରେ ସେ ରାକ୍ଷସାଧିପତିଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ—ମେଘସଦୃଶ ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣ, ଦୀପ୍ତ ଉତ୍ତମ କୁଣ୍ଡଳଧାରୀ, ଲୋହିତାକ୍ଷ, ମହାବାହୁ, ଏବଂ ରଜତଛାୟା ବସ୍ତ୍ର ପରିଧାନକାରୀ।
Verse 8
तस्मिन् जीमूतसंकाशं प्रदीप्तोत्तमकुण्डलम्।लोहिताक्षं महाबाहुं महारजतवाससम्।।5.10.7।।लोहितेनानुलिप्ताङ्गं चन्दनेन सुगन्धिना।सन्ध्यारक्तमिवाकाशे तोयदं सतटिद्गणम्।।5.10.8।।वृतमाभरणैर्दिव्यैः सुरूपं कामरूपिणम्।सवृक्षवनगुल्माढ्यं प्रसुप्तमिव मन्दरम्।।5.10.9।।क्रीडित्वोपरतं रात्रौ वराभरणभूषितम्।प्रियं राक्षसकन्यानां राक्षसानां सुखावहम्।।5.10.10।।पीत्वाऽप्युपरतं चापि ददर्श स महाकपिः।भास्वरे शयने वीरं प्रसुप्तं राक्षसाधिपम्।।5.10.11।।
ତାଙ୍କ ଅଙ୍ଗପ୍ରତ୍ୟଙ୍ଗ ସୁଗନ୍ଧିତ ଲୋହିତ ଚନ୍ଦନରେ ଲେପିତ ଥିଲା; ତେଣୁ ସେ ସନ୍ଧ୍ୟାର ରକ୍ତିମ ଆକାଶରେ ବିଦ୍ୟୁତ୍-ରେଖାଯୁକ୍ତ ଜଳଧର ମେଘ ପରି ପ୍ରତୀତ ହେଉଥିଲେ।
Verse 9
तस्मिन् जीमूतसंकाशं प्रदीप्तोत्तमकुण्डलम्।लोहिताक्षं महाबाहुं महारजतवाससम्।।5.10.7।।लोहितेनानुलिप्ताङ्गं चन्दनेन सुगन्धिना।सन्ध्यारक्तमिवाकाशे तोयदं सतटिद्गणम्।।5.10.8।।वृतमाभरणैर्दिव्यैः सुरूपं कामरूपिणम्।सवृक्षवनगुल्माढ्यं प्रसुप्तमिव मन्दरम्।।5.10.9।।क्रीडित्वोपरतं रात्रौ वराभरणभूषितम्।प्रियं राक्षसकन्यानां राक्षसानां सुखावहम्।।5.10.10।।पीत्वाऽप्युपरतं चापि ददर्श स महाकपिः।भास्वरे शयने वीरं प्रसुप्तं राक्षसाधिपम्।।5.10.11।।
ଦିବ୍ୟ ଆଭୂଷଣରେ ଅଲଙ୍କୃତ, ସୁରୂପ ଏବଂ ଇଚ୍ଛାମତେ ରୂପ ଧାରଣକାରୀ ସେ, ବୃକ୍ଷ-ବନ-ଗୁଲ୍ମରେ ଘନ ମନ୍ଦର ପର୍ବତ ପରି, ଯେନ ନିଦ୍ରାରେ ଲୀନ ହୋଇ ପଡ଼ିଥିଲା।
Verse 10
तस्मिन् जीमूतसंकाशं प्रदीप्तोत्तमकुण्डलम्।लोहिताक्षं महाबाहुं महारजतवाससम्।।5.10.7।।लोहितेनानुलिप्ताङ्गं चन्दनेन सुगन्धिना।सन्ध्यारक्तमिवाकाशे तोयदं सतटिद्गणम्।।5.10.8।।वृतमाभरणैर्दिव्यैः सुरूपं कामरूपिणम्।सवृक्षवनगुल्माढ्यं प्रसुप्तमिव मन्दरम्।।5.10.9।।क्रीडित्वोपरतं रात्रौ वराभरणभूषितम्।प्रियं राक्षसकन्यानां राक्षसानां सुखावहम्।।5.10.10।।पीत्वाऽप्युपरतं चापि ददर्श स महाकपिः।भास्वरे शयने वीरं प्रसुप्तं राक्षसाधिपम्।।5.10.11।।
ରାତିରେ କ୍ରୀଡା କରି ବିରତ ହୋଇ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆଭୂଷଣରେ ଭୂଷିତ ହୋଇ, ସେ ଶୟନରେ ବିଶ୍ରାମ କରୁଥିଲା—ରାକ୍ଷସ କନ୍ୟାମାନଙ୍କ ପ୍ରିୟ ଏବଂ ରାକ୍ଷସମାନଙ୍କୁ ସୁଖଦାୟକ।
Verse 11
तस्मिन् जीमूतसंकाशं प्रदीप्तोत्तमकुण्डलम्।लोहिताक्षं महाबाहुं महारजतवाससम्।।5.10.7।।लोहितेनानुलिप्ताङ्गं चन्दनेन सुगन्धिना।सन्ध्यारक्तमिवाकाशे तोयदं सतटिद्गणम्।।5.10.8।।वृतमाभरणैर्दिव्यैः सुरूपं कामरूपिणम्।सवृक्षवनगुल्माढ्यं प्रसुप्तमिव मन्दरम्।।5.10.9।।क्रीडित्वोपरतं रात्रौ वराभरणभूषितम्।प्रियं राक्षसकन्यानां राक्षसानां सुखावहम्।।5.10.10।।पीत्वाऽप्युपरतं चापि ददर्श स महाकपिः।भास्वरे शयने वीरं प्रसुप्तं राक्षसाधिपम्।।5.10.11।।
ପାନ କରି ସାରି ବିରତ ହୋଇଥିବା, ଭାସ୍ୱର ଶୟନରେ ଶୁଇ ଘୁମାଉଥିବା ବୀର ରାକ୍ଷସାଧିପତିକୁ ସେ ମହାକପି ହନୁମାନ ଦେଖିଲେ।
Verse 12
निःश्वसन्तं यथा नागं रावणं वानरर्षभः।आसाद्य परमोद्विग्नस्सोपासर्पत्सुभीतवत्।।।।
ସର୍ପ ପରି ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡୁଥିବା ରାବଣଙ୍କ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚି ବାନରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେ ବାନରର୍ଷଭ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉଦ୍ବିଗ୍ନ ହୋଇ, ହଠାତ୍ ଭୟ ଲାଗିଥିବା ପରି ଭୀତ ହୋଇ ପଛକୁ ସରିଗଲା।
Verse 13
अथाऽऽरोहणमासाद्य वेदिकाऽन्तरमाश्रितः।सुप्तं राक्षसशार्दूलं प्रेक्षते स्म महाकपिः।।।।
ତାପରେ ମହାକପି ସୋପାନକୁ ପହଞ୍ଚି, ଅନ୍ୟ ଏକ ବେଦିକାର ଭିତର ଭାଗରେ ଆଶ୍ରୟ ନେଇ, ଶୁଇଥିବା ରାକ୍ଷସଶାର୍ଦୂଳକୁ ପୁନର୍ବାର ନିରୀକ୍ଷଣ କଲା।
Verse 14
शुशुभे राक्षसेन्द्रस्य स्वपतः शयनोत्तमम्।गन्धहस्तिनि संविष्टे यथा प्रस्रवणं महत्।।।।
ରାକ୍ଷସେନ୍ଦ୍ର ଶୁଇଥିବାବେଳେ ତାଙ୍କର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶୟନ ଦୀପ୍ତିମାନ ହୋଇ ଶୋଭା ପାଉଥିଲା—ଯେପରି ମଦମତ୍ତ ଗନ୍ଧହସ୍ତୀ ବସିଲେ ମହାନ ପ୍ରସ୍ରବଣ ପର୍ବତ ଶୋଭିତ ହୁଏ।
Verse 15
काञ्चनाङ्गदसन्नध्दै च ददर्श स महात्मनः।विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ।।।।ऐरावतविषाणाग्रैरापीडनकृतव्रणौ।वज्रोल्लिखितपीनांसौ विष्णुचक्रपरिक्षतौ।।।।पीनौ समसुजातांसौ संगतौ बलसंयुतौ।सुलक्षणनखाङ्गुष्ठा स्वङ्गुलीतललक्षितौ।।।।संहतौ परिघाकारौ वृत्तौ करिकरोपमौ।विक्षिप्तौ शयने शुभ्रे पञ्चशीर्षाविवोरगौ।।।।शशक्षतजकल्पेन सुशीतेन सुगन्धिना।चन्दनेन परार्ध्येन स्वनुलिप्तौ स्वलङ्कृतौ।।।।उत्तमस्त्रीविमृदितौ गन्धोत्तमनिषेवितौ।यक्षपन्नगगन्धर्वदेवदानवराविणौ।।।।
ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଅଙ୍ଗଦରେ ସନ୍ନଦ୍ଧ ମହାତ୍ମା ରାକ୍ଷସେନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଦୁଇ ଭୁଜକୁ ସେ ଦେଖିଲା—ଶୟନ ଉପରେ ଛିଟିଯାଇଥିବା, ଇନ୍ଦ୍ରଧ୍ୱଜ ସଦୃଶ ଦୁଇ ଧ୍ୱଜଦଣ୍ଡ ପରି।
Verse 16
काञ्चनाङ्गदसन्नध्दै च ददर्श स महात्मनः।विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ।।5.10.15।।ऐरावतविषाणाग्रैरापीडनकृतव्रणौ।वज्रोल्लिखितपीनांसौ विष्णुचक्रपरिक्षतौ।।5.10.16।।पीनौ समसुजातांसौ संगतौ बलसंयुतौ।सुलक्षणनखाङ्गुष्ठा स्वङ्गुलीतललक्षितौ।।5.10.17।।संहतौ परिघाकारौ वृत्तौ करिकरोपमौ।विक्षिप्तौ शयने शुभ्रे पञ्चशीर्षाविवोरगौ।।5.10.18।।शशक्षतजकल्पेन सुशीतेन सुगन्धिना।चन्दनेन परार्ध्येन स्वनुलिप्तौ स्वलङ्कृतौ।।5.10.19।।उत्तमस्त्रीविमृदितौ गन्धोत्तमनिषेवितौ।यक्षपन्नगगन्धर्वदेवदानवराविणौ।।5.10.20।।
ସେଇ ଘନ ଓ ପ୍ରବଳ ଭୁଜଦ୍ୱୟରେ ଆଘାତର ଚିହ୍ନ ଥିଲା—ଐରାବତର ଦନ୍ତାଗ୍ରରେ ଆପୀଡନ ହୋଇ ହୋଇଥିବା ଘା, ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ବଜ୍ରରେ ଉଲ୍ଲିଖିତ ଚିହ୍ନ, ଏବଂ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ ଚକ୍ରରେ ପରିକ୍ଷତ ଆଘାତ।
Verse 17
काञ्चनाङ्गदसन्नध्दै च ददर्श स महात्मनः।विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ।।5.10.15।।ऐरावतविषाणाग्रैरापीडनकृतव्रणौ।वज्रोल्लिखितपीनांसौ विष्णुचक्रपरिक्षतौ।।5.10.16।।पीनौ समसुजातांसौ संगतौ बलसंयुतौ।सुलक्षणनखाङ्गुष्ठा स्वङ्गुलीतललक्षितौ।।5.10.17।।संहतौ परिघाकारौ वृत्तौ करिकरोपमौ।विक्षिप्तौ शयने शुभ्रे पञ्चशीर्षाविवोरगौ।।5.10.18।।शशक्षतजकल्पेन सुशीतेन सुगन्धिना।चन्दनेन परार्ध्येन स्वनुलिप्तौ स्वलङ्कृतौ।।5.10.19।।उत्तमस्त्रीविमृदितौ गन्धोत्तमनिषेवितौ।यक्षपन्नगगन्धर्वदेवदानवराविणौ।।5.10.20।।
ସେହି ବାହୁଦ୍ୱୟ ଘନ, ସମପ୍ରମାଣରେ ସୁଜାତ, ଦୃଢ ଓ ବଳସଂଯୁକ୍ତ ଥିଲା; ଶୁଭଲକ୍ଷଣ ନଖ-ଅଙ୍ଗୁଷ୍ଠରେ ଚିହ୍ନିତ ଏବଂ ସୁଗଠିତ ଆଙ୍ଗୁଳି ଓ କରତଳର ଲକ୍ଷଣରେ ବିଶେଷ ଥିଲା।
Verse 18
काञ्चनाङ्गदसन्नध्दै च ददर्श स महात्मनः।विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ।।5.10.15।।ऐरावतविषाणाग्रैरापीडनकृतव्रणौ।वज्रोल्लिखितपीनांसौ विष्णुचक्रपरिक्षतौ।।5.10.16।।पीनौ समसुजातांसौ संगतौ बलसंयुतौ।सुलक्षणनखाङ्गुष्ठा स्वङ्गुलीतललक्षितौ।।5.10.17।।संहतौ परिघाकारौ वृत्तौ करिकरोपमौ।विक्षिप्तौ शयने शुभ्रे पञ्चशीर्षाविवोरगौ।।5.10.18।।शशक्षतजकल्पेन सुशीतेन सुगन्धिना।चन्दनेन परार्ध्येन स्वनुलिप्तौ स्वलङ्कृतौ।।5.10.19।।उत्तमस्त्रीविमृदितौ गन्धोत्तमनिषेवितौ।यक्षपन्नगगन्धर्वदेवदानवराविणौ।।5.10.20।।
ପରିଘ ସଦୃଶ ସଂହତ, ବୃତ୍ତ ଓ ହାତୀର ଶୁଣ୍ଡ ସମ ଥିବା ସେ ବାହୁଦ୍ୱୟ ଶୁଭ୍ର ଶୟନ ଉପରେ ଛିଟିକି ପଡ଼ିଥିଲା—ଯେନ ପଞ୍ଚଶୀର୍ଷ ଦୁଇ ନାଗ।
Verse 19
काञ्चनाङ्गदसन्नध्दै च ददर्श स महात्मनः।विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ।।5.10.15।।ऐरावतविषाणाग्रैरापीडनकृतव्रणौ।वज्रोल्लिखितपीनांसौ विष्णुचक्रपरिक्षतौ।।5.10.16।।पीनौ समसुजातांसौ संगतौ बलसंयुतौ।सुलक्षणनखाङ्गुष्ठा स्वङ्गुलीतललक्षितौ।।5.10.17।।संहतौ परिघाकारौ वृत्तौ करिकरोपमौ।विक्षिप्तौ शयने शुभ्रे पञ्चशीर्षाविवोरगौ।।5.10.18।।शशक्षतजकल्पेन सुशीतेन सुगन्धिना।चन्दनेन परार्ध्येन स्वनुलिप्तौ स्वलङ्कृतौ।।5.10.19।।उत्तमस्त्रीविमृदितौ गन्धोत्तमनिषेवितौ।यक्षपन्नगगन्धर्वदेवदानवराविणौ।।5.10.20।।
ସେ ବାହୁଦ୍ୱୟ ପରମାର୍ହ ଚନ୍ଦନରେ ଲେପିତ ଓ ଅଲଙ୍କୃତ ଥିଲା—ଶୀତଳ, ସୁଗନ୍ଧିତ, ଶଶର ରକ୍ତ ସଦୃଶ ରକ୍ତିମ; ତେଣୁ ଶୟନରେ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଐଶ୍ୱର୍ୟମୟ ଶୋଭାରେ ଦୀପ୍ତ ହେଉଥିଲା।
Verse 20
काञ्चनाङ्गदसन्नध्दै च ददर्श स महात्मनः।विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ।।5.10.15।।ऐरावतविषाणाग्रैरापीडनकृतव्रणौ।वज्रोल्लिखितपीनांसौ विष्णुचक्रपरिक्षतौ।।5.10.16।।पीनौ समसुजातांसौ संगतौ बलसंयुतौ।सुलक्षणनखाङ्गुष्ठा स्वङ्गुलीतललक्षितौ।।5.10.17।।संहतौ परिघाकारौ वृत्तौ करिकरोपमौ।विक्षिप्तौ शयने शुभ्रे पञ्चशीर्षाविवोरगौ।।5.10.18।।शशक्षतजकल्पेन सुशीतेन सुगन्धिना।चन्दनेन परार्ध्येन स्वनुलिप्तौ स्वलङ्कृतौ।।5.10.19।।उत्तमस्त्रीविमृदितौ गन्धोत्तमनिषेवितौ।यक्षपन्नगगन्धर्वदेवदानवराविणौ।।5.10.20।।
ଉତ୍ତମ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ମର୍ଦ୍ଦିତ ଓ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସୁଗନ୍ଧରେ ସେବିତ ସେ ବାହୁଦ୍ୱୟ ଏପରି ପରାକ୍ରମୀ ଥିଲା ଯେ ଯକ୍ଷ, ପନ୍ନଗ (ନାଗ), ଗନ୍ଧର୍ବ, ଦେବ ଓ ଦାନବମାନେ ମଧ୍ୟ ଭୟରେ ଆର୍ତ୍ତନାଦ କରିଉଠନ୍ତି।
Verse 21
ददर्श स कपिस्तत्र बाहू शयनसंस्थितौ।मन्दरस्यांतरे सुप्तौ महाही रुषिताविव।।।।
ସେଠାରେ କପିବୀର ଶୟ୍ୟାରେ ଅବସ୍ଥିତ ଦୁଇଟି ବାହୁକୁ ଦେଖିଲା—ମନ୍ଦର ପର୍ବତର ଗୁହାଭିତରେ ଶୁଇଥିବା ଦୁଇ ମହାସର୍ପ ପରି, ଯେନେ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ରୋଷାବିଷ୍ଟ ଥାଆନ୍ତି।
Verse 22
ताभ्यां स परिपूर्णाभ्यां भुजाभ्यां राक्षसेश्वरः।शुशुभेऽचलसङ्काशः शृङ्गाभ्यामिव मन्दरः।।।।
ସେଇ ଦୁଇଟି ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ବଳିଷ୍ଠ ବାହୁଦ୍ୱାରା ରାକ୍ଷସେଶ୍ୱର ଅଚଳ ସମ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲା—ଯେପରି ଦୁଇ ଶୃଙ୍ଗରେ ମନ୍ଦର ପର୍ବତ ଶୋଭିତ ହୁଏ।
Verse 23
चूतपुन्नागसुरभिर्वकुलोत्तमसंयुतः।मृष्टान्नरससंयुक्तः पानगन्धपुरस्कृतः।।।।तस्य राक्षससिंहस्य निश्चक्राम महामुखात्।शयानस्य विनिःश्वासः पूरयन्निव तद् गृहम्।।।।
ଶୟନରତ ସେଇ ରାକ୍ଷସସିଂହର ମହାମୁଖରୁ ନିଶ୍ୱାସ ବାହାରିଲା, ଯେନେ ସମଗ୍ର ଗୃହକୁ ପୂରଣ କରୁଥାଏ।
Verse 24
चूतपुन्नागसुरभिर्वकुलोत्तमसंयुतः।मृष्टान्नरससंयुक्तः पानगन्धपुरस्कृतः।।5.10.23।।तस्य राक्षससिंहस्य निश्चक्राम महामुखात्।शयानस्य विनिःश्वासः पूरयन्निव तद् गृहम्।।5.10.24।।
ଶୟନରତ ସେଇ ରାକ୍ଷସସିଂହର ମହାମୁଖରୁ ନିଶ୍ୱାସ ବାହାରିଲା, ଯେନେ ସମଗ୍ର ଗୃହକୁ ପୂରଣ କରୁଥାଏ।
Verse 25
मुक्तामणिविचित्रेण काञ्चनेन विराजितम्।मकुटेनापवृत्तेन कुण्डलोज्वलिताननम्।।।।रक्तचन्दनदिग्धेन तथा हारेण शोभिना।पीनायतविशालेन वक्षसाऽभिविराजितम्।।।।पाण्डरेणापविद्धेन क्षौमेण क्षतजेक्षणम्।महार्हेण सुसंवीतं पीतेनोत्तमवाससा।।।।माषराशिप्रतीकाशं निश्श्वसन्तं भुजङ्गवत्।गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्।।।।चतुर्भिः काञ्चनैर्दीपैद्धीप्यमानचतुर्दिशम्।प्रकाशीकृतसर्वाङ्गं मेघं विद्युद्गणैरिव।।।।पादमूलगताश्चापि ददर्श सुमहात्मनः।पत्नी: स प्रियभार्यस्य तस्य रक्षःपतेर्गृहे।।।।
ହନୁମାନ ରାବଣଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ରାଜଭବନରେ ଦେଖିଲେ—ସୁବର୍ଣ୍ଣର ଦୀପ୍ତିରେ ଝଲମଲ, ମୁକ୍ତା ଓ ମଣିର ଚିତ୍ରବିଚିତ୍ର ଅଳଙ୍କାରରେ ଶୋଭିତ। ତାଙ୍କର ମକୁଟ ଏକ ପାଶକୁ ସରିଥିଲା, କୁଣ୍ଡଳର କାନ୍ତିରେ ମୁଖ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଥିଲା। ରକ୍ତଚନ୍ଦନ ଲେପିତ ଓ ଶୋଭାମୟ ହାରରେ ଭୂଷିତ, ତାଙ୍କର ପୀନ ଓ ବିଶାଳ ବକ୍ଷସ୍ଥଳ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଉଥିଲା। ଚକ୍ଷୁ ରକ୍ତିମ; ଶ୍ୱେତ କ୍ଷୌମବସ୍ତ୍ର ଅଳ୍ପ ଖସିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ମହାର୍ହ ଉତ୍ତମ ପୀତ ବସ୍ତ୍ରରେ ସେ ସୁସଂବୀତ ଥିଲେ। ମାଷରାଶି ପରି ଶ୍ୟାମ, ସର୍ପ ପରି ଘୋର ନିଶ୍ୱାସ ନେଇ, ମହାଗଙ୍ଗାର ତଟେ ଶୁଇଥିବା କୁଞ୍ଜର ପରି ସେ ନିଦ୍ରାରତ ଥିଲେ। ଚାରିଟି ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଦୀପ ଚାରି ଦିଗରେ ଜ୍ୱଳି, ସମଗ୍ର ଦେହକୁ ପ୍ରକାଶିତ କରୁଥିଲା—ବିଦ୍ୟୁତ୍ଗଣରେ ଚିତ୍ରିତ ମେଘ ପରି। ଏବଂ ସେଇ ରକ୍ଷଃପତିଙ୍କ ପ୍ରିୟ ପତ୍ନୀମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କର ପାଦମୂଳରେ ଶୟନ କରୁଥିବା ହନୁମାନ ଦେଖିଲେ।
Verse 26
मुक्तामणिविचित्रेण काञ्चनेन विराजितम्।मकुटेनापवृत्तेन कुण्डलोज्वलिताननम्।।5.10.25।।रक्तचन्दनदिग्धेन तथा हारेण शोभिना।पीनायतविशालेन वक्षसाऽभिविराजितम्।।5.10.26।।पाण्डरेणापविद्धेन क्षौमेण क्षतजेक्षणम्।महार्हेण सुसंवीतं पीतेनोत्तमवाससा।।5.10.27।।माषराशिप्रतीकाशं निश्श्वसन्तं भुजङ्गवत्।गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्।।5.10.28।।चतुर्भिः काञ्चनैर्दीपैद्धीप्यमानचतुर्दिशम्।प्रकाशीकृतसर्वाङ्गं मेघं विद्युद्गणैरिव।।5.10.29।।पादमूलगताश्चापि ददर्श सुमहात्मनः।पत्नी: स प्रियभार्यस्य तस्य रक्षःपतेर्गृहे।।5.10.30।।
ରକ୍ତଚନ୍ଦନର ଲେପରେ ଲିପ୍ତ ଓ ଦୀପ୍ତିମାନ ହାରରେ ଶୋଭିତ, ତାହାର ପୀନ ଓ ବିଶାଳ ବକ୍ଷସ୍ଥଳ ମହା ଶ୍ରୀରେ ବିରାଜିତ ହେଉଥିଲା।
Verse 27
मुक्तामणिविचित्रेण काञ्चनेन विराजितम्।मकुटेनापवृत्तेन कुण्डलोज्वलिताननम्।।5.10.25।।रक्तचन्दनदिग्धेन तथा हारेण शोभिना।पीनायतविशालेन वक्षसाऽभिविराजितम्।।5.10.26।।पाण्डरेणापविद्धेन क्षौमेण क्षतजेक्षणम्।महार्हेण सुसंवीतं पीतेनोत्तमवाससा।।5.10.27।।माषराशिप्रतीकाशं निश्श्वसन्तं भुजङ्गवत्।गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्।।5.10.28।।चतुर्भिः काञ्चनैर्दीपैद्धीप्यमानचतुर्दिशम्।प्रकाशीकृतसर्वाङ्गं मेघं विद्युद्गणैरिव।।5.10.29।।पादमूलगताश्चापि ददर्श सुमहात्मनः।पत्नी: स प्रियभार्यस्य तस्य रक्षःपतेर्गृहे।।5.10.30।।
ତାହାର ଚକ୍ଷୁ ରକ୍ତବର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା; ସରିଯାଇଥିବା ସୂକ୍ଷ୍ମ ଶ୍ୱେତ କ୍ଷୌମବସ୍ତ୍ରରେ ଆବୃତ ଓ ଉତ୍ତମ ପୀତ ଉପବସ୍ତ୍ରରେ ସୁସଂବୀତ ଥିଲା।
Verse 28
मुक्तामणिविचित्रेण काञ्चनेन विराजितम्।मकुटेनापवृत्तेन कुण्डलोज्वलिताननम्।।5.10.25।।रक्तचन्दनदिग्धेन तथा हारेण शोभिना।पीनायतविशालेन वक्षसाऽभिविराजितम्।।5.10.26।।पाण्डरेणापविद्धेन क्षौमेण क्षतजेक्षणम्।महार्हेण सुसंवीतं पीतेनोत्तमवाससा।।5.10.27।।माषराशिप्रतीकाशं निश्श्वसन्तं भुजङ्गवत्।गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्।।5.10.28।।चतुर्भिः काञ्चनैर्दीपैद्धीप्यमानचतुर्दिशम्।प्रकाशीकृतसर्वाङ्गं मेघं विद्युद्गणैरिव।।5.10.29।।पादमूलगताश्चापि ददर्श सुमहात्मनः।पत्नी: स प्रियभार्यस्य तस्य रक्षःपतेर्गृहे।।5.10.30।।
ସେ ମାଷରାଶି ପରି କଳା ଦେଖାଯାଉଥିଲା, ଭୁଜଙ୍ଗ ପରି ଭାରି ନିଶ୍ୱାସ ନେଉଥିଲା; ମହା ଗଙ୍ଗାର ଜଳତଟେ ଶୁଇଥିବା କୁଞ୍ଜର ପରି ଲାଗୁଥିଲା।
Verse 29
मुक्तामणिविचित्रेण काञ्चनेन विराजितम्।मकुटेनापवृत्तेन कुण्डलोज्वलिताननम्।।5.10.25।।रक्तचन्दनदिग्धेन तथा हारेण शोभिना।पीनायतविशालेन वक्षसाऽभिविराजितम्।।5.10.26।।पाण्डरेणापविद्धेन क्षौमेण क्षतजेक्षणम्।महार्हेण सुसंवीतं पीतेनोत्तमवाससा।।5.10.27।।माषराशिप्रतीकाशं निश्श्वसन्तं भुजङ्गवत्।गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्।।5.10.28।।चतुर्भिः काञ्चनैर्दीपैद्धीप्यमानचतुर्दिशम्।प्रकाशीकृतसर्वाङ्गं मेघं विद्युद्गणैरिव।।5.10.29।।पादमूलगताश्चापि ददर्श सुमहात्मनः।पत्नी: स प्रियभार्यस्य तस्य रक्षःपतेर्गृहे।।5.10.30।।
ଚାରିଟି ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଦୀପର ଜ୍ୱାଳାରେ ଚତୁର୍ଦିଗ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲା; ତାହାର ସମଗ୍ର ଦେହ ପ୍ରକାଶିତ ହେଲା, ଯେପରି ବିଦ୍ୟୁତ୍-ଗୁଚ୍ଛରେ ଆଲୋକିତ ମେଘ।
Verse 30
मुक्तामणिविचित्रेण काञ्चनेन विराजितम्।मकुटेनापवृत्तेन कुण्डलोज्वलिताननम्।।5.10.25।।रक्तचन्दनदिग्धेन तथा हारेण शोभिना।पीनायतविशालेन वक्षसाऽभिविराजितम्।।5.10.26।।पाण्डरेणापविद्धेन क्षौमेण क्षतजेक्षणम्।महार्हेण सुसंवीतं पीतेनोत्तमवाससा।।5.10.27।।माषराशिप्रतीकाशं निश्श्वसन्तं भुजङ्गवत्।गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्।।5.10.28।।चतुर्भिः काञ्चनैर्दीपैद्धीप्यमानचतुर्दिशम्।प्रकाशीकृतसर्वाङ्गं मेघं विद्युद्गणैरिव।।5.10.29।।पादमूलगताश्चापि ददर्श सुमहात्मनः।पत्नी: स प्रियभार्यस्य तस्य रक्षःपतेर्गृहे।।5.10.30।।
ସେ ରାକ୍ଷସପତିଙ୍କ ଗୃହରେ ହନୁମାନ ମହାତ୍ମା ରାବଣଙ୍କ ପ୍ରିୟ ପତ୍ନୀମାନଙ୍କୁ—ତାଙ୍କ ପ୍ରିୟାଭାର୍ୟାମାନଙ୍କୁ—ତାଙ୍କ ପାଦମୂଳେ ଉପବିଷ୍ଟ ଦେଖିଲେ।
Verse 31
शशिप्रकाशवदनाश्चारुकुण्डलभूषिताः।अम्लानमाल्याभरणा ददर्श हरियूथपः।।।।
ହରିୟୂଥପ ହନୁମାନ ଚନ୍ଦ୍ରପ୍ରକାଶ ସଦୃଶ ମୁଖମଣ୍ଡଳ ଥିବା, ସୁନ୍ଦର କୁଣ୍ଡଳରେ ଭୂଷିତ, ଅମ୍ଲାନ ମାଳା ଓ ଆଭରଣ ପରିଧାନ କରିଥିବା ନାରୀମାନଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ।
Verse 32
नृत्तवादित्रकुशला राक्षसेन्द्रभुजाङ्कगाः।वराभरणधारिण्यो निषण्णा ददृशे हरिः।।।।
ନୃତ୍ୟ ଓ ବାଦ୍ୟରେ କୁଶଳ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆଭରଣଧାରିଣୀ, ରାକ୍ଷସେନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଭୁଜ ଓ ଅଙ୍କରେ ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ବିଶ୍ରାମ କରୁଥିବା ନାରୀମାନଙ୍କୁ ହନୁମାନ ଦେଖିଲେ।
Verse 33
वज्रवैडूर्यगर्भाणि श्रवणान्तेषु योषिताम्।ददर्श तापनीयानि कुण्डलान्यङ्गदानि च।।।।
ନାରୀମାନଙ୍କ ଶ୍ରବଣାନ୍ତେ ବଜ୍ର ଓ ବୈଡୂର୍ୟ ରତ୍ନଜଡିତ କୁଣ୍ଡଳ, ଏବଂ ତାପନୀୟ ସୁବର୍ଣ୍ଣର ଦୀପ୍ତିମାନ ଆଭରଣ—କୁଣ୍ଡଳ ଓ ଅଙ୍ଗଦ—ସେ ଦେଖିଲେ।
Verse 34
तासां चन्द्रोपमैर्वक्त्रैश्शुभैर्ललितकुण्डलैः।विरराज विमानं तन्नभस्तारागणैरिव।।।।
ତାଙ୍କର ଶୁଭ ଚନ୍ଦ୍ରୋପମ ମୁଖମଣ୍ଡଳ ଓ କୋମଳ, ମନୋହର କୁଣ୍ଡଳମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସେ ଭିମାନସଦୃଶ ଶୟନକକ୍ଷ ଦୀପ୍ତିମାନ ହୋଇ ଉଠିଲା—ଯେପରି ନଭ ତାରାଗଣରେ ଶୋଭିତ ହୁଏ।
Verse 35
मदव्यायामखिन्नास्ता राक्षसेन्द्रस्य योषितः।तेषु तेष्ववकाशेषु प्रसुप्तास्तनुमध्यमाः।।।।
ମଦମତ୍ତତା ଓ ବ୍ୟାୟାମରେ କ୍ଳାନ୍ତ ରାକ୍ଷସେନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଯୋଷିତମାନେ—ସୁକୁମାର ମଧ୍ୟା—ନାନା ସ୍ଥାନରେ ଏଠି ସେଠି ଶୋଇ ପଡ଼ିଥିଲେ।
Verse 36
अङ्गहारैस्तथैवान्या कोमलैर्नृत्तशालिनी।विन्यस्तशुभसर्वाङ्गी प्रसुप्ता वरवर्णिनी।।।।
ଅନ୍ୟ ଜଣେ—ସୁକୁମାରୀ, ନୃତ୍ୟକଳାରେ ନିପୁଣା ଓ ଅତି ସୁନ୍ଦର ବର୍ଣ୍ଣବତୀ—ନୃତ୍ୟର ଅଙ୍ଗହାର ଭଳି ସୁଶୋଭିତ ଅଙ୍ଗବିନ୍ୟାସ ସହ ଶୋଇଥିଲେ; ଯେନ ନିଦ୍ରାରେ ମଧ୍ୟ ଅଭ୍ୟାସ ଦେହକୁ ଧରି ରଖିଛି।
Verse 37
काचिद्वीणां परिष्वज्य प्रसुप्ता सम्प्रकाशते।महानदीप्रकीर्णेव नलिनी पोतमाश्रिता।।।।
ଜଣେ ନାରୀ ବୀଣାକୁ ପରିଷ୍ୱଜି ଶୋଇଥିଲେ; ମହାନଦୀରେ ପ୍ରକୀର୍ଣ୍ଣ ନଳିନୀ ଯେପରି ନୌକାକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହୁଏ, ସେପରି ସେ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଦେଖାଉଥିଲେ।
Verse 38
अन्या कक्षगतेनैव मड्डुकेनासितेक्षणा।प्रसुप्ता भामिनी भाति बालपुत्रेव वत्सला।।।।
ଅନ୍ୟ ଜଣେ ଅସିତେକ୍ଷଣା ଭାମିନୀ କକ୍ଷରେ ଧରା ମଡ୍ଡୁକ ନେଇ ଶୋଇଥିଲେ; ବାତ୍ସଲ୍ୟମୟୀ ମା ଯେପରି ନିଜ ଛୋଟ ପୁତ୍ରକୁ ଧରି ରଖେ, ସେପରି ସେ ଭାସୁଥିଲେ।
Verse 39
पटहं चारुसर्वाङ्गी पीड्य शेते शुभस्तनी।चिरस्य रमणं लब्ध्वा परिष्वज्येव भामिनी।।।।
ଚାରୁ ସର୍ବାଙ୍ଗୀ ଓ ଶୁଭସ୍ତନୀ ଜଣେ ଭାମିନୀ ପଟହକୁ ଦବାଇ ଶୋଇଥିଲେ; ଯେନ ଦୀର୍ଘକାଳ ପରେ ପ୍ରିୟକୁ ପାଇ ଆଲିଙ୍ଗନ କରିଛି।
Verse 40
काचिद्वंशं परिष्वज्य सुप्ता कमललोचना।रहः प्रियतमं गृह्य सकामेव च कामिनी।।।।
ଏକ କମଳନୟନୀ ନାରୀ ବଂଶୀ (ବାଂଶୀ)କୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ଶୋଇଥିଲା—ଯେପରି ଗୁପ୍ତରେ ପ୍ରିୟତମକୁ ବାହୁପାଶରେ ଧରିଥିବା କାମିନୀ, ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କାମଭାବରେ ଯୁକ୍ତ ଥାଏ।
Verse 41
विपञ्चीं परिगृह्यान्या नियता नृत्तशालिनी।निद्रावशमनुप्राप्ता सह कान्तेव भामिनी।।।।
ଅନ୍ୟ ଜଣେ—ସଂୟମଶୀଳା ଓ ନୃତ୍ୟକଳାରେ ନିପୁଣା—ବିପଞ୍ଚୀକୁ ବାହୁରେ ଧରି ନିଦ୍ରାବଶ ହୋଇ ଶୋଇଥିଲା; ଯେପରି କାନ୍ତା ପ୍ରିୟତମଙ୍କ ସହିତ ଶୋଇ ନିଦ୍ରାକ୍ରାନ୍ତ ହୁଏ।
Verse 42
अन्या कनकसङ्काशैर्मृदुपीनैर्मनोरमैः।मृदङ्गं परिपीड्याङ्गैः प्रसुप्ता मत्तलोचना।।।।
ଅନ୍ୟ ଜଣେ ମଦମତ୍ତ ନୟନା, ସୁବର୍ଣ୍ଣସଦୃଶ କାନ୍ତିଯୁକ୍ତ ମୃଦୁ ଓ ପୀନ ମନୋହର ଅଙ୍ଗଦ୍ୱାରା ମୃଦଙ୍ଗକୁ ଚାପି ଧରି ଶୋଇଥିଲା।
Verse 43
भुजपार्श्वान्तरस्थेन कक्षगेन कृशोदरी।पणवेव सहानिन्द्या सुप्ता मदकृतश्रमा।।।।
ଅନ୍ୟ ଜଣେ ନିର୍ଦୋଷା କୃଶୋଦରୀ, ମଦଜନିତ ଶ୍ରମରେ କ୍ଲାନ୍ତ ହୋଇ, ଭୁଜ ଓ ପାର୍ଶ୍ୱ ମଧ୍ୟରେ ଚାପି କକ୍ଷରେ ଅଟକାଇଥିବା ପଣବକୁ ଧରି ଶୋଇଥିଲା।
Verse 44
डिण्डिमं परिगृह्यान्या तथैवासक्तडिण्डिमा।प्रसुप्ता तरुणं वत्समुपगूह्येव भामिनी।।।।
ଅନ୍ୟ ଜଣେ ନାରୀ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ନିଜ ଡିଣ୍ଡିମ ଢୋଳକୁ ଆସକ୍ତିରେ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି, ଯୁବ ବଛାକୁ ମାଆ ଯେପରି ଚାପି ଧରେ ସେପରି ଭାମିନୀ ଘୋର ନିଦ୍ରାରେ ଶୁଇଥିଲା।
Verse 45
काचिदाडम्बरं नारी भुजसंयोगपीडितम्।कृत्वा कमलपत्राक्षी प्रसुप्ता मदमोहिता।।।।
କମଳପତ୍ରାକ୍ଷୀ ଜଣେ ନାରୀ, ମଦମୋହରେ ବିମୁଢ଼ ହୋଇ, ଭୁଜଦ୍ୱୟର ଦୃଢ଼ ଆଲିଙ୍ଗନରେ ‘ଆଡମ୍ବର’ ନାମକ ବାଦ୍ୟକୁ ଚାପି ଧରି ପ୍ରସୁପ୍ତ ହୋଇଥିଲା।
Verse 46
कलशीमपविध्यान्या प्रसुप्ता भाति भामिनी।वसन्ते पुष्पशबला मालेव परिमार्जिता।।।।
ଜଣେ ଭାମିନୀ କଲଶୀ (ଜଳପାତ୍ର)କୁ ପାଖକୁ ଠେଲିଦେଇ ଘୋର ନିଦ୍ରାରେ ଶୋଭା ପାଉଥିଲା; ଅନ୍ୟ ଜଣେ ବସନ୍ତର ବହୁବର୍ଣ୍ଣ ପୁଷ୍ପରେ ଶବଳ ମାଳା ପରି, ଯେନେ ପରିମାର୍ଜିତ ହୋଇ ସୁସଜ୍ଜିତ ରଖାଯାଇଛି, ସେପରି ଦେଖାଯାଉଥିଲା।
Verse 47
पाणिभ्यां च कुचौ काचित्सुवर्णकलशोपमौ।उपगूह्याबला सुप्ता निद्राबलपराजिता।।।।
ଅନ୍ୟ ଜଣେ ଅବଳା, ନିଦ୍ରାର ବଳରେ ପରାଜିତ ହୋଇ, ଦୁଇ ହାତରେ ସୁବର୍ଣ୍ଣ କଲଶ ସଦୃଶ ନିଜ ସ୍ତନଦ୍ୱୟକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ଶୁଇଥିଲା।
Verse 48
अन्या कमलपत्राक्षी पूर्णेन्दुसदृशानना।अन्यामालिङ्ग्य सुश्रोणीं प्रसुप्ता मदविह्वला।।।।
ଅନ୍ୟ ଜଣେ କମଳପତ୍ରାକ୍ଷୀ, ପୂର୍ଣ୍ଣେନ୍ଦୁ ସଦୃଶ ମୁଖବତୀ, ସୁଶ୍ରୋଣୀ ଅନ୍ୟ ଜଣେ ନାରୀକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି, ମଦରେ ବିହ୍ୱଳ ହୋଇ ପ୍ରସୁପ୍ତ ଥିଲା।
Verse 49
आतोद्यानि विचित्राणि परिष्वज्य वरस्त्रियः।निपीड्य च कुचैस्सुप्ता कामिन्यः कामुकानिव।।।।
ବିଚିତ୍ର ବାଦ୍ୟଗୁଡ଼ିକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ଶୋଇଥିଲେ; ନିଜ କୁଚଦ୍ୱାରା ଚାପି ଧରି, କାମିନୀମାନେ ଯେପରି କାମୁକମାନେ ପ୍ରିୟତମାକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରନ୍ତି ସେପରି ଲାଗୁଥିଲେ।
Verse 50
तासामेकान्तविन्यस्ते शयानां शयने शुभे।ददर्श रूपसम्पन्नामपरां स कपिः स्त्रियम्।।।।
ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ, ଏକାନ୍ତରେ ବିନ୍ୟସ୍ତ ଶୁଭ ଶୟ୍ୟାରେ ଶୋଇଥିବା ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଭିତରୁ, ସେ କପି ରୂପସମ୍ପନ୍ନ ଆଉ ଜଣେ ସ୍ତ୍ରୀକୁ ଦେଖିଲା।
Verse 51
मुक्तामणिसमायुक्तैर्भूषणैः सुविभूषिताम्।विभूषयन्तीमिव तत्स्वश्रिया भवनोत्तमम्।।।।गौरीं कनकवर्णाभामिष्टामन्तः पुरेश्वरीम्।कपिर्मन्दोदरीं तत्र शयानां चारुरूपिणीम्।।।।
ମୁକ୍ତା ଓ ମଣିଯୁକ୍ତ ଭୂଷଣରେ ସୁଶୋଭିତ, ନିଜ କାନ୍ତିଦ୍ୱାରା ଯେପରି ସେଇ ଉତ୍ତମ ଭବନକୁ ଶୋଭାୟିତ କରୁଛି; ଗୌରୀ, କନକବର୍ଣ୍ଣାଭା, ଅନ୍ତଃପୁରର ପ୍ରିୟ ପଟ୍ଟମହିଷୀ—ଚାରୁରୂପିଣୀ ମନ୍ଦୋଦରୀଙ୍କୁ ସେ କପି ସେଠାରେ ଶୟନ କରୁଥିବା ଦେଖିଲା।
Verse 52
मुक्तामणिसमायुक्तैर्भूषणैः सुविभूषिताम्।विभूषयन्तीमिव तत्स्वश्रिया भवनोत्तमम्।।5.10.51।।गौरीं कनकवर्णाभामिष्टामन्तः पुरेश्वरीम्।कपिर्मन्दोदरीं तत्र शयानां चारुरूपिणीम्।।5.10.52।।
ସେଠାରେ କପି ମନ୍ଦୋଦରୀଙ୍କୁ ଶୟନ କରୁଥିବା ଦେଖିଲା—କାନ୍ତିମୟୀ, କନକବର୍ଣ୍ଣାଭା, ମୁକ୍ତା-ମଣିଜଡିତ ଭୂଷଣରେ ଅତିଶୟ ଅଲଙ୍କୃତ; ଯେପରି ନିଜ ଦୀପ୍ତିଦ୍ୱାରା ସେଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭବନକୁ ଶୋଭାୟିତ କରୁଛନ୍ତି; ସେ ଅନ୍ତଃପୁରର ପ୍ରିୟ ପଟ୍ଟମହିଷୀ ଥିଲେ।
Verse 53
स तां दृष्ट्वा महाबाहुर्भूषितां मारुतात्मजः।तर्कयामास सीतेति रूपयौवनसम्पदा।।।हर्षेण महता युक्तो ननन्द हरियूथपः।
ତାହାକୁ ଅଲଙ୍କୃତ ଦେଖି ମହାବାହୁ ମାରୁତାତ୍ମଜ ହନୁମାନ ରୂପ ଓ ଯୌବନସମ୍ପଦା ଦ୍ୱାରା ଭାବିଲେ—‘ଏହି ନିଶ୍ଚୟ ସୀତା।’ ମହାହର୍ଷରେ ଯୁକ୍ତ ବାନରୟୂଥପ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ।
Verse 54
आस्फोटयामास चुचुम्ब पुच्छं ननन्द चिक्रीड जगौ जगाम।स्तम्भानरोहन्निपपात भूमौ निदर्शयन् स्वां प्रकृतिं कपीनाम्।।।।
ସେ ତାଳି ମାରିଲେ, ନିଜ ପୁଛକୁ ଚୁମ୍ବନ କଲେ; ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ ଖେଳିଲେ, ଗାଇଲେ, ଘୁରିବୁଲିଲେ—ସ୍ତମ୍ଭ ଉପରେ ଚଢ଼ି ଭୂମିରେ ଝାପି ପଡ଼ି—କପିମାନଙ୍କ ନିଜ ସ୍ୱଭାବକୁ ପ୍ରକାଶ କଲେ।
Hanumān must interpret appearances inside the harem: he momentarily identifies Mandodarī as Sītā based on beauty and ornamentation, then must correct his inference—demonstrating disciplined verification rather than impulsive conclusion.
The sarga teaches that perception (darśana) requires viveka: sensory brilliance and power can mislead, so a messenger’s duty is restrained observation, fear-management, and truth-oriented judgment aligned with dharma.
The setting is Laṅkā’s inner palace; cultural markers include royal regalia (umbrella, crown, lamps), perfumery and sandal paste, and courtly music/dance instruments. Landmark similes—Mandara, Prasravaṇa, and the Gaṅgā’s bank—anchor the imagery in pan-Indic sacred geography.
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