
Pātāla-varṇana (Nārada’s Description of the Netherworld) / पातालवर्णनम्
Upa-parva: Mātali–Kaṇva Saṃvāda (Mythic-Geographic Excursus on Pātāla)
Chapter 97 presents Nārada’s structured description of Pātāla as a city located at the ‘navel’ of nāga-loka and frequented by daityas and dānavas. The account combines mythic geography with physical marvels: beings entering emit fearful cries; an ‘asuric fire’ burns while consuming water; amṛta is said to have been deposited there after being drunk by the devas, with observable effects on Soma’s waxing and waning. A divine ‘horse-head’ (hayaśiras) periodically arises, golden in appearance, filling the world with waters; the realm’s name is etiologically linked to the descent of water-forms. Airāvata is described as drawing water for the benefit of the world, enabling Indra’s cool rains. Aquatic creatures drink Soma’s radiance; those struck by the sun’s rays die by day and revive at night; the moon’s ray-contact, associated with amṛta, revivifies embodied beings. The chapter also notes daityas bound and diminished by Indra, mentions Bhūtapati performing austerity for universal welfare, and describes govrata ascetics—defined by extreme simplicity and non-fixity. It concludes with a mysterious luminous ‘egg’ in the waters of unknown origin, associated with an eschatological fire that will burn the three worlds at the end-time; Kaṇva, hearing this, directs Mātali to move on, finding no suitable choice there.
Chapter Arc: देवसारथि मातलि अपनी पुत्री के लिए योग्य वर की खोज में निकलते हैं; मार्ग में नारद उनसे पूछते हैं—यह यात्रा स्वेच्छा से है या इन्द्र के आदेश से? → मातलि नारद को अपना प्रयोजन बताते हुए वरुणलोक की ओर बढ़ते हैं; वहाँ पहुँचकर दोनों दिव्य लोक की अद्भुत, भय-आकर्षक वस्तुओं और रहस्यमय वैभव को देखते हैं—ऐसी वस्तुएँ जिनका संबंध देव-शस्त्रों, तेजस्वी अग्नि और लोक-रक्षा से है। → वरुण के सरोवर में जाग्रत महातेजस्वी अग्नि और उसके निकट सुरक्षित वैष्णव चक्र का वर्णन; साथ ही ‘गाण्डी’ (वज्र-गाँठ) से निर्मित गाण्डीव धनुष का दिव्य-परिचय—जो आवश्यकता पड़ने पर असंख्य-गुणा बल धारण कर लेता है—इस अध्याय का विस्मय-शिखर बनता है। → नारद स्मरण कराते हैं कि वरुणलोक में देखने योग्य बहुत कुछ है, पर मातलि का मुख्य कार्य वर-खोज है; अतः वे विलंब न कर आगे बढ़ने का निश्चय करते हैं। → मातलि की वर-खोज आगे किन लोकों/वंशों तक जाएगी और किसे योग्य वर ठहराया जाएगा—यह प्रश्न अगले अध्यायों के लिए खुला रह जाता है।
Verse 1
अ-क्राछ अष्टनवतितमोब् ध्याय: मातलिका अपनी पुत्रीके लिये वर खोजनेके निमित्त नारदजीके साथ वरुणलोकमें भ्रमण करते हुए अनेक आश्चर्यजनक वस्तुएँ देखना कण्व उवाच मातलिस्तु व्रजन् मार्गे नारदेन महर्षिणा । वरुणं गच्छता द्र॒ष्टं समागच्छद् यदृच्छया,कण्व मुनि कहते हैं--राजन! उसी समय महर्षि नारद वरुणदेवतासे मिलनेके लिये उधर जा रहे थे। नागलोकके मार्ममें जाते हुए मातलिकी नारदजीके साथ अकस्मात् भेंट हो गयी
କଣ୍ୱ ମୁନି କହିଲେ—ରାଜନ୍! ସେହି ସମୟରେ ମହର୍ଷି ନାରଦ ବରୁଣଦେବଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇଁ ସେଇ ପଥରେ ଯାଉଥିଲେ। ପଥେ ଯାଉଥିବା ମାତଲିଙ୍କ ସହ ତାଙ୍କର ଯଦୃଚ୍ଛାରେ ସାକ୍ଷାତ୍ ହେଲା।
Verse 2
नारदो<थाब्रवीदेनं क्व भवान् गन्तुमुद्यत: । स्वेन वा सूत कार्येण शासनाद् वा शतक्रतो:,नारदजीने उनसे पूछा--देवसारथे! तुम कहाँ जानेको उद्यत हुए हो? तुम्हारी यह यात्रा किसी निजी कार्यसे अथवा देवेन्द्रके आदेशसे हुई है?
ତାପରେ ନାରଦ କହିଲେ—“ହେ ଦେବସାରଥି! ଆପଣ କେଉଁଠାକୁ ଯିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ? ଏହି ଯାତ୍ରା ଆପଣଙ୍କ ନିଜ ସୂତକାର୍ଯ୍ୟରୁ, କିମ୍ବା ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଆଦେଶରୁ?”
Verse 3
मातलिनरिदेनैवं सम्पृष्ट: पथि गच्छता । यथावत् सर्वमाचष्ट स्वकार्य नारदं प्रति
ପଥେ ଯାଉଥିବାବେଳେ ନାରଦ ଏପରି ପଚାରିଲେ, ମାତଲି ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ସବୁ କଥା ଯଥାର୍ଥରେ ନାରଦଙ୍କୁ କହିଲେ।
Verse 4
मार्गमें जाते हुए नारदजीके इस प्रकार पूछनेपर मातलिने उनसे अपना सारा कार्य यथावत््रूपसे बताया ।। तमुवाचाथ स मुनिर्गच्छाव: सहिताविति । सलिलेशदिदृक्षार्थमहमप्युद्यतो दिव:,तब उन मुनिने मातलिसे कहा--'हम दोनों साथ-साथ चलें। मैं भी जलके स्वामी वरुणदेवका दर्शन करनेकी इच्छासे देवलोकसे आ रहा हूँ
ତାପରେ ସେ ମୁନି ମାତଲିଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଆସ, ଆମେ ଦୁହେଁ ସହିତେ ଯାଉ। ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଦେବଲୋକରୁ ଜଳାଧିପତି ବରୁଣଦେବଙ୍କୁ ଦେଖିବା ଇଚ୍ଛାରେ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇଛି।”
Verse 5
अहं ते सर्वमाख्यास्थे दर्शयन् वसुधातलम् । दृष्टवा तत्र वरं कंचिद् रोचयिष्याव मातले,“मैं तुम्हें पृथ्वीके नीचेके लोकोंको दिखाते हुए वहाँकी सब वस्तुओंका परिचय दूँगा। मातले! वहाँ हम दोनों किसी योग्य वरको देखकर पसंद करेंगे”
ମୁଁ ତୁମକୁ ପୃଥିବୀର ତଳସ୍ଥ ଲୋକମାନେ ଦେଖାଇ ଦେଖାଇ ସେଠାର ସମସ୍ତ ବସ୍ତୁର ପରିଚୟ ଦେବି। ହେ ମାତଲି! ସେଠାରେ ଯୋଗ୍ୟ ବରକୁ ଦେଖି ଆମେ ଦୁହେଁ ତାକୁ ପସନ୍ଦ କରିବୁ।
Verse 6
अवगाह तु तौ भूमिमुभौ मातलिनारदौ । ददृशाते महात्मानौ लोकपालमपाम्पतिम्,तदनन्तर मातलि और नारद दोनों महात्मा पृथ्वीके भीतर प्रवेश करके जलके स्वामी लोकपाल वरुणके समीप गये
ତାପରେ ମାତଲି ଓ ନାରଦ—ଏଇ ଦୁଇ ମହାତ୍ମା—ପୃଥିବୀର ଭିତରକୁ ଅବଗାହନ କଲେ। ସେଠାରେ ସେମାନେ ଜଳର ସ୍ୱାମୀ, ଲୋକପାଳ ବରୁଣଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ।
Verse 7
तत्र देवर्षिसदृशीं पूजां स प्राप नारद: । महेन्द्रसदृशीं चैव मातलि: प्रत्यपद्यत,नारदजीको वहाँ देवर्षियोंके योग्य और मातलिको देवराज इन्द्रके समान आदर-सत्कार प्राप्त हुआ
ସେଠାରେ ନାରଦ ଦେବର୍ଷିଙ୍କୁ ଯୋଗ୍ୟ ପୂଜା ପାଇଲେ, ଏବଂ ମାତଲି ମହେନ୍ଦ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ସମାନ ଆଦର-ସତ୍କାର ଲାଭ କଲେ।
Verse 8
तावुभौ प्रीतमनसौ कार्यवन्तौ निवेद्य ह । वरुणेनाभ्यनुज्ञाती नागलोकं विचेरतु:,तत्पश्चात् उन दोनोंने प्रसन्नचित्त होकर वरुणदेवतासे अपना कार्य निवेदन किया और उनकी आज्ञा लेकर वे नागलोकमें विचरने लगे
ତାପରେ ସେ ଦୁହେଁ ପ୍ରୀତମନେ ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟ ବରୁଣଙ୍କୁ ନିବେଦନ କରି, ତାଙ୍କର ଅନୁମତି ପାଇ ନାଗଲୋକରେ ବିଚରଣ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 9
नारद: सर्वभूतानामन्तर्भूमिनिवासिनाम् | जानंश्वकार व्याख्यान यन्तुः सर्वमशेषत:,नारदजी पाताललोकमें निवास करनेवाले सभी प्राणियोंको जानते थे। अतः उन्होंने इन्द्रसारथि मातलिको वहाँकी सब वस्तुओंके विषयमें विस्तारपूर्वक बताना आरम्भ किया
ପୃଥିବୀର ଅନ୍ତର୍ଭୂମିରେ ବସୁଥିବା ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ନାରଦ ଜାଣୁଥିଲେ; ତେଣୁ ସେ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସାରଥି ମାତଲିଙ୍କୁ ସେଠାର ସମସ୍ତ ଦୃଶ୍ୟ-ବସ୍ତୁ ବିଷୟରେ ନିର୍ବିଶେଷ ଭାବେ ବ୍ୟାଖ୍ୟା କରିବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 10
नारद उवाच दृष्टस्ते वरुण: सूत पुत्रपौत्रसमावृत: । पश्योदकपते: स्थान सर्वतोभद्रमृद्धिमत्,नारदजीने कहा--सूत! तुमने पुत्रों और पौत्रोंसे घिरे हुए वरुणदेवताका दर्शन किया है। देखो, यह जलेश्वर वरुणका समृद्धिशाली निवासस्थान है। इसका नाम है, सर्वतोभद्र
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ସୂତ! ପୁତ୍ର ଓ ପୌତ୍ରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତ୍ତ ବରୁଣଦେବଙ୍କୁ ତୁମେ ଦେଖିଛ। ଦେଖ, ଏହା ଜଳାଧିପତି ବରୁଣଙ୍କ ସମୃଦ୍ଧିମୟ ନିବାସ; ଏହାର ନାମ ‘ସର୍ବତୋଭଦ୍ର’।
Verse 11
एष पुत्रो महाप्राज्ञो वरुणस्येह गोपते: । एष वै शीलवृत्तेन शौचेन च विशिष्यते,ये गोपति वरुणके परम बुद्धिमान् पुत्र हैं; जो अपने उत्तम स्वभाव, सदाचार और पवित्रताके कारण अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं
ଏହିଏ ଏଠାରେ ଗୋପତି ବରୁଣଙ୍କ ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ ପୁତ୍ର। ଶୀଳ, ସଦ୍ବୃତ୍ତ ଓ ଶୌଚ ଦ୍ୱାରା ସେ ବିଶେଷ ଭାବେ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ।
Verse 12
एषोअस्य पुत्रो5भिमत: पुष्कर: पुष्करेक्षण: । रूपवान् दर्शनीयश्व सोमपुत्रया वृत: पति:,वरुणदेवके इन प्रिय पुत्रका नाम पुष्कर है। इनके नेत्र विकसित कमलके समान सुशोभित हैं। ये रूपवान् तथा दर्शनीय हैं। इसीलिये सोमकी पुत्रीने इनका पतिरूपसे वरण किया है
ଏହିଏ ତାଙ୍କର ପ୍ରିୟ ପୁତ୍ର ପୁଷ୍କର—ପଦ୍ମସଦୃଶ ନୟନଯୁକ୍ତ। ସେ ରୂପବାନ୍ ଓ ଦର୍ଶନୀୟ; ଏହି କାରଣରୁ ସୋମଙ୍କ କନ୍ୟା ତାଙ୍କୁ ପତିରୂପେ ବରଣ କରିଛନ୍ତି।
Verse 13
ज्योत्स्नाकालीति यामाहुर्द्धितीयां रूपत: श्रियम् । अदित्याश्वैव य: पुत्रो ज्येष्ठ: श्रेष्ठ: कृत: स्मृत:,सोमकी जो दूसरी पुत्री हैं, वे ज्योत्स्नाकालीके नामसे प्रसिद्ध हैं तथा रूपमें साक्षात् लक्ष्मीके समान जान पड़ती हैं। उन्होंने अदितिदेवीके ज्येष्ठ पुत्र सूर्यदेवको अपना श्रेष्ठ पति बनाया एवं माना है
ଯାହାକୁ ଲୋକେ ‘ଜ୍ୟୋତ୍ସ୍ନାକାଳୀ’ ବୋଲି କହନ୍ତି, ସେ ସୋମଙ୍କ ଦ୍ୱିତୀୟ କନ୍ୟା; ରୂପରେ ସେ ସାକ୍ଷାତ୍ ଶ୍ରୀ (ଲକ୍ଷ୍ମୀ) ସଦୃଶ। ସେ ଅଦିତିଙ୍କ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ପୁତ୍ର ସୂର୍ଯ୍ୟଦେବଙ୍କୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପତି ଭାବେ ମାନି ବରଣ କରିଛନ୍ତି।
Verse 14
भवन वारुणं पश्य यदेतत् सर्वकाउ्चनम् । यत् प्राप्य सुरतां प्राप्ता: सुरा: सुरपते: सखे,महेन्द्रमित्र! देखो, यह वरुणदेवताका भवन है, जो सब ओरसे सुवर्णका ही बना हुआ है। यहाँ पहुँचकर ही देवगण वास्तवमें देवत्वलाभ करते हैं
ହେ ମହେନ୍ଦ୍ରମିତ୍ର! ଦେଖ, ଏହା ବରୁଣଦେବଙ୍କ ଭବନ—ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ। ହେ ଦେବାଧିପତିଙ୍କ ସଖା, ଏଠାକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇ ଦେବଗଣ ସତ୍ୟରେ ଦେବତ୍ୱ ଲାଭ କରନ୍ତି।
Verse 15
एतानि हृतराज्यानां दैतेयानां सम मातले | दीप्यमानानि दृश्यन्ते सर्वप्रहरणान्युत,मातले! जिनके राज्य छीन लिये गये हैं, उन दैत्योंके ये देदीप्यमान सम्पूर्ण आयुध दिखायी देते हैं
କଣ୍ୱ କହିଲେ—ହେ ମାତଲି! ଯାହାଙ୍କର ରାଜ୍ୟ ହରଣ ହୋଇଛି ସେହି ଦୈତ୍ୟମାନଙ୍କର ଏହି ସମସ୍ତ ଆୟୁଧ ଦେଖ; ଏଗୁଡ଼ିକ ନିଜ ତେଜରେ ଦୀପ୍ତିମାନ, ଜ୍ୱାଳାମୟ ପରି ଦିଶୁଛି।
Verse 16
अक्षयाणि किलैतानि विवर्तन्ते सम मातले । अनुभावप्रयुक्तानि सुरैरवजितानि ह,देवसारथे! ये सारे अस्त्र-शस्त्र अक्षय हैं और प्रहार करनेपर शत्रुको आहत करके पुनः अपने स्वामीके हाथमें लौट आते हैं। पहले दैत्यलोग अपनी शक्तिके अनुसार इनका प्रयोग करते थे, परंतु अब देवताओंने इन्हें जीतकर अपने अधिकारमें कर लिया है
କଣ୍ୱ କହିଲେ—ହେ ମାତଲି! ଏହି ଆୟୁଧଗୁଡ଼ିକ ନିଶ୍ଚୟ ଅକ୍ଷୟ। ନିଜ ଅନୁଭାବରେ ପ୍ରୟୁକ୍ତ ହେଲେ ଏମାନେ ଶତ୍ରୁକୁ ଆଘାତ କରି ପୁଣି ଯଥାର୍ଥ ସ୍ୱାମୀଙ୍କ ହାତକୁ ଫେରିଆସନ୍ତି। ପୂର୍ବେ ଦାନବମାନେ ନିଜ ବଳାନୁସାରେ ଏମାନଙ୍କୁ ପ୍ରୟୋଗ କରୁଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ଏବେ, ହେ ଦେବସାରଥି, ଦେବମାନେ ଏମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରି ନିଜ ଅଧୀନରେ ଆଣିଛନ୍ତି।
Verse 17
अत्र राक्षसजात्यश्ष दैत्यजात्यक्षु मातले । दिव्यप्रहरणाश्चासन् पूर्वदैवतनिर्मिता:,मातले! इन स्थानोंमें राक्षस और दैत्यजातिके लोग रहते हैं। यहाँ दैत्योंके बनाये हुए बहुत-से दिव्यास्त्र भी रहे हैं
କଣ୍ୱ କହିଲେ—ହେ ମାତଲି! ଏଠାରେ ରାକ୍ଷସ ଓ ଦୈତ୍ୟଜାତିର ପ୍ରାଣୀମାନେ ବସନ୍ତି। ଏଠାରେ ପୂର୍ବକାଳରେ ଦେବମାନେ ନିର୍ମାଣ କରିଥିବା ଅନେକ ଦିବ୍ୟ ଆୟୁଧ ମଧ୍ୟ ଅଛି।
Verse 18
अग्निरेष महार्चिष्माज्जागर्ति वारुणे हदे । वैष्णवं चक्रमाविद्धं विधूमेन हविष्मता,ये महातेजस्वी अग्निदेव वरुणदेवताके सरोवरमें प्रकाशित होते हैं। इन धूमरहित अग्निदेवने भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्रको भी अवरुद्ध कर दिया था
କଣ୍ୱ କହିଲେ—ଦେଖ, ଏହି ମହାର୍ଚ୍ଚିଷ୍ମାନ୍ ଅଗ୍ନିଦେବ ବରୁଣଙ୍କ ହ୍ରଦରେ ଜାଗ୍ରତ ରହି ପାହାରା ଦେଉଛନ୍ତି। ଧୂମରହିତ ହବିର ବଳରେ ସେ ବୈଷ୍ଣବ ଚକ୍ରକୁ ମଧ୍ୟ ଅବରୋଧ କରି ରୋକିଦେଇଥିଲେ।
Verse 19
एष गाण्डीमयश्वापो लोकसंहारसम्भूत: । रक्ष्यते दैवतैर्नित्यं यतस्तद् गाण्डिवं धनु:,वज्रकी गाँठको “गाण्डी” कहा गया है। यह धनुष उसीका बना हुआ है, इसलिये गाण्डीव कहलाता है। जगत्का संहार करनेके लिये इसका निर्माण हुआ है। देवतालोग सदा इसकी रक्षा करते हैं
କଣ୍ୱ କହିଲେ—ଏହା ଗାଣ୍ଡୀବ ଧନୁ; ଲୋକସଂହାରର ନିମିତ୍ତେ ଉତ୍ପନ୍ନ। ସେହି କାରଣରୁ ଦେବମାନେ ଏହାକୁ ସଦା ରକ୍ଷା କରନ୍ତି।
Verse 20
एष कृत्ये समुत्पन्ने तत् तद् धारयते बलम् । सहस्रशतसंख्येन प्राणेन सततं ध्रुव:,यह धनुष आवश्यकता पड़नेपर लाखगुनी शक्तिसे सम्पन्न हो वैसे-वैसे ही बलको भी धारण करता है और सदा अविचल बना रहता है
ଯେତେବେଳେ କୌଣସି କର୍ତ୍ତବ୍ୟ କିମ୍ବା ସଙ୍କଟ ଉପସ୍ଥିତ ହୁଏ, ସେ ସେହି କାର୍ଯ୍ୟ ଯେତେ ବଳ ଚାହେ, ତାହା ସଂଗ୍ରହ କରି ଧାରଣ କରେ। ଶତ-ସହସ୍ର ପ୍ରାଣଶକ୍ତିରେ ବୃଦ୍ଧି ପାଇ ସେ ସଦା ଧ୍ରୁବ, ଅଚଳ ରହେ—ଆବଶ୍ୟକତାରେ ଅପାର ଶକ୍ତି ଧାରଣ କରୁଥିବା ଧନୁଷ ପରି।
Verse 21
अशास्यानपि शास्त्येष रक्षोबन्धुषु राजसु । सृष्ट: प्रथमतश्नण्डो ब्रह्मणा ब्रह्मवादिना,ब्रह्मवादी ब्रह्माजीने पहले इस प्रचण्ड धनुषका निर्माण किया था। यह राक्षससदृश राजाओंमेंसे अदम्य नरेशोंका भी दमन कर डालता है
ଏହି ପ୍ରଚଣ୍ଡ ଶସ୍ତ୍ର ଶାସନର ଅତୀତ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ—ରାକ୍ଷସସଦୃଶ ଆଚରଣ କରୁଥିବା ରାଜାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ—ଶାସିତ କରେ। ଆଦିକାଳରେ ବ୍ରହ୍ମବାଦୀ ବ୍ରହ୍ମା ଏହାକୁ ନିର୍ମାଣ କରିଥିଲେ; ତେଣୁ ଏହା ଉଚ୍ଛୃଙ୍ଖଳ ଓ ଦୁର୍ଦମ୍ୟ ନରେଶମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦମନ କରି, ଅଧର୍ମବଳ ଉପରେ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ ହୁଏ।
Verse 22
एतच्छस्त्रं नरेन्द्राणां महच्चक्रेण भासितम् । पुत्राः: सलिलराजस्य धारयन्ति महोदयम्,यह धनुष राजाओंके लिये एक महान् अस्त्र है और चक्रके समान उद्धासित होता रहता है। इस महान् अभ्युदयकारी धनुषको जलेश वरुणके पुत्र धारण करते हैं
ଏହା ନରେନ୍ଦ୍ରମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମହାନ୍ ଅସ୍ତ୍ର; ମହାଚକ୍ର ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ। ଜଳର ଅଧିପତି ବରୁଣଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ଏହି ମହୋଦୟକର ଧନୁଷକୁ ଧାରଣ କରନ୍ତି।
Verse 23
एतत् सलिलराजस्यच्छत्रं छत्रगृहे स्थितम् । सर्वतः सलिलं शीतं जीमूत इव वर्षति,और यह सलिलराज वरुणका छत्र है, जो छत्रगृहमें रखा हुआ है। यह छत्र मेघकी भाँति सब ओरसे शीतल जल बरसाता रहता है
ଏହା ସଲିଲରାଜ ବରୁଣଙ୍କ ଛତ୍ର, ଯାହା ଛତ୍ରଗୃହରେ ରହିଛି। ମେଘ ପରି ଏହା ସବୁ ଦିଗରେ ଶୀତଳ ଜଳ ବର୍ଷା କରିଚାଲେ।
Verse 24
एतच्छत्रात् परिभ्रष्टं सलिलं सोमनिर्मलम् । तमसा मूर्छितं भाति येन नारच्छति दर्शनम्,इस छत्रसे गिरा हुआ चन्द्रमाके समान निर्मल जल अन्धकारसे आच्छन्न रहता है, जिससे दृष्टिपथमें नहीं आता है
ଏହି ଛତ୍ରରୁ ଝରିପଡ଼ିଥିବା ଚନ୍ଦ୍ରସମ ନିର୍ମଳ ଜଳ ତମସାରେ ଆଛାଦିତ ହୋଇ ମୂର୍ଛିତ ପରି ଦିଶେ; ତେଣୁ ତାହା ଦୃଷ୍ଟିପଥକୁ ଆସେ ନାହିଁ।
Verse 25
बहून्यद्धुतरूपाणि द्रष्टव्यानीह मातले | तव कार्यावरो धस्तु तस्माद् गच्छाव मा चिरम्,मातले! इस वरुणलोकमें देखनेयोग्य बहुत-सी अद्भुत वस्तुएँ हैं; परंतु सबको देखनेसे तुम्हारे कार्यमें रुकावट पड़ेगी, इसलिये हमलोग शीघ्र ही यहाँसे नागलोकमें चलें
କଣ୍ୱ କହିଲେ—ହେ ମାତଲି! ଏହି ବରୁଣଲୋକରେ ଦେଖିବାଯୋଗ୍ୟ ଅନେକ ଅଦ୍ଭୁତ ଦୃଶ୍ୟ ଅଛି। କିନ୍ତୁ ସବୁ ଦେଖିବାକୁ ଦେରି ହେଲେ ତୁମ କାର୍ଯ୍ୟରେ ବାଧା ପଡ଼ିବ; ତେଣୁ, ହେ ମାତଲି, ଦେରି ନକରି ଚଳ—ନାଗଲୋକକୁ ଆଗେ ବଢ଼ିବା।
Verse 98
इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे अष्टनवतितमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଅନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ମାତଲି-ବର-ଅନ୍ୱେଷଣ ବିଷୟକ ଅଠାନବେଁ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The dilemma is evaluative rather than confrontational: how to judge a realm that contains extraordinary resources and phenomena (amṛta, lunar vitality, cosmic waters) yet is also characterized by bondage, adharma-associated residents, and ominous eschatological signs—prompting a decision about suitability and association.
The chapter teaches layered discernment: cosmic splendor and power are ethically ambiguous; lasting welfare aligns with disciplined conduct (tapas, vows) and with choices made under awareness of kāla (time) and impermanence.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-function is cosmological framing—linking political-epic discourse to a wider ontology where time, moral condition, and cosmic processes contextualize human decision-making.