
Daśagrīva-boonāvaraṇa, Viṣṇv-avatāra-niyoga, Vānara-sahāya-janana, Mantharā-nirmāṇa
Upa-parva: Mārkaṇḍeya-samvāda / Rāvaṇa-avadha-upāya (Vānara-sṛṣṭi-kathā)
This chapter presents a compact chain of reported speech. Mārkaṇḍeya narrates how accomplished brahmarṣis and devarājarṣis, led by Agni, approach Brahmā seeking refuge from the disruptive power of Daśagrīva (Rāvaṇa), who is described as protected by a prior boon. Agni articulates the crisis: widespread affliction of beings and the absence of any alternative protector. Brahmā responds with a constraint-based assessment—Daśagrīva is not readily conquerable in direct battle by devas or asuras—and then identifies the appointed corrective mechanism: Viṣṇu, the foremost among combatants, has descended by Brahmā’s commission to execute the necessary work. Brahmā further instructs the assembled deities to incarnate on earth and to generate heroic sons among vānaras and ṛkṣas, endowed with strength and transformative capacities, thereby establishing a support network for Viṣṇu’s mission. The narrative then specifies particular implementations: groups of devas, gandharvas, and dānavas descend in apportioned fashion; the gandharvī Dundubhī is directed for the success of the divine objective and becomes Mantharā, a hunchbacked figure in the human world. The chapter concludes by describing the extraordinary physical and martial capacities of these offspring and notes that the divine agent subsequently instructs Mantharā in role-specific tasks, which she undertakes with purposeful movement aimed at intensifying enmity.
Chapter Arc: वनवास की कठोरता में फल-मूलाहार करते हुए भी पाण्डवों की तेजस्विता बनी रहती है, पर युधिष्ठिर का मन भीतर-भीतर जलता है—भाइयों के दुःख का कारण वह अपने ही कर्म-दोष को मानते हैं। → राजर्षि युधिष्ठिर बार-बार उसी चिंता में डूबते हैं: ‘सुख के योग्य होकर भी ये महापुरुष कष्ट क्यों भोग रहे हैं?’ इसी मानसिक भार के बीच महर्षि व्यास का आगमन होता है—उनकी वाणी युधिष्ठिर की आत्मग्लानि को धर्म-चिन्तन में रूपान्तरित करने लगती है। → व्यास दान के विषय में कठोर सत्य उद्घाटित करते हैं—पृथ्वी पर दान से बढ़कर दुष्कर कुछ नहीं, क्योंकि अर्थ की तृष्णा महान है और धन दुःख से मिलता है; फिर भी समय पर आए अतिथि को प्रसन्नचित्त, मत्सर-रहित होकर यथाशक्ति देना ही धर्म है। → व्यास युधिष्ठिर को तप और काल-स्वीकार का मार्ग दिखाते हैं: सुख-दुःख पर्याय से आते हैं; विवेकी पुरुष को प्राप्त सुख का त्यागपूर्वक उपभोग और स्वतः आए दुःख का धैर्यपूर्वक वहन करना चाहिए—कृषक की भाँति काल की प्रतीक्षा और साधना में स्थिर रहना ही विजय है। → व्यास की शिक्षा के बाद भी प्रश्न शेष रहता है—क्या युधिष्ठिर इस उपदेश को केवल सुनेंगे, या दान-तप-धैर्य को अपने राजधर्म की अग्नि बनाकर आगामी परीक्षाओं में उतारेंगे?
Verse 1
््स् “+(>9) #::.# #55-7 (व्रीहिद्रोणिकपर्व) एकोनषष्ट्यधिकद्वधिशततमो< ध्याय: युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन वैशम्पायन उवाच वने निवसतां तेषां पाण्डवानां महात्मनाम् | वर्षण्येकादशातीयु: कृच्छेण भरतर्षभ,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार वनमें रहते हुए उन महात्मा पाण्डवोंके ग्यारह वर्ष बड़े कष्टसे बीते
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜନମେଜୟ! ବନରେ ବାସ କରୁଥିବା ସେଇ ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ଏଗାର ବର୍ଷ ଅତ୍ୟନ୍ତ କଷ୍ଟରେ କଟିଗଲା।
Verse 2
फलमूलाशनास्ते हि सुखारहँ दुःखमुत्तमम् प्राप्तकालमनुध्यान्त: सेहिरे वरपूरुषा:,वे फल-मूल खाकर रहते थे। सुख भोगनेके योग्य होकर भी महान् कष्ट भोगते थे और यह सोचकर कि यह हमारे कष्टका समय है, इसे धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिये, चुपचाप सब दु:ख झेलते थे। उनमें ऐसा विवेक इसलिये था कि वे सब-के-सब श्रेष्ठ पुरुष थे
ସେମାନେ ଫଳ ଓ ମୂଳ ଖାଇ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଥିଲେ। ସୁଖଭୋଗର ଯୋଗ୍ୟ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମହାଦୁଃଖ ସହିଲେ; ‘ଏହା ଆମ ଦୁଃଖର ନିୟତ କାଳ’ ବୋଲି ଭାବି, ଧୈର୍ଯ୍ୟରେ ମୌନ ରହି ସମସ୍ତ ପୀଡା ସହନ କରୁଥିଲେ—କାରଣ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷ ଥିଲେ।
Verse 3
युधिष्ठिरस्तु राजर्षिरात्मकर्मापराधजम् | चिन्तयन् स महाबाहुर्भातृणां दुःखमुत्तमम्,महाबाहु राजर्षि युधिष्ठिर सदा यही सोचते रहते थे कि “मेरे भाइयोंपर जो यह महान् दुःख आ पड़ा है, मेरी ही करनीका फल है। मेरे ही अपराधसे इन्हें कष्ट भोगना पड़ रहा है!
ରାଜର୍ଷି ମହାବାହୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସଦା ଏହିପରି ଚିନ୍ତା କରୁଥିଲେ—‘ମୋ ଭାଇମାନଙ୍କ ଉପରେ ପଡ଼ିଥିବା ଏହି ମହାଦୁଃଖ ମୋର ନିଜ କର୍ମଦୋଷରୁ ଉତ୍ପନ୍ନ; ମୋର ଅପରାଧ ହେତୁ ସେମାନେ କଷ୍ଟ ଭୋଗୁଛନ୍ତି।’
Verse 4
न सुष्वाप सुखं राजा हृदि शल्यैरिवार्पिति: । दौरात्म्यमनुपश्यंस्तत् काले द्यूतोद््भवस्य हि,इसी चिन्तामें पड़े-पड़े राजा युधिष्ठिर रातमें सुखकी नींद नहीं सो पाते थे। ये बातें उनके हृदयमें चुभे हुए काँटोंके समान दुःख दिया करती थीं। जूआ खेलनेके कारणभूत शकुनि आदिकी दुष्टतापर दृष्टिपात करके तथा सूतपुत्र कर्णकी कठोर बातोंको स्मरण करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर दीनभावसे लंबी साँसें लेते रहते और महान् क्रोधरूपी विषको अपने हृदयमें धारण करते थे
ରାଜା ସୁଖରେ ନିଦ୍ରା କରିପାରୁନଥିଲେ; ଯେପରି ହୃଦୟରେ ଶଳ୍ୟ ଘୁସିଥାଏ। କାରଣ ସେ ସମୟରେ ଦ୍ୟୁତରୁ ଉଦ୍ଭବିତ ଦୁଷ୍ଟତା ଓ କ୍ରୂର ଅଭିପ୍ରାୟକୁ ଚିନ୍ତା କରିଲେ ମାତ୍ରେ ତାଙ୍କ ମନ ଉତ୍ତେଜିତ ଓ ଅଶାନ୍ତ ହୋଇଯାଉଥିଲା।
Verse 5
संस्मरन् परुषा वाच: सूतपुत्रस्य पाण्डव: । निःश्वासपरमो दीनो बिभ्रत् कोपविषं महत्,इसी चिन्तामें पड़े-पड़े राजा युधिष्ठिर रातमें सुखकी नींद नहीं सो पाते थे। ये बातें उनके हृदयमें चुभे हुए काँटोंके समान दुःख दिया करती थीं। जूआ खेलनेके कारणभूत शकुनि आदिकी दुष्टतापर दृष्टिपात करके तथा सूतपुत्र कर्णकी कठोर बातोंको स्मरण करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर दीनभावसे लंबी साँसें लेते रहते और महान् क्रोधरूपी विषको अपने हृदयमें धारण करते थे
ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ପରୁଷ ବାକ୍ୟ ସ୍ମରଣ କରି ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୀନ ହୋଇଯାଉଥିଲେ, ବାରମ୍ବାର ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ୁଥିଲେ ଏବଂ ଅନ୍ତରେ କ୍ରୋଧରୂପ ମହାବିଷ ଧାରଣ କରୁଥିଲେ।
Verse 6
अर्जुनों यमजौ चोभौ द्रौपदी च यशस्विनी । स च भीमो महातेजा: सर्वेषामुत्तमो बली
ଅର୍ଜୁନ, ଉଭୟ ଯମଜ, ଯଶସ୍ୱିନୀ ଦ୍ରୌପଦୀ ଏବଂ ମହାତେଜସ୍ୱୀ ଭୀମ—ସେମାନେ ସମସ୍ତଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବଳରେ ସର୍ବୋତ୍ତମ ଥିଲେ।
Verse 7
अवशिष्टमल्पकाल मन्वाना: पुरुषर्षभा:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅତି ଅଳ୍ପ ସମୟ ମାତ୍ର ଅବଶିଷ୍ଟ ବୋଲି ଭାବି, ସେହି ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ, ବୃଷଭସଦୃଶ ବୀରମାନେ ମୁହୂର୍ତ୍ତର ତାତ୍କାଳିକତା ସ୍ମରଣ କରି ତଦନୁସାରେ ନିଜ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ।
Verse 8
कस्यचित् त्वथ कालस्य व्यास: सत्यवतीसुत:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କିଛି ସମୟ ଅତିବାହିତ ହେବା ପରେ ସତ୍ୟବତୀପୁତ୍ର ବ୍ୟାସ ସେଠାକୁ ଆସିଲେ।
Verse 9
आजगाम महायोगी पाण्डवानवलोकक: । तमागतमभिप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:
ମହାଯୋଗୀ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଦେଖିବାକୁ ସେଠାକୁ ଆସିଲେ। ତାଙ୍କ ଆଗମନ ଦେଖି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ତାଙ୍କୁ ନିରୀକ୍ଷଣ କଲେ।
Verse 10
प्रत्युद्गम्य महात्मान प्रत्यगृह्नाद् यथाविधि । तदनन्तर किसी समय महायोगी सत्यवतीनन्दन व्यास पाण्डवोंको देखनेके लिये वहाँ आये। उन महात्माको आया देख कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर उनकी अगवानीके लिये कुछ दूर आगे बढ़ गये और विधिपूर्वक स्वागत-सत्कारके साथ उन्हें अपने साथ लिवा लाये ।। ८-९ >॥ तमासीनमुपासीन: शुश्रूषुर्नियतेन्द्रिय:
ମହାତ୍ମାଙ୍କୁ ସ୍ୱାଗତ କରିବାକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ି ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବିଧିପୂର୍ବକ ତାଙ୍କୁ ଗ୍ରହଣ କଲେ। ସେ ଆସନ ଗ୍ରହଣ କରିବା ପରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମଧ୍ୟ ସମୀପରେ ବସିଲେ—ଇନ୍ଦ୍ରିୟସଂଯମୀ ହୋଇ, ସେବା ଓ ଶ୍ରବଣରେ ତତ୍ପର।
Verse 11
तानवेक्ष्य कृशान् पौत्रान् वने वन््येन जीवत:
ବନରେ ବନ୍ୟ ଆହାରରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଥିବା ନିଜ ପୌତ୍ରମାନଙ୍କୁ କୃଶ ଦେହରେ ଦେଖି (ବ୍ୟାସଙ୍କ ହୃଦୟ କରୁଣାରେ ଦ୍ରବିତ ହେଲା)।
Verse 12
युधिष्ठटिर महाबाहो शृणु धर्मभूतां वर,“धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाबाहु युधिष्ठिर! मेरी बात सुनो, संसारमें जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे महान् सुखकी उपलब्धि नहीं कर पाते हैं। मनुष्य बारी-बारीसे सुख और दुःख दोनोंका सेवन करता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମହାବାହୁ, ଧର୍ମାତ୍ମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ମୋ କଥା ଶୁଣ। ଯେମାନେ ଲୋକରେ ତପସ୍ୟା ଓ ସଂଯମ କରିନାହାନ୍ତି, ସେମାନେ ମହାସୁଖ ପାଉନାହାନ୍ତି। ମଣିଷ କାଳକ୍ରମେ ସୁଖ ଓ ଦୁଃଖ—ଦୁହେଁକୁ ପର୍ଯ୍ୟାୟକ୍ରମେ ଅନୁଭବ କରେ।
Verse 13
नातप्ततपसो लोके प्राप्रुवन्ति महासुखम् | सुखदु:खे हि पुरुष: पर्यायेणोपसेवते,“धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाबाहु युधिष्ठिर! मेरी बात सुनो, संसारमें जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे महान् सुखकी उपलब्धि नहीं कर पाते हैं। मनुष्य बारी-बारीसे सुख और दुःख दोनोंका सेवन करता है
ଯେମାନେ ତପସ୍ୟା କରିନାହାନ୍ତି, ସେମାନେ ଏହି ଲୋକରେ ମହାସୁଖ ପାଉନାହାନ୍ତି। ମଣିଷ ସୁଖ ଓ ଦୁଃଖ—ଦୁହେଁକୁ ପର୍ଯ୍ୟାୟକ୍ରମେ ଅନୁଭବ କରେ।
Verse 14
& ॥ | [5 है £ | 80५, 204८ ॥/.%% (जज 00॥7₹ 7 ॥:20॥067//॥ 4 , है. ब् हि: 006५2 | ४: ३< न हानन्तं सुखं कक्षित् प्राप्नोति पुरुषर्षभ । प्रज्ञावांस्त्वेव पुरुष: संयुक्त: परया घधिया
ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ! କେହି ମଧ୍ୟ ଅନନ୍ତ, ଅବିଚ୍ଛିନ୍ନ ସୁଖ ପାଉନାହାନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ପରମ ବିବେକରେ ଯୁକ୍ତ ପ୍ରଜ୍ଞାବାନ ମଣିଷ ମାତ୍ର ଭାଗ୍ୟର ପରିବର୍ତ୍ତନ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ସଂଯତ ଓ ସ୍ଥିର ରହେ।
Verse 15
सुखमापतितं सेवेद् दुः:खमापतितं वहेत्
ସୁଖ ଆପେଆପେ ଆସିଲେ ତାହାକୁ ଗ୍ରହଣ କରି ଉପଭୋଗ କର; ଦୁଃଖ ଅନାହୁତ ଆସିଲେ ତାହାକୁ ଧୈର୍ୟରେ ବହନ କର।
Verse 16
तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत्
ତପସ୍ୟାଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କିଛି ନାହିଁ; ତପସ୍ୟା ଦ୍ୱାରା ମଣିଷ ମହତ୍ ଫଳ ପାଏ।
Verse 17
सत्यमार्जवमक्रोध: संविभागो दम: शम:,“महाराज! सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, देवता और अतिथियोंको देकर अन्न आदि ग्रहण करना, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, दूसरोंके दोष न देखना, हिंसा न करना, बाहर- भीतरकी पवित्रता रखना तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंको काबूमें रखना--ये पुण्यात्मा पुरुषोंके सद्गुण सबको पवित्र करनेवाले हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ସତ୍ୟ, ସରଳତା, କ୍ରୋଧହୀନତା, ଦେବତା ଓ ଅତିଥିଙ୍କୁ ଅର୍ପଣ କରି ପରେ ଅନ୍ନାଦିକୁ ବାଣ୍ଟି ଗ୍ରହଣ, ଇନ୍ଦ୍ରିୟସଂୟମ ଓ ଅନ୍ତଃଶାନ୍ତି—ଏହିସବୁ ପୁଣ୍ୟାତ୍ମ ନରମାନଙ୍କ ପାବନ ଗୁଣ; ନିଜକୁ ଓ ସମାଜକୁ ଶୁଦ୍ଧ କରେ।
Verse 18
अनसूयाविहिंसा च शौचमिन्द्रियसंयम: । पावनानि महाराज नराणां पुण्यकर्मणाम्,“महाराज! सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, देवता और अतिथियोंको देकर अन्न आदि ग्रहण करना, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, दूसरोंके दोष न देखना, हिंसा न करना, बाहर- भीतरकी पवित्रता रखना तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंको काबूमें रखना--ये पुण्यात्मा पुरुषोंके सद्गुण सबको पवित्र करनेवाले हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ଅନସୂୟା (ଅନ୍ୟର ଗୁଣରେ ଦୋଷ ନ ଦେଖିବା), ଅହିଂସା, ଶୌଚ (ବାହ୍ୟ-ଆନ୍ତରିକ ପବିତ୍ରତା) ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟସଂୟମ—ଏହିସବୁ ପୁଣ୍ୟକର୍ମରେ ନିଷ୍ଠ ନରମାନଙ୍କ ପାବନ ଗୁଣ।
Verse 19
अधर्मरुचयो मूढास्तिर्यग्गतिपरायणा: । कृच्छाां योनिमनुप्राप्ता न सुखं विन्दते जना:,“जो लोग अधर्ममें रुचि रखनेवाले हैं, वे मूढ़ मानव पशु-पक्षी आदि तिर्यग्-योनियोंमें जन्म ग्रहण करते हैं। उन कष्टदायक योनियोंमें पड़कर वे कभी सुख नहीं पाते हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯେ ମୂଢ ଲୋକ ଅଧର୍ମରେ ରୁଚି ରଖନ୍ତି, ସେମାନେ ତିର୍ୟଗ୍ଗତିକୁ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି—ପଶୁ, ପକ୍ଷୀ ଆଦି ନୀଚ ଯୋନିରେ ଜନ୍ମ ନେନ୍ତି। ସେହି କଷ୍ଟଦାୟକ ଯୋନିରେ ପଡ଼ି ସେମାନେ ସୁଖ ପାଆନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 20
इह यत् क्रियते कर्म तत् परत्रोपयुज्यते । तस्माच्छरीरं युञज्जीत तपसा नियमेन च,“इस लोकमें जो कर्म किया जाता है, उसका फल परलोकमें भोगना पड़ता है। इसलिये अपने शरीरको तप और नियमोंके पालनमें लगावे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏହି ଲୋକରେ ଯେ କର୍ମ କରାଯାଏ, ସେହି କର୍ମ ପରଲୋକରେ ଫଳଦାୟକ ହୁଏ। ତେଣୁ ତପ ଓ ନିୟମପାଳନରେ ଶରୀରକୁ ନିଯୁକ୍ତ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 21
यथाशक्ति प्रयच्छेत सम्पूज्याभिप्रणम्य च । काले प्राप्ते च हृष्टात्मा राजन् विगतमत्सर:,“राजन! समयपर यदि कोई अतिथि आ जाय तो क्रोधरहित और प्रसन्नचित्त होकर अपनी शक्तिके अनुसार उसे दान दे; और विधिवत् पूजन करके उसे प्रणाम करे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ଯଥାସମୟରେ ଅତିଥି ଆସିଲେ, ମତ୍ସର ଓ କ୍ରୋଧ ତ୍ୟାଗ କରି ହୃଷ୍ଟଚିତ୍ତ ହୋଇ, ଯଥାଶକ୍ତି ଦାନ ଦିଅ; ବିଧିମତେ ପୂଜା କରି ପ୍ରଣାମ କର।
Verse 22
सत्यवादी लभेतायुरनायासमथार्जवम् | अक्रोधनो5नसूयश्न निर्वतिं लभते पराम्,'सत्यवादी मनुष्य दीर्घ आयु, क्लेशशून्यता (सुख) तथा सरलता प्राप्त करता है। जो क्रोध नहीं करता और दूसरोंके दोष नहीं देखता है, उसे परमानन्दपदकी प्राप्ति होती है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯେ ସତ୍ୟ କହେ, ସେ ଦୀର୍ଘାୟୁ, କ୍ଲେଶହୀନ ସୁଖ ଓ ସରଳତା ପାଏ। ଯେ କ୍ରୋଧରହିତ ଏବଂ ଅନ୍ୟର ଦୋଷ ଖୋଜେ ନାହିଁ, ସେ ପରମ ଶାନ୍ତି ଓ ସନ୍ତୋଷ ପାଏ।
Verse 23
दान्त: शमपर: शश्वत् परिक्लेशं न विन्दति । न च तप्यति दान्तात्मा दृष्टवा परगतां श्रियम्,“जो सदा अपनी इन्द्रियोंकों संयममें रखकर मनका निग्रह करता है, उसे कभी क्लेशका सामना नहीं करना पड़ता। जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, वह दूसरोंकी सम्पत्तिको देखकर संतप्त नहीं होता है”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯେ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଦମନୀ ଏବଂ ସଦା ଶମରେ ନିଷ୍ଠ, ସେ ନିରନ୍ତର କ୍ଲେଶ ପାଉନାହିଁ। ଯେ ମନକୁ ଜିତିଛି, ସେ ଅନ୍ୟର ସମୃଦ୍ଧି ଦେଖି ଈର୍ଷ୍ୟାରେ ଜଳେ ନାହିଁ।
Verse 24
संविभक्ता च दाता च भोगवान् सुखवान् नर: । भवत्यहिंसकश्चैव परमारोग्यमश्चुते,“जो देवताओं और अतिथियोंको उनका भाग समर्पित करता है वह भोगसामग्रीसे सम्पन्न होता है। दान करनेवाला मनुष्य सुखी होता है। जो किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता उसे उत्तम आरोग्यकी प्राप्ति होती है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯେ ଯଥାଯଥ ଭାଗ ବଣ୍ଟନ କରି—ବିଶେଷକରି ଦେବତା ଓ ଅତିଥିଙ୍କୁ—ଅର୍ପଣ କରେ, ସେ ଭୋଗସାଧନରେ ସମ୍ପନ୍ନ ହୁଏ। ଦାନଶୀଳ ମନୁଷ୍ୟ ସୁଖୀ ରହେ। ଏବଂ ଯେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ପ୍ରତି ଅହିଂସକ, ସେ ପରମ ଆରୋଗ୍ୟ ପାଏ।
Verse 25
मान्यमानयिता जन्म कुले महति विन्दति । व्यसनैर्न तु संयोगं प्राप्रोति विजितेन्द्रिय:,(विन्दते सुखमत्यन्तमिह लोके परत्र च ।) “जो माननीय पुरुषोंका सम्मान करता है वह महान् कुलमें जन्म पाता है। जितेन्द्रिय पुरुष कभी दुर्व्यसनोंमें नहीं फँसता है। उसे इस लोक और परलोकमें भी अत्यन्त सुखकी प्राप्ति होती है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯେ ମାନ୍ୟଜନଙ୍କୁ ମାନ ଦିଏ, ସେ ମହାନ କୁଳରେ ଜନ୍ମ ପାଏ। ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ପୁରୁଷ ବ୍ୟସନ ଓ ବିପଦର ସଙ୍ଗ ପାଉନାହିଁ; ସେ ଇହଲୋକ ଓ ପରଲୋକ—ଦୁହିଁଠାରେ—ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁଖ ପାଏ।
Verse 26
शुभानुशयबुद्धिह्हि संयुक्त: कालधर्मणा । प्रादुर्भवति तद्योगात् कल्याणमतिरेव स:,“जिसकी बुद्धि शुभमें ही आसक्त होती है, वह मनुष्य मृत्युको प्राप्त होनेपर उस शुभके संयोगसे कल्याणबुद्धि होकर ही उत्पन्न होता है”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯାହାର ବୁଦ୍ଧି ଶୁଭ ସଂସ୍କାରରେ ନିତ୍ୟ ଆସକ୍ତ, ସେ କାଳଧର୍ମର ସଂଯୋଗେ—ଅର୍ଥାତ୍ ମୃତ୍ୟୁକ୍ଷଣେ—ସେହି ଶୁଭ ପ୍ରବୃତ୍ତିର ଯୋଗବଳରେ କଲ୍ୟାଣମତି ହୋଇ ପୁନଃ ପ୍ରାଦୁର୍ଭବ ହୁଏ।
Verse 27
युधिछिर उवाच भगवन् दानधर्माणां तपसो वा महामुने । किंस्विद् बहुगुणं प्रेत्य कि वा दुष्करमुच्यते,युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! महामुने! दानधर्म एवं तपस्या--इनमेंसे किसका फल परलोकमें अधिक माना गया है? और इन दोनोंमें कौन दुष्कर बताया जाता है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଭଗବନ୍, ମହାମୁନେ! ଦାନଧର୍ମ ଓ ତପସ୍ୟା—ଏହି ଦୁଇଟି ମଧ୍ୟରୁ ପରଲୋକରେ କାହାର ଫଳ ଅଧିକ ମନାଯାଏ? ଏବଂ ଏହି ଦୁଇଟି ମଧ୍ୟରୁ କେଉଁଟି ଅଧିକ ଦୁଷ୍କର ବୋଲି କୁହାଯାଏ?
Verse 28
व्यास उवाच दानान्न दुष्करं तात पृथिव्यामस्ति किंचन | अर्थ च महती तृष्णा स च दुःखेन लभ्यते,व्यासजीने कहा--तात! दानसे बढ़कर दुष्कर कार्य इस पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है। लोगोंको धनका लोभ अधिक होता है और धन मिलता भी बड़े कष्टसे है
ବ୍ୟାସ କହିଲେ— ତାତ! ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଦାନଠାରୁ ଅଧିକ ଦୁଷ୍କର କିଛି ନାହିଁ। ଧନ ପ୍ରତି ଲୋକଙ୍କର ତୃଷ୍ଣା ବହୁତ ବଡ଼, ଏବଂ ଧନ ମଧ୍ୟ ବଡ଼ କଷ୍ଟରେ ଲଭ୍ୟ ହୁଏ।
Verse 29
परित्यज्य प्रियान् प्राणाम् धनार्थ हि महामते । प्रविशन्ति नरा वीरा: समुद्रमटवीं तथा,महामते! कितने ही साहसी मनुष्य रत्नोंके लिये अपने प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर समुद्रमें गोते लगाते हैं और धनके लिये घोर जंगलोंमें भटकते फिरते हैं
ବ୍ୟାସ କହିଲେ— ହେ ମହାମତେ! ଧନ ପାଇଁ ଲୋକେ ପ୍ରିୟ ପ୍ରାଣ ପ୍ରତି ମୋହକୁ ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତି। କେହି ବୀର ସମୁଦ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତି, ଆଉ କେହି ଲାଭ ପାଇଁ ଭୟଙ୍କର ଅରଣ୍ୟରେ ଭ୍ରମଣ କରନ୍ତି।
Verse 30
कृषिगोरक्ष्यमित्येके प्रतिपद्यन्ति मानवा: । पुरुषा: प्रेष्पतामेके निर्गच्छन्ति धनार्थिन:,कुछ मनुष्य कृषि तथा गोरक्षाको अपनी जीविकाका साधन बनाते हैं, कुछ लोग धनकी इच्छासे नौकरी करनेके लिये दूर निकल जाते हैं
ବ୍ୟାସ କହିଲେ— କେହି ମନୁଷ୍ୟ କୃଷି ଓ ଗୋରକ୍ଷାକୁ ଜୀବିକାର ଉପାୟ କରନ୍ତି; ଆଉ କେହି ଧନଲୋଭରେ ପରସେବା କରିବାକୁ ଦୂରକୁ ଯାଆନ୍ତି।
Verse 31
तस्माद् दु:खार्जितस्यैव परित्याग: सुदुष्कर: । न दुष्करतरं दानात् तस्माद् दान॑ मतं मम,अतः दुःख सहकर कमाये हुए धनका परित्याग करना अत्यन्त कठिन है। दानसे बढ़कर दूसरा कोई दुष्कर कार्य नहीं है। इसलिये मेरे मतमें दान ही सर्वश्रेष्ठ है
ଏହିପରି ଦୁଃଖ ସହି ଅର୍ଜିତ ଧନକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଷ୍କର। ଦାନଠାରୁ ଅଧିକ ଦୁଷ୍କର କିଛି ନାହିଁ; ତେଣୁ ମୋ ମତରେ ଦାନ ହିଁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 32
विशेषस्त्वत्र विज्ञेयो न्यायेनोपार्जितं धनम् | पात्रे काले च देशे च साधुभ्य: प्रतिपादयेत्,यहाँ विशेष बात यह जाननी चाहिये कि मनुष्य न्यायसे कमाये गये धनको उत्तम देश, काल और पात्रका विचार करते हुए श्रेष्ठ पुरुषोंको दे
ଏଠାରେ ଏକ ବିଶେଷ କଥା ଜାଣିବା ଉଚିତ—ନ୍ୟାୟରେ ଉପାର୍ଜିତ ଧନକୁ ପାତ୍ର, ଦେଶ ଓ କାଳ ବିଚାର କରି ସାଧୁ-ସଜ୍ଜନଙ୍କୁ ଦାନ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 33
अन्यायात् समुपात्तेन दानधर्मो धनेन यः । क्रियते न स कर्तरिं त्रायते महतो भयात्,अन्यायसे प्राप्त किये हुए धनके द्वारा जो दानधर्म किया जाता है वह कर्ताकी महान् भयसे रक्षा नहीं कर पाता
ଅନ୍ୟାୟରେ ଅର୍ଜିତ ଧନଦ୍ୱାରା ଯେ ଦାନଧର୍ମ କରାଯାଏ, ସେହି ଦାନ କର୍ତ୍ତାକୁ ମହାଭୟରୁ ରକ୍ଷା କରିପାରେ ନାହିଁ।
Verse 34
पात्रे दानं स्वल्पमपि काले दत्तं युधिष्ठिर मनसा हि विशुद्धेन प्रेत्यानन्तफलं स्मृतम्,युधिष्ठिर! यदि विशुद्ध मनसे उत्तम समयपर सत्पात्रको थोड़ा-सा भी दान दिया गया हो तो वह परलोकमें अनन्त फल देनेवाला माना गया है
ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ଶୁଦ୍ଧ ମନେ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସମୟରେ ସତ୍ପାତ୍ରକୁ ଦିଆଯାଇଥିବା ଅଳ୍ପ ଦାନ ମଧ୍ୟ ପରଲୋକରେ ଅନନ୍ତ ଫଳଦାୟକ ବୋଲି ସ୍ମୃତିରେ କୁହାଯାଇଛି।
Verse 35
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ब्रीहिद्रोणपरित्यागाद् यत् फलं प्राप मुदूगल:,इस विषयमें जानकार लोग इस पुराने इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं कि मुद्गल ऋषिने एक द्रोण धानका दान करके महान् फल प्राप्त किया था
ଏହି ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ପଣ୍ଡିତମାନେ ଗୋଟିଏ ପୁରାତନ ଇତିହାସ ଉଦାହରଣ ଦିଅନ୍ତି—ଗୋଟିଏ ଦ୍ରୋଣ ଧାନ ତ୍ୟାଗ କରି ମୁଦୂଗଳ ଋଷି ମହାନ ଫଳ ପାଇଥିଲେ।
Verse 66
युधिष्ठिरमुदी क्षन्तः सेहुर्दु:खमनुत्तमम् । अर्जुन, दोनों भाई नकुल-सहदेव, यशस्विनी द्रौपदी तथा सर्वश्रेष्ठ बलवान् महातेजस्वी भीमसेन भी राजा युधिष्ठिरकी ओर देखते हुए महान्-से-महान् दुःखको चुपचाप सहते रहे
ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ନିର୍ନିମେଷ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଦେଖି ସେମାନେ ଅନୁତ୍ତମ ଦୁଃଖ ସହିଲେ। ଅର୍ଜୁନ, ଦୁଇ ଭାଇ ନକୁଳ-ସହଦେବ, ଯଶସ୍ବିନୀ ଦ୍ରୌପଦୀ ଏବଂ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ବଳବାନ ମହାତେଜସ୍ବୀ ଭୀମସେନ—ସମସ୍ତେ ନିରବରେ ମହାଦୁଃଖ ବହନ କଲେ।
Verse 76
वपुरन्यदिवाकार्षुरुत्साहामर्षचेष्टितै: । “अब तो वनवासका थोड़ा-सा ही समय शेष रह गया है, ऐसा समझकर नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने उत्साह एवं अमर्षयुक्त चेष्टाओंसे अपने शरीरको किसी और ही प्रकारका बना लिया था
ବନବାସର ଅତି ଅଳ୍ପ ସମୟ ମାତ୍ର ଅବଶିଷ୍ଟ ଅଛି—ଏହା ବୁଝି ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଉତ୍ସାହ ଓ ଧର୍ମସମ୍ମତ ଅମର୍ଷରେ ପ୍ରେରିତ ଚେଷ୍ଟାଦ୍ୱାରା ନିଜ ଦେହକୁ ଯେନ ଅନ୍ୟ ରୂପରେ ପରିଣତ କରିଦେଲେ; ସେମାନେ ସର୍ବଥା ଭିନ୍ନ ଭାବେ ଦିଶିଲେ।
Verse 103
तोषयन् प्रणिपातेन व्यासं पाण्डवनन्दन: । जब वे आसनपर बैठ गये तब पाण्डवोंका आनन्द बढ़ानेवाले युधिष्ठिर अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सेवाकी इच्छासे व्यासजीके पास ही बैठ गये और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उन्होंने महर्षिको संतुष्ट किया
ସମସ୍ତେ ଆସନରେ ବସିଗଲାପରେ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଆନନ୍ଦବର୍ଦ୍ଧକ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଇନ୍ଦ୍ରିୟସଂଯମ କରି ସେବାଭାବରେ ବ୍ୟାସଙ୍କ ସମୀପରେ ବସିଲେ। ସେ ମହର୍ଷିଙ୍କ ପାଦରେ ପ୍ରଣାମ କରି ବ୍ୟାସଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କଲେ।
Verse 116
महर्षिरनुकम्पार्थमब्रवीद् बाष्पगद्गदम् | अपने पौत्रोंको वनवासके कष्टसे दुर्बल तथा जंगली फल-मूल खाकर जीवननिर्वाह करते देख महर्षि व्यासको बड़ी दया आयी। वे उनपर कृपा करनेके लिये नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गदगद कण्ठसे बोले--
ବନବାସର କଷ୍ଟରେ ଦୁର୍ବଳ ହୋଇ ବନ୍ୟ ଫଳମୂଳ ଖାଇ ଜୀବନ ଧାରଣ କରୁଥିବା ନିଜ ପୌତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଦେଖି ମହର୍ଷି ବ୍ୟାସ ଅତ୍ୟନ୍ତ କରୁଣାବିଷ୍ଟ ହେଲେ। କୃପା କରିବାକୁ ଚାହିଁ ସେ ନୟନରୁ ଅଶ୍ରୁ ବହାଇ ଗଦ୍ଗଦ କଣ୍ଠରେ କହିଲେ।
Verse 146
उदयास्तमनज्ञो हि न हृष्पति न शोचति । “नरश्रेष्ठी कोई भी इस जगत्में ऐसा सुख नहीं पाता, जिसका कभी अन्त न हो। उत्तम बुद्धिसे युक्त ज्ञानवान् पुरुष ही उत्पत्ति, स्थिति और लयके अधिष्ठानरूप परमात्माको जानकर कभी हर्ष और शोक नहीं करता है
ଉଦୟ-ଅସ୍ତକୁ ନ ଜାଣୁଥିବା ବ୍ୟକ୍ତି ନ ହର୍ଷ କରେ, ନ ଶୋକ କରେ। କାରଣ, ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଏହି ଜଗତରେ କେହି ମଧ୍ୟ ଏମିତି ସୁଖ ପାଉନାହିଁ ଯାହାର କେବେ ଅନ୍ତ ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ସୁବୁଦ୍ଧିସମ୍ପନ୍ନ ଜ୍ଞାନୀ ପୁରୁଷ ଉତ୍ପତ୍ତି, ସ୍ଥିତି ଓ ଲୟର ଅଧିଷ୍ଠାନସ୍ୱରୂପ ପରମାତ୍ମାକୁ ଜାଣି ହର୍ଷ-ଶୋକ ଉଭୟରୁ ମୁକ୍ତ ରହେ।
Verse 153
कालप्राप्तमुपासीत सस्यानामिव कर्षक: । “अतः विवेकी पुरुषको उचित है कि प्राप्त हुए सुखका (त्यागपूर्वक) सेवन करे और स्वतः आये हुए दुःखका भार भी (टैर्यपूर्वक) वहन करे। जैसे किसान बीज बोकर समयके अनुसार प्रारब्धवश जितना अन्न मिलता है, उसे ग्रहण करता है; उसी प्रकार मनुष्य समय- समयपर दैववश प्राप्त हुए सुख तथा दुःखको स्वीकार करें
ଅତଏବ ବିବେକୀ ପୁରୁଷ ଆସିଥିବା ସୁଖକୁ ଆସକ୍ତି ବିନା ଉପଭୋଗ କରୁ ଏବଂ ନିଜେଇ ଆସୁଥିବା ଦୁଃଖର ଭାରକୁ ଧୈର୍ଯ୍ୟରେ ବହନ କରୁ। ଯେପରି କୃଷକ ବୀଜ ବପନ କରି କାଳାନୁସାରେ ଦୈବବଶତଃ ଯେତେ ଧାନ୍ୟ ପାଏ, ସେତେ ଗ୍ରହଣ କରେ; ସେହିପରି ମନୁଷ୍ୟ ମଧ୍ୟ ସମୟେ ସମୟେ ଦୈବବଶତଃ ପ୍ରାପ୍ତ ସୁଖ ଓ ଦୁଃଖ—ଦୁହେଁକୁ ସ୍ୱୀକାର କରୁ।
Verse 166
नासाध्यं तपस: किंचिदिति बुद्धयस्व भारत । “भारत! तपसे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। तपसे मनुष्य महत्पद (परमात्मा)-को प्राप्त कर लेता है। तुम इस बातको अच्छी तरह जान लो कि तपस्यासे कुछ भी असाध्य नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ, ଏହା ଭଲଭାବେ ବୁଝ: ତପସ୍ୟା ଦ୍ୱାରା ଅସାଧ୍ୟ ବୋଲି କିଛି ନାହିଁ। ତପ ହିଁ ପରମ ସାଧନ; ତାହାରେ ମନୁଷ୍ୟ ପରମ ପଦକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ।
Verse 259
इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि व्रीहिद्रौणिकपर्वणि दानदुष्करत्वक थने एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବର ଅନ୍ତର୍ଗତ ବ୍ରୀହିଦ୍ରୌଣିକ ଉପପର୍ବରେ ଦାନର ଦୁଷ୍କରତା ବିଷୟକ ଦୁଇଶେ ଊଣଷଠିତମ (259ତମ) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The problem is how to stop a powerful aggressor protected by a boon without violating the constraints that make direct defeat infeasible; the chapter frames a rule-aware solution through incarnation and alliance-building rather than unrestricted force.
The text models governance as multi-layered causality: cosmic order responds to disorder through authorized, proportionate mechanisms—delegation, embodiment, and the creation of enabling conditions—highlighting that efficacy operates within normative limits.
No explicit phalaśruti appears in this excerpted chapter; its meta-function is etiological and explanatory, situating later events within a broader causal architecture rather than promising a stated recitational benefit.